Thursday, November 26, 2020
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सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान नहीं… रोगजार भी: ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की जिंदगी में ऐसे आया बदलाव

सरकार साल 2016 में एक विधेयक लेकर आई थी - ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक। यह सिर्फ एक शुरुआत थी। इस विधेयक की नींव पर सरकार ने पिछले वर्षों में जो काम किया, उसी का नतीजा है - जज बनने से लेकर, मेट्रो की नौकरी और अब सुरक्षाबल में बहाली की बात!

वर्तमान सरकार अनेक कारणों के चलते आलोचना का सामना करती है, भले उन कारणों में तथ्य और तर्क हों या न हों। ऐसा ही एक कारण है ‘ट्रांसजेंडर समुदाय’ के लिए सरकार का रवैया। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए 2014 से PM मोदी की सरकार ने क्या-क्या किया है, लोग शायद भूल गए हैं। लेकिन पिछले 6 वर्षों का काम अब धरातल पर दिखने लगा है।

तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के लिए यह बात स्वीकार करना मुश्किल है कि सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। चाहे परोक्ष रूप से या अपरोक्ष रूप से, गुज़रे कुछ सालों में वर्तमान सरकार ने ऐसे तमाम फैसले लिए हैं, जिनके चलते ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार बड़े पैमाने पर सुनिश्चित होते हैं। अधिकार ही नहीं इस समुदाय के लोगों के लिए शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसी अहम फायदे भी तय होते हैं।

ट्रांसजेंडर समुदाय समाज का असल वंचित वर्ग है। अब तक जितनी सरकारें भी सत्ता में आई हैं, उनमें वर्तमान सरकार के अलावा किसी दूसरी सरकार की कार्यप्रणाली इनके उत्थान के लिए उल्लेखनीय नहीं रही है। शिक्षा-सुरक्षा-रोजगार हर स्तर पर केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम किया है। इनके रोजगार के लिए ही गृह मंत्रालय की ओर से ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए CAPF (Central Armed Police Force) में भर्ती की बात की गई। विभाग अब इस पर मंत्रालय को जवाब देगा।

24 जून 2020 को नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक़ सेक्टर 50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित होगा। मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर और हाउस कीपिंग सर्विस में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की भर्ती की जाएगी। इस मेट्रो स्टेशन का नाम ‘रेनबो स्टेशन रखा जाएगा। ठीक ऐसे ही पिछले कुछ समय में वैश्विक समूहों से लेकर सरकारी नीतियों तक ट्रांसजेंडरों को काफी प्राथमिकता मिली है। 

ट्रांसजेंडर के लिए विधेयक

सरकार साल 2016 में एक विधेयक लेकर आई थी – ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक! इस क़ानून का उद्देश्य स्पष्ट था – ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करना। इसके बाद रोज़गार मिलने के दौरान उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकना और उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाएँ दिलाना।

भले ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द की नींव 90 के दशक में ही पड़ गई थी लेकिन सरकारों ने इस शब्द के इर्द-गिर्द उतना काम नहीं किया। जहाँ एक ओर दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों में समलैंगिक अधिकारों को मान्यता नहीं मिली है, वहीं हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2018 में धारा 377 को जो पहले आपराधिक था, उसे गैर-आपराधिक बनाया और सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध नहीं माना।     

हालाँकि केवल इतने से देश में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का विकास सुनिश्चित नहीं होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्ययन के मुताबिक़ देश के 92 फीसदी ट्रांसजेंडर किसी भी तरह के रोज़गार या आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं हैं। इससे भी ज़्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि जितने गिने-चुने लोग योग्य होते हैं, उन्हें नकार दिया जाता है।

यहाँ समस्या योजनाओं से हट कर आम लोगों के रवैये पर आ जाती है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश भर में कुल 4,90,000 ट्रांसजेंडर हैं। सरकारी प्रोत्साहन व न्यायालयों की सख्ती के बाद समय के साथ तमाम बड़े व्यावसायिक समूहों ने ट्रांसजेंडरों के लिए काफी सकारात्मक रुख अपनाया है।

ट्रांसजेंडर व रोजगार

कुछ साल पहले चेन्नई के एक उद्यमी समूह ने 14 महीनों के भीतर कुल 42 ट्रांसजेंडर को प्रशिक्षण पर रखा था। इसके अलावा साल 2017 में कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड ने 23 ट्रांसजेंडर लोगों को रोज़गार दिया था। साल 2017 में ही पश्चिम बंगाल की जोइता मंडल को लोक अदालत में न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

रोजगार सृजन जैसे कामों के अलावा वर्तमान सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन फैसलों के चलते कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की स्वीकार्यता काफी बढ़ी है। 

साल 2018 में गोदरेज समूह ने एक मैनिफेस्टो जारी किया था, जिसमें इस मुद्दे पर तमाम तथ्य मौजूद थे कि भारतीय कार्य स्थलों पर ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वीकार्यता कैसे बढ़ेगी। इसी साल की शुरुआत में VLCC ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए ‘असिस्टेंट ब्यूटी थेरेपिस्ट’ प्रक्षिक्षण कोर्स तैयार किया थाl। VLCC हैदराबाद शाखा में इस कोर्स के तहत कुल 24 लोगों ने प्रशिक्षण लिया था।

साल 2018 के ही जुलाई महीने में ऊबर इट्स ने चेन्नई में कई ट्रांसजेंडर को डिलीवरी एजेंट के तौर पर रखा था। इसी तरह कुछ साल पहले FICCI और CII ने एक कॉन्क्लेव का आयोजन कराया था। इसमें एक पैनल में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की अर्थव्यवस्था में भागीदारी न होने से भारत को हर साल करोड़ों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है। सरकार इस खाई को भरने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। पहले उन्हें उनके अधिकार मिले और उसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी मिले। ऐसे में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आम लोग इस तरह के नीति-निर्देशों में सरकार का पूरा साथ दें।     

इस तरह की नीतियों और आँकड़ों से हट कर ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों के नज़रिए में इस समुदाय के प्रति सकारात्मकता बनी रहे। क्योंकि एक सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश में सभी लोगों को बराबरी से जीने का अधिकार है। ऐसे में जब तक आम लोग ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को सामान नज़रिए से नहीं देखेंगे तब तक सामाजिक खाई बनी रहेगी।

इस मामले में सरकारी ढाँचा और क़ानून व्यवस्था एक हद तक ही अपनी भूमिका निभा सकती है। अंतिम ज़िम्मेदारी आम लोगों के कन्धों पर ही आती है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने ‘थर्ड जेंडर’ शब्द देकर ही अपना मत स्पष्ट कर दिया था। बचा हुआ काम हमारा है कि हम इस आदेश को किस हद तक बढ़ावा देते हैं।  

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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