बांग्लादेश: हिंदुओं के सिस्टेमेटिक नरसंहार को आँकड़ों की बाजीगरी से ढकने की कोशिश, यूनुस सरकार बोली- सांप्रदायिक नहीं है ज्यादातर अपराध

बांग्लादेश में आए दिन हिंदुओं की हत्याओं की खबरें सामने आ रही हैं, किसी को जला दिया जा रहा है तो किसी को चाकूओं से गोदा जा रहा है। इस पर दुनिया तो मौन है ही लेकिन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भी इन घटनाओं पर पर्दा डालने पर तुली हुई है। हिंदुओं की हत्याओं को सिर्फ अपराध बताकर इस सिस्टेमेटिक नरसंहार को ढकने की कोशिशें की जा रही हैं।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के अनुसार, साल 2025 में देश में अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों से जुड़े अधिकांश मामले ‘आपराधिक प्रकृति’ के थे और इनके पीछे कोई सांप्रदायिक उद्देश्य नहीं था। सरकार ने दावा किया कि 645 मामलों में से केवल 71 मामलों में ही सांप्रदायिक प्रकृति पाई गई हैं।

यह बयान सोमवार (19 जनवरी 2026) को मोहम्मद यूनुस के कार्यालय की ओर से जारी किया गया। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ हुई कई बर्बर हत्याओं की घटनाएँ सामने आई हैं और भारत ने कुछ दिन पहले ही ढाका से इस मुद्दे पर ‘तेजी और सख्ती से’ कार्रवाई करने का आग्रह किया था।

सरकार ने अपने बयान में कहा, “बांग्लादेश अपराध से पारदर्शिता, सटीकता और दृढ़ संकल्प के साथ निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। जनवरी से दिसंबर 2025 तक के आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड की साल भर की समीक्षा में अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों से जुड़े कुल 645 मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया है। ये आँकड़े देशभर में दर्ज सत्यापित FIR, जनरल डायरी, चार्जशीट और जाँच से जुड़ी जानकारियों पर आधारित हैं।”

पोस्ट में हर घटना को ‘चिंताजनक’ बताया गया लेकिन यह भी तर्क दिया गया कि आँकड़ों के आधार पर एक स्पष्ट और तथ्यात्मक तस्वीर सामने आई है, जिसके अनुसार अधिकांश घटनाएँ सांप्रदायिक नहीं बल्कि आपराधिक थीं। सरकार ने जोर दिया कि यह रिपोर्ट कानून-व्यवस्था बनाए रखने की मुश्किलों को दिखाती है और यह भी बताती है कि सार्वजनिक चर्चा को डर या गलत सूचना के बजाय तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।

बयान में यह भी कहा गया कि अल्पसंख्यकों पर हुए घातक हमले धार्मिक दुश्मनी से प्रेरित नहीं थे बल्कि आपराधिक गतिविधियों का नतीजा थे। सरकार के अनुसार, “निष्कर्षों से पता चलता है कि 71 घटनाओं में सांप्रदायिक तत्व पाए गए जबकि 574 घटनाओं को गैर-सांप्रदायिक माना गया। सांप्रदायिक घटनाओं में मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों और मूर्तियों की तोड़फोड़ या अपवित्रता शामिल थी। इसके उलट, अल्पसंख्यक व्यक्तियों या उनकी संपत्तियों को प्रभावित करने वाली अधिकांश घटनाएँ ऐसे आपराधिक कृत्यों से जुड़ी थीं जिनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं था जैसे पड़ोसी विवाद, जमीन विवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, चोरी, यौन हिंसा और पुरानी व्यक्तिगत दुश्मनी से जुड़े मामले।”

सरकार के बयान में कहा गया कि सांप्रदायिक तत्वों के तहत मूर्तियाँ तोड़ने की धमकियाँ, सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश, पूजा मंडपों को नुकसान, आठ आगजनी की घटनाएँ, एक चोरी, एक हत्या और मंदिरों में तोड़फोड़ की 38 घटनाएँ शामिल थीं। इनसे जुड़े कुल 50 मामलों में केस दर्ज किए गए और उतनी ही गिरफ्तारियाँ हुईं जबकि 21 मामलों में अन्य निवारक या जाँच संबंधी कदम उठाए गए।

वहीं, 574 गैर-सांप्रदायिक घटनाओं में 51 पड़ोसी विवाद, 23 जमीन से जुड़े विवाद, 106 चोरी के मामले, 26 पुरानी व्यक्तिगत रंजिश, 58 बलात्कार के मामले और 172 अप्राकृतिक मौतों की घटनाएँ शामिल थीं। इन मामलों में पुलिस ने अप्राकृतिक मौतों की 154 रिपोर्ट दर्ज कीं, 498 गिरफ्तारियाँ कीं, 390 केस दर्ज हुए और 30 मामलों में कार्रवाई की गई।

कोई सांप्रदायिक दुश्मनी नहीं, सभी धर्मों के समान अधिकार: यूनुस सरकार

यूनुस सरकार ने आगे कहा कि इस तरह का ‘भेद’ करना बहुत जरूरी है। सरकार के मुताबिक, “हर अपराध गंभीर होता है और उस पर कार्रवाई जरूरी है लेकिन आँकड़े बताते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ हुई अधिकतर घटनाएँ सांप्रदायिक नफरत की वजह से नहीं हुईं बल्कि ये ऐसी आपराधिक और सामाजिक वजहों से जुड़ी थीं, जो हर धर्म और समुदाय के लोगों को प्रभावित करती हैं। मामलों को सही तरीके से वर्गीकृत करने से गलत जानकारी फैलने से रोका जा सकता है और पुलिस की कार्रवाई भी ज़्यादा प्रभावी होती है।”

इसके बाद सरकार ने प्रशासन की तारीफ करते हुए कहा कि सैकड़ों मामलों में आधिकारिक तौर पर केस दर्ज किए गए हैं। कुछ मामलों में FIR के बाद गिरफ्तारियाँ हुई हैं जबकि कई मामलों में जाँच अभी जारी है। सरकार ने कहा, “यह दिखाता है कि अपराध से निपटने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संस्थागत स्तर पर गंभीरता दिखाई जा रही है, खासकर उन संवेदनशील मामलों में जो धार्मिक स्थलों या सांप्रदायिक मुद्दों से जुड़े होते हैं।”

सरकार ने यह भी माना कि कानून-व्यवस्था अब भी एक चुनौती बनी हुई है लेकिन साथ ही दावा किया कि हालात धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं। बयान में बांग्लादेश को मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों और अन्य आस्थाओं के लोगों का देश बताया गया और कहा गया कि ये सभी बराबर अधिकारों वाले नागरिक हैं। सरकार ने कहा, “हर समुदाय की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना सिर्फ संवैधानिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। पूजा स्थलों की रक्षा करना, भड़कावे को रोकना, अपराध होने पर तुरंत कार्रवाई करना और अफवाहों व सच्चाई के बीच फर्क करना सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए जरूरी है।”

यूनुस और उनकी सरकार लगातार हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा से इनकार करने में लगी हुई है जबकि बांग्लादेश में मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं की खुलेआम हत्या की जा रही है। सरकार ने या तो इन सांप्रदायिक हमलों को बेशर्मी से हल्का दिखाने की कोशिश की है या फिर इसके लिए भारत और भारतीय मीडिया पर गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ यूँ तो लंबे वक्त से हिंसा होती रही है लेकिन 5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। उसके बाद से हिंदुओं पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। हालात तब और ज्यादा बिगड़ गए जब कुछ ही दिनों पहले एक हिंदू दीपू चंद्र दास की लिंचिंग कर दी गई। इसके बाद से आए दिन हिंदुओं पर हमले की खबरें आ रही हैं।