प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच शुक्रवार (05 दिसंबर 2025) को हुई मुलाकात ने भारत-रूस रिश्तों को नई गहराई दी। इस दौरान पीएम मोदी ने पुतिन को रूसी भाषा में अनुवादित भगवद्गीता की एक प्रति उपहार में दी। ये सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि दोनों देशों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का बड़ा प्रतीक है।
दिलचस्प ये है कि साल 2011 में रूस में इसी भगवद्गीता पर बैन लगाने की माँग उठी थी। मामला कोर्ट तक पहुँच गया था। वो गीता इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन) ने ही छापी थी। रूस में इस्कॉन की ही गीता पर विवाद हुआ, जो इसकी कमेंट्री को लेकर था। इस्कॉन ने उस समय इसका जमकर विरोध किया और गीता के समर्थन में अभियान चलाया। अब इस्कॉन के राधारमण दास ने पीएम मोदी को धन्यवाद दिया।
राधारमण दास ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “श्री @narendramodi जी, @KremlinRussia_E को ISKCON की भगवद गीता का रशियन एडिशन गिफ्ट करने के लिए धन्यवाद। आज तक, ISKCON ने दुनिया भर में 110 से ज्यादा भाषाओं में गीता की 60 करोड़ से ज्यादा कॉपी बाँटी हैं। हमें आगे बाँटने के लिए सभी उपलब्ध भाषाओं में कॉपी देने में खुशी होगी।”
Thank you, Shri @narendramodi ji, for gifting ISKCON’s Russian edition of the Bhagavad Gita to @KremlinRussia_E. To date, ISKCON has distributed more than 60 crore copies of the Gita worldwide in over 110 languages. We would be happy to supply copies in all available languages…
— Radharamn Das राधारमण दास (@RadharamnDas) December 5, 2025
रूस में क्यों उठा था विवाद?
रूसी साइबेरिया के शहर टोम्स्क में ईसाई ऑर्थोडॉक्स चर्च से जुड़े एक संगठन ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर भगवद्गीता को ‘कट्टरपंथी साहित्य’ बताया। शिकायत में दावा किया गया कि इस ग्रंथ की वजह से रूस में सामाजिक तनाव और धार्मिक मतभेद पैदा हो रहे हैं।
इसी आधार पर रूस में गीता के प्रतिबंध की माँग की गई। याचिका दाखिल होने के बाद रूस के कई हिस्सों में बहस शुरू हो गई और मामला कोर्ट तक पहुँच गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फैसला लेते समय रूस के लोकपाल और भारत विशेषज्ञों की राय भी माँगी।
भारत की कूटनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध
मामले ने भारत में काफी आक्रोश पैदा किया। रूस में भारत के दूत अजय मल्होत्रा ने कहा कि भारत इस मसले को बेहद गंभीरता से देख रहा है। भारतीय दूतावास ने इसे रूस सरकार के उच्च अधिकारियों तक उठाया और कोर्ट में सकारात्मक हस्तक्षेप की माँग की। वहीं रूस में कृष्ण भक्तों के संगठन इस्कॉन ने भी इस निर्णय का विरोध किया और गीता के समर्थन में अभियान चलाया।
रूस में रहने वाले हिंदू समुदाय के साथ-साथ भारतीय सरकार ने खुलकर इस माँग का कड़ा विरोध जताया था। भारत की संसद में बहस हुई, प्रदर्शन हुए और उस समय के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने व्यक्तिगत रूप से रूसी अधिकारियों से बात की।
लगातार विरोध और कानूनी लड़ाई के बाद 28 दिसंबर 2011 को साइबेरिया में टोम्स्क की कोर्ट ने इसे बैन करने की माँग वाली याचिका खारिज कर दी। हालाँकि बाद में रूस के विदेश मंत्रालय ने सफाई दी कि जाँच मूल ग्रंथ की नहीं बल्कि ग्रंथ में इस्कॉन द्वारा की गई कमेंट्री की हो रही थी।
रूस की सरकार का रुख
रूस की ओर से भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया आई। भारत में रूस के राजदूत एलेक्ज़ेंडर कादाकिन ने साफ कहा कि किसी धार्मिक ग्रंथ को कोर्ट में घसीटना अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि रूस एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी धर्मों और उनके ग्रंथों को सम्मान प्राप्त है। कादाकिन ने स्पष्ट किया कि रूस गीता पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में कभी नहीं था और यह ग्रंथ भारत समेत दुनिया भर के लोगों के लिए ज्ञान का स्रोत है।
पीएम मोदी द्वारा भगवद्गीता भेंट करना सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक संस्कार नहीं था, बल्कि उस आध्यात्मिक सम्मान का प्रतीक था जिसने कभी विवादों के बावजूद रूस और भारत को सांस्कृतिक रूप से और करीब ला दिया।

