Wednesday, November 30, 2022
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मिट्टी से पटाखे, 400 साल पुरानी पद्धति वडोदरा में पुनर्जीवित: ‘वोकल फॉर लोकल’ से इस दीवाली कुम्हारों की कमाई

“ये पटाखे 100 प्रतिशत स्वदेशी हैं। कोठी मिट्टी से बनाई जाती है। एक कुम्हार ने उन्हें मिट्टी का उपयोग करके बनाया है। चक्री कागज और बाँस से बना है। हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक स्थानीय कलाकारों को रोजगार प्रदान करना है।"

‘ओल्ड इज गोल्ड’ यह हम सदियों से सुनते आ रहे है और यही सच है। हालाँकि बढ़ते तकनीकियों के साथ अब पुरानी चीजें और तरीकों पर धूल जमते जा रही है। पर आज भी कई लोग ऐसे है जो पारंपरिक पद्धति के जरिए ही अपना काम करते है और मार्केट में अपनी एक नई पहचान बनाते है। गुजरात के वडोदरा से एक ऐसी ही खबर सामने आई है। जहाँ मिट्टी से पटाखे बनाने वाली 400 साल पुरानी पद्धति को फिर से पुनर्जीवित किया है। 

दरअसल, वडोदरा में मिट्टी के पटाखे बनाने का 400 साल पुराना तरीका आज फिर से अपनाया जा रहा है और इसके जरिए एक छोटी सी पहल करके इस पारंपारिक पद्धति को अपनाते हुए मिटटी के ईको-फ्रेंडली पटाखे बनाए जा रहे हैं। 

चार सदियों पुरानी इस कला को पुनर्जीवित करने में प्रमुख परिवार फाउंडेशन नाम के एक एनजीओ ने मदद की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ के आदर्श वाक्य ने एनजीओ को इस सदियों पुरानी कला को फिर से जीवंत करने के लिए प्रेरित किया। यह न केवल इस कला रूप को नई पीढ़ी के सामने रखेगा, बल्कि कुछ जरूरतमंद लोगों को रोजगार भी प्रदान करेगा।

प्रमुख परिवार फाउंडेशन के अध्यक्ष निताल गाँधी ने कहा, “ये पटाखे 100 प्रतिशत स्वदेशी हैं। कोठी मिट्टी से बनाई जाती है। एक कुम्हार ने उन्हें मिट्टी का उपयोग करके बनाया है। चक्री कागज और बाँस से बना है। हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक स्थानीय कलाकारों को रोजगार प्रदान करना है। ये पर्यावरण के अनुकूल हैं। उपयोग के बाद घुल जाते हैं। साथ ही, ये बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। कोई भी इन पटाखों का उपयोग कर सकता है। हमारी थीम ‘वोकल फॉर लोकल’ है।”

रमन प्रजापति नाम के शिल्पकार ने एनजीओ को एक बार फिर कोठी बनाने का श्रेय दिया और कहा कि वे इस हद तक सुरक्षित हैं कि कोई उन्हें अपने हाथों में रख कर फोड़ सकता है। यह पटाखे बनाने का 400 साल पुराना तरीका है। बड़े लोग कोठी बनाते थे।

उन्होंने कहा, “20 साल पहले मैं रुक गया। क्योंकि यह लाभदायक नहीं था, लेकिन फिर निताल भाई आए और मैंने उन्हें कुछ कोठियों के नमूने दिखाए। फिर मैंने 2 ट्रैक्टर मिट्टी की व्यवस्था की और इससे पटाखे बनाए। मुझे इस दीवाली के दौरान कमाई हुई। हम 1 से 5 लाख कोठी बना सकते हैं।”

‘यह उत्सव है या शोक’

उल्लेखनीय है कि हर साल दिवाली से ठीक पहले पटाखों पर लगने वाले लगातार प्रतिबंध ने पटाखों के निर्माताओं और विक्रेताओं को परेशानी में डाल दिया है। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की आड़ में पटाखों पर हो रही कार्रवाई से परेशान पटाखा कारोबारियों ने प्रतिबंध लगाने को लेकर सरकार पर जमकर निशाना साधा।

दिल्ली के सदर बाजार में पटाखा एसोसिएशन के महासचिव हरजीत सिंह छाबड़ा ने एक स्थानीय समाचार चैनल को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “अगर भारत में दिवाली नहीं मनाई जाएगी तो क्या हम इसे पाकिस्तान में मनाए जाने की उम्मीद करते हैं?”

छाबड़ा ने आगे कहा कि उन्होंने अपने 20 साल के करियर में इस तरह के हालात और प्रतिबंध कभी नहीं देखे। उन्होंने दुखी होते हुए कहा, “हम कोई त्योहार मना रहे हैं या किसी की मौत का शोक मना रहे हैं? हमें भारत में रहते हुए दिवाली पर पटाखे बेचने की अनुमति देने के लिए सुप्रीम कोर्ट से भीख माँगनी होगी।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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