Homeविविध विषयअन्यनीरज चोपड़ा को सिल्वर मेडल: 19 साल बाद भारत को वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में...

नीरज चोपड़ा को सिल्वर मेडल: 19 साल बाद भारत को वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पदक, 2.41 मीटर से रह गया गोल्ड

इससे पहले वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत के लिए एकमात्र मेडल अंजू बॉबी जॉर्ज ने 2003 में जीता था। पुरुषों की प्रतियोगिता में आज से पहले भारत ने एक भी मेडल हासिल नहीं किया था।

नीरज चोपड़ा ने वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल कर इतिहास रच दिया। उन्होंने 88.13 मीटर भाला फेंक (बेस्ट ऑफ 6 में से) कर यह मेडल हासिल किया। वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में अभी तक किसी भी भारतीय पुरुष ने कोई भी पदक नहीं जीता था।

नीरज चोपड़ा ने जैसे ओलिंपिक के ट्रैक एंड फील्ड इवेंट में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिला कर इतिहास रचा था, वैसा ही इतिहास आज भी रच दिया। आपको बता दें कि इससे पहले वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत के लिए एकमात्र मेडल अंजू बॉबी जॉर्ज ने 2003 में जीता था। उन्हें लॉन्ग जंप में ब्रॉन्ज मेडल मिला था। पुरुषों की प्रतियोगिता में आज से पहले भारत ने एक भी मेडल हासिल नहीं किया था।

अमेरिका में हो रही 18वीं वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप के भाला फेंक प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल एंडरसन पीटर्स ने जीता। उन्होंने 90.54 मीटर भाला (बेस्ट ऑफ 6 में से) फेंका।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

खून वही, बस नैरेटिव बदल गया: प्राचीन बलि से ईसाई संस्कार तक, इतिहास ने ये फर्क कैसे बनाया?

पश्चिम ने पुरानी सभ्यताओं को खून और बलि के नाम पर बर्बर कहा। ईसाई परंपरा को आध्यात्मिक ऊँचाई बताया। लेकिन चर्च के केंद्र में भी रोटी और वाइन के जरिए शरीर और रक्त का अनुष्ठान बैठा है। सभ्यता की कहानी इतनी साफ नहीं।

हमें पितृसत्ता की अधूरी कहानी क्यों सुनाई गई? Patriarchy? Think Again

भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।
- विज्ञापन -