सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण के 75 साल पूरे होने के मौके पर सोमवार (11 मई 2026) को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान 75 वर्ष में पहली बार मंदिर में PM मोदी की मौजूदगी में शिखर का कुंभाभिषेक किया गया है। कुंभाभिषेक के बाद पीएम मोदी ने एक स्मारक डाक टिकट और खातौर पर बनाया गया 75 रुपए का सिक्का भी जारी किया है। पीएम मोदी ने इससे पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चन भी की है।

पीएम मोदी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “प्रभास पाटन का पवित्र क्षेत्र एक अद्भुत प्रभा से भरा हुआ है। महादेव का ये सौंदर्य, पुष्प वर्षा, भगवा ध्वजों की यह आभा, कला संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियाँ, वेद मंत्रों का उच्चार, गर्भ गृह में हो रहा शिवपंचाक्षरी का अखंड पाठ और इसके साथ-साथ सागर की लहरों का जयघोष ऐसा लग रहा है, जैसे यह सृष्टि एक साथ बोल रही है- जय सोमनाथ, जय-जय सोमनाथ।”
उन्होंने कहा कि समय खुद जिनकी इच्छा से प्रकट होता है। जो स्वयं कालातीत हैं, काल स्वरूप हैं आज उन देवाधिदेव महादेव की विग्रह प्रतिष्ठा के हम 75 वर्ष मना रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा, “आज हम उनके धाम के पुनर्निर्माण का उत्सव मना रहे हैं जो हलाहल पीकर नीलकंठ हो गए आज उनकी ही शरण में सोमनाथ अमृत महोत्सव हो रहा है। ये उनकी ही लीला है।”
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “मैं दादा सोमनाथ के भक्त के रूप में कितनी ही बार मैं यहाँ आया, नतमस्तक हुआ। लेकिन आज समय की यह यात्रा सुखद अनुभूति दे रही थी। कुछ महीने पहले ही हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे थे। प्रथम विध्वंस के 1000 साल बाद भी सोमनाथ के अविनाशी होने का गर्व और आज आधुनिक स्वरूप की प्रतिष्ठा के 75 साल, हम केवल 2 आयोजनों का हिस्सा भर नहीं बने हैं। हमें हजार साल की अमृत यात्रा को अनुभव करने का शिवजी ने मौका दिया है।” PM ने कहा कि ये केवल अतीत का उत्सव नहीं है बल्कि अगले हजार साल के लिए भारत की प्रेरणा का महोत्सव भी है।
सोमनाथ को भौतिक ढाँचा मानकर टकराते रहे आक्रांता: PM मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “पिछली बार यहाँ आने पर मैंने कहा था कि जिसके नाम में ही सोम यानी अमृत जुड़ा हो तो उसे कौन नष्ट कर सकता है। इतिहास के लंबे कालखंड में इस मंदिर ने कितने ही आक्रमण झेले हैं। महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक आक्रांता आए। लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर का वैभव मिटाने का प्रयास किया। वो सोमनाथ को भौतिक ढाँचा मानकर उससे टकराते रहे।”
PM मोदी ने कहा, “बार-बार इस मंदिर को, इस ढाँचे को तोड़ा गया। यह बार-बार बनता रहा, हर बार उठ खड़ा होता रहा। क्योंकि तोड़ने वालों को मालूम नहीं था कि हमारा वैचारिक सामर्थ्य क्या है। हम भौतिक शरीर को नश्वर मानने वाले हैं लेकिन हम जानते हैं कि शरीर के भीतर बैठी आत्मा अविनाशी है। फिर शिव तो सर्वात्मा हैं। इसलिए अलग-अलग काल में अलग-अलग जीवों की संकल्प शक्ति में शिव प्रकट होते रहे।”

