हमें दीजिए गैर-हिंदू दर्जा, कम से कम ‘हिन्दू’ पहचान तो बचे: ‘मकड़जाल’ से बचने के लिए अय्यावली समुदाय की माँग

अय्यावली संप्रदाय के मुखिया बालप्रजापति आदिगालार ने कहा, "संप्रदाय के भक्त केवल आध्यात्मिक सेवाएँ और कर्मकाण्ड करते हैं जबकि HR&CE विभाग प्रशासनिक हस्तक्षेप करना चाहता था।"

होली के ठीक पहले एक खबर आई, जो होली के उल्लास और चुनावी शोरगुल में दब गई। खबर थी – तमिलनाडु के अय्यावली संप्रदाय (Ayya Vazhi sect) द्वारा हिन्दू धर्म से अलग मान्यता की माँग उठाए जाने की। अय्यावली संप्रदाय ने जो कारण बताया है, वही खबर की जान है। माँग के पीछे का कारण है – तमिलनाडु का मंदिर प्रबंधन विभाग, हिन्दू रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एण्डॉमेंट डिपार्टमेंट (HR&CE department) के हाथों अपने संप्रदाय की परम्पराओं में छेड़-छाड़ की आशंका और उससे अपनी पहचान को बचाए रखने की कोशिश।

अपनी माँग को लेकर अय्यावली संप्रदाय के मुखिया बालप्रजापति आदिगालार साफ कहते हैं कि यह कदम उन्हें अपने संप्रदाय के विशिष्ट स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए उठाना पड़ रहा है। संप्रदाय के पवित्र स्थल स्वामीतोप में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “संप्रदाय के भक्त केवल आध्यात्मिक सेवाएँ और कर्मकाण्ड करते हैं जबकि HR&CE विभाग प्रशासनिक हस्तक्षेप करना चाहता था।”

राजनीतिक तौर पर यह संप्रदाय भाजपा का परंपरागत मतदाता रहा है और 2014 के आम चुनावों में इस संप्रदाय की बड़ी संख्या वाली कन्याकुमारी लोकसभा सीट से भाजपा विजयी हुई थी। अतः भाजपा के लिए इस माँग और इसके पीछे के कारण, को नकारना मुश्किल होगा। शायद इसीलिए आदिगालार भाजपा के समर्थन को लेकर आश्वस्त हैं- उनके अनुसार भाजपा के केन्द्रीय मंत्री और नेता पोन राधाकृष्णन ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे संप्रदाय की विशिष्टता को बचाए रखने व HR&CE विभाग के हस्तक्षेप को दूर करने में पूरी मदद करेंगे।

हिन्दू-विरोधी रहा है HR&CE का इतिहास

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HR&CE के नाम में भले ही हिन्दू हो, पर क्षेत्रीय नेताओं से लेकर राज्य के उच्च न्यायलय तक ने हिन्दुओं के मंदिरों और परम्पराओं को नुकसान पहुँचाने संबंधी टिप्पणी इस विभाग पर कर चुके हैं।

भाजपा नेता एच राजा ने यह मांग की थी कि HR&CE विभाग राज्य सरकार के हाथों में जा चुके मंदिरों के स्वामित्व की संपत्ति व चुराई गई मूर्तियों पर स्थिति स्पष्ट करे। नतीजन HR&CE विभाग के कर्मचारी संघ ने उन पर ही अपमानजनक टिप्पणी को लेकर एफआईआर कर दी। और तो और, कर्मचारी संघ के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष उदय कुमार ने चेतावनी दी थी कि एच राजा के खिलाफ तमिलनाडु के हर जिले में अलग-अलग मुकदमा किया जाएगा। उस समय भाजपा ने यह आरोप लगाया था कि यह राज्य में उसकी विपक्षी आवाज़ को दबाने की साजिश है।

बात सिर्फ एच राजा की नहीं है। चोरी की गई मूर्तियों की वापसी में लगे तमिलनाडु के पुलिस अफसर भी चोरियों की जाँच और मूर्तियों की बरामदगी में HR&CE विभाग द्वारा मुश्किलें पैदा करने की ओर इशारा कर चुके हैं। यहाँ तक कि मद्रास हाईकोर्ट ने मूर्तियों की चोरी रोक पाने में विभाग की लगातार नाकामी से तंग आकर यह पूछ दिया था कि अगर चोरियाँ बदस्तूर जारी हैं तो इस विभाग की आवश्यकता ही क्या है। इसी मामले में अदालत ने सीबीआई जाँच की भी चेतावनी दी थी।

इसके अलावा HR&CE विभाग पर यह आरोप भी है कि यह कानूनी रूप से वैध सीमा से अधिक धन की उगाही तमिलनाडु सरकार के नीचे आने वाले मंदिरों से करता है।

यही नहीं, ढाई वर्ष पूर्व 2016 में, श्रद्धालुओं ने नवीनीकरण के नाम पर मंदिरों के पवित्र हिस्सों को खण्डित करने का आरोप लगाया था।  इसके बाद भी अदालत को हस्तक्षेप कर यह निर्देश देना पड़ा था कि हिन्दुओं की आस्था के प्रतीकों के साथ तोड़-फोड़ न की जाए। निर्देश में यह भी कहा गया था कि कोई भी निर्माण, नवीनीकरण या मरम्मत यूनेस्को द्वारा इस विषय के लिए जारी दिशा-निर्देशों के अंतर्गत ही किए जाएँ।

पहले भी हो चुकी है हिन्दू धर्म से अलग होने की माँग

जो माँग आज अय्यावली संप्रदाय कर रहा है, वही माँग विभिन्न समयों पर अन्य समुदाय भी कर चुके हैं। पिछले साल कर्नाटक की सिद्दरमैया सरकार ने ऐसी ही एक माँग को मानकर कर्नाटक के लिंगायत और वीरशैव समुदायों को अलग पंथ/संप्रदाय की मान्यता दे दी थी। नतीजन कर्नाटक में 17% आबादी वाले इस समुदाय के 4 बड़े धर्मगुरुओं ने सार्वजनिक तौर पर सिद्दरमैया और कॉन्ग्रेस को समर्थन की सार्वजनिक घोषणा की थी। यह पिछले कई दशकों में ऐसी पहली घटना थी।

माना जाता है कि इसके पीछे भी सरकारी नौकरशाही का अपने संप्रदाय और परम्पराओं में अकारण हस्तक्षेप रोकना ही लिंगायतों की इस माँग और सिद्दरमैया को समर्थन का कारण था। इसके अलावा अपने घोषणापत्र में राज्य के सभी मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त कराने का दावा करने वाली येद्दुरप्पा-नीत भाजपा तब के विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी।

यह जानकारी भी जरूरी है कि जब पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का शासन था तो उनके द्वारा समर्थित शिक्षक यूनियन के उपद्रव से बचने के लिए रामकृष्ण मिशन ने भी अहिंदू दर्जे में मान्यता पाने का प्रयास किया था। इसके पीछे भी उद्देश्य यही था – सरकार द्वारा केवल हिन्दू स्कूलों पर थोपे गए नियम-कानूनों से खुद को बचाना।


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