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‘इतने मामले लंबित हैं, गंभीर मुद्दों की जगह काल्पनिक विषय पर समय नष्ट न करे सुप्रीम कोर्ट’: समलैंगिक विवाह पर जैन मुनि का राष्ट्रपति को पत्र, पश्चिमी प्रथाएँ थोपे जाने का विरोध

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि समलैंगिकों के अधिकारों को पहले ही संरक्षित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि...

अब जैन समाज ने भी समलैंगिक विवाह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जैन आचार्य शिव मुनि ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिख कर इसका विरोध जताया है। उन्होंने माँग की है कि समलैंगिक विवाह को कानून द्वारा मान्यता न दी जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब भारत देश कई समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे विषय पर चर्चा की आवश्यकता ही नहीं है। उन्होंने गरीबी उन्मूलन, सभी तक शिक्षा की पहुँच, प्रदूषण मुक्त पर्यावरण और जनसंख्या नियंत्रण को मुख्य समस्या करार दिया।

उन्होंने कहा कि ऐसी समस्याओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने कोई तत्परता नहीं दिखाई है। उन्होंने भारत को विभिन्न धर्मों, जातियों और उप-जातियों का देश बताते हुए लिखा कि शताब्दियों से जैविक पुरुष एवं जैविक महिला के बीच विवाह की मान्यता रही है, ऐसे में विवाह की संस्था न केवल दो विषम लैंगिकों का मिलन है बल्कि मानव उन्नति से भी संबंधित है। उन्होंने प्राचीन परिभाषाओं का जिक्र करते हुए कहा कि सभी धर्मों में विवाह की यही मान्यता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि समलैंगिकों के अधिकारों को पहले ही संरक्षित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि समलैंगिक विवाह का मामला मौलिक न होकर वैधानिक अधिकार हो सकता है, लेकिन ये मौलिक अधिकार नहीं है और संसद द्वारा कानून बना कर ही इसे संरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने इसे विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत डालने का विरोध करते हुए कहा कि ये महिला-पुरुष के लिए है, ऐसे में इसके हर एक प्रावधान को नए स्वरूपों में परिभाषित करना पड़ेगा।

उन्होंने पत्र में लिखा, “विवाह एक समाजिक/कानूनी संस्था है। अब न तो इसे नष्ट किया जा सकता है और न ही इसका नया स्वरूप बनाया जा सकता है। भारत में विवाह का सभ्यतागत महत्व है और ये एक महान संस्था है जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है। स्वतंत्र भारत में इस पर पश्चिमी प्रथाएँ थोपने का काम किया जा रहा है। लंबित मामले पूरे करने की बजाए काल्पनिक विषय पर सुप्रीम कोर्ट का समय नष्ट किया जा रहा है। ये अनुचित है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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