मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने अपने पहले दिए गए अंतरिम आदेश को स्पष्ट करते हुए ऐतिहासिक परिसर के पास स्थित एक भूखंड के खासरा नंबर 596 में मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार (जुमे) की नमाज दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच पढ़ने की अनुमति दी है। यह फैसला 30 जुलाई (गुरुवार) को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहन की पीठ ने सुनाया है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा, “अगर दोनों पक्ष सहमत हों तो वैकल्पिक स्थान दिए जाने की संभावना हमने खुली रखी है।” अदालत ने यह टिप्पणी उस माँग पर की, जिसमें मुस्लिम समुदाय ने शुक्रवार की नमाज के लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की माँग की थी। गौरतलब है कि मई में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित किया था।
इसके बाद मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को परिसर के पास जुमे की नमाज के लिए कोई वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने को कहा था और जुलाई में पुरानी व्यवस्था बहाल करने से इनकार कर दिया था। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि भूमि आवंटन के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन दिया गया था लेकिन प्रशासन ने जो स्थान उपलब्ध कराया है वह परिसर से काफी दूर है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने अदालत को बताया कि आवंटित स्थान सड़क मार्ग से करीब 1.3 किलोमीटर दूर है। उन्होंने यह भी कहा कि भोजशाला परिसर के बिल्कुल पास कुछ वक्फ की भूमि उपलब्ध है और संबंधित मुतवल्ली ने वहाँ नमाज की अनुमति देने के लिए NOC भी तैयार कर दिया है। मुस्लिम पक्ष के वकील ने अदालत के समक्ष इलाके का नक्शा भी पेश किया जिसमें भोजशाला परिसर के आसपास 4 संभावित स्थानों को दिखाया गया था। इनमें दरगाह की संपत्ति भी शामिल थी। उनका कहना था कि इनमें से किसी भी स्थान का उपयोग अदालत के पहले दिए गए निर्देश का पालन करने के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि कलेक्टर ने कानून-व्यवस्था की आशंका का हवाला देते हुए आसपास की कोई भी जगह देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि कुछ लोगों ने भोजशाला परिसर से 300 मीटर के भीतर नमाज का विरोध किया है लेकिन केवल ऐसी आशंकाओं के आधार पर संवैधानिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि पहले विवादित परिसर के बाहर सटे हुए क्षेत्र में जुमे की नमाज होती रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि साइट प्लान में पीले रंग से चिन्हित क्षेत्र उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए अलग रास्ता भी उपलब्ध है। इस पर याचिकाकर्ताओं ने सहमति जताई।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत से कहा कि उसकी प्राथमिक चिंता केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना है और वह दोनों पक्षों के दावों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। सरकार ने यह भी कहा कि वह निजी भूमि सहित अन्य उपयुक्त वैकल्पिक स्थानों पर भी विचार करने को तैयार है। हालाँकि, जस्टिस बागची ने कहा कि शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है लेकिन इसके नाम पर धार्मिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
गौरतलब है कि 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के एक आदेश के तहत मुस्लिम समुदाय को इस स्थान पर नमाज पढ़ने की अनुमति थी। बाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष के पक्ष में फैसला देते हुए उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया था। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि मुस्लिम समुदाय मस्जिद बनाना चाहता है तो वह राज्य सरकार से वैकल्पिक भूमि की माँग कर सकता है।

