फरीदाबाद की निजी अल्पसंख्यक संस्था अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर आतंकवाद, वित्तीय घोटालों और फर्जीवाड़े के गंभीर आरोपों के बाद जाँच तेज हो गई है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब सुरक्षा एजेंसियों ने यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज से जुड़े डॉक्टरों के जरिए चल रहे व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क का खुलासा किया।
इनमें डॉ मोहम्मद उमर नबी भी शामिल है, जिस पर 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए आत्मघाती धमाके का आरोप है, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हुई। अन्य डॉक्टरों से हथियार और विस्फोटक भी बरामद हुए।
इसी बीच, इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यूनिवर्सिटी के पास UGC की 12(B) मान्यता नहीं होने के बावजूद इसे अल्पसंख्यक मंत्रालय (MoMA) और AICTE की विभिन्न योजनाओं से कई सालों में करोड़ों रुपए की छात्रवृत्तियाँ और अनुदान मिले, जैसे 2016 में 10 करोड़ से अधिक 2015 में 6 करोड़ और जम्मू-कश्मीर के छात्रों के लिए 1.10 करोड़ रुपए।
1997 में स्थापित और 2014 में विश्वविद्यालय का दर्जा पाने वाली इस संस्था ने कई मौकों पर अपने अल्पसंख्यक स्टेटस का उपयोग कर हरियाणा सरकार के आदेशों के खिलाफ NCME में अपील की और ज्यादातर मामलों में निर्णय इसके पक्ष में ही आया।
टेरर कनेक्शन सामने आने के बाद ED और दिल्ली पुलिस ने विश्वविद्यालय की वित्तीय अनियमितताओं की जाँच शुरू की, जिसमें पाया गया कि छात्रों और अभिभावकों को गुमराह कर करीब ₹415 करोड़ फीस वसूली गई और इस राशि का बड़ा हिस्सा परिवार से जुड़ी कंपनियों में फर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए लिया गया।
ED ने 18 नवंबर 2025 को यूनिवर्सिटी के संस्थापक और चेयरमैन जव्वाद अहमद सिद्दीकी को मनी लॉन्ड्रिंग के केस में गिरफ्तार भी कर लिया। इसके अलावा NAAC ने गलत मान्यता दिखाने पर नोटिस जारी किया और दिल्ली पुलिस ने धोखाधड़ी व जालसाजी के FIR दर्ज किए हैं। हालाँकि यूनिवर्सिटी का कहना है कि गिरफ्तार डॉक्टरों से उसका संबंध सिर्फ पेशेवर कार्य तक सीमित था और वह जाँच एजेंसियों को पूरा सहयोग कर रही है।

