लखनऊ के गोमतीनगर में खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, यानी JPNIC एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज तक ठीक से जनता के काम नहीं आ पाया और अब योगी सरकार ने तय किया है कि इसका बचा-खुचा निर्माण और आगे का संचालन निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार की दलील सीधी है, परिसर भी पूरा हो जाएगा, और रखरखाव का बोझ भी खजाने पर नहीं पड़ेगा।
बस यही ऐलान होते ही अखिलेश यादव मैदान में कूद पड़े। उनका कहना है कि योगी सरकार JPNIC को ‘बेच’ रही है, निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्ति ठिकाने लगाई जा रही है।
तो सवाल उठता है कि क्या वाकई JPNIC बिक गया? क्या इसकी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम हो गई? जिस प्रोजेक्ट को लेकर आज इतना हंगामा है, उसके निर्माण में खर्च को लेकर खुद CAG ने क्या पाया था? इन सबका जवाब जानने के लिए कहानी को शुरू से पकड़ना होगा।
भाजपा सरकार है या दुकानदार?
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) August 26, 2026
अब उप्र की भाजपा सरकार ने लखनऊ के JPNIC (जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर) को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय कैबिनेट में ले लिया है।
अब तो बस सरकार को ही ठेके पर देना या बेचना बचा है।
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पहले जानिए, JPNIC है क्या चीज
गोमतीनगर की करीब 18-20 एकड़ ज़मीन पर बना यह एक बड़ा सा बहुउद्देशीय परिसर है, जिसे शुरू से ही एक आधुनिक कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर सोचा गया था। नक्शे में एक स्टेट लेवल कन्वेंशन सेंटर, करीब 2,000 लोगों के बैठने लायक हॉल, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कोर्ट, ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल, होटल, पार्किंग और जयप्रकाश नारायण से जुड़ा एक म्यूजियम ब्लॉक, सब कुछ शामिल था। मतलब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि आयोजनों, सम्मेलनों और खेल गतिविधियों के लिए बना एक पूरा कॉम्प्लेक्स।
इसकी नींव 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते पड़ी थी। तब लागत आंकी गई थी ₹265.59 करोड़ लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह आंकड़ा भी बढ़ता गया और नवंबर 2016 आते-आते संशोधित लागत पहुँच गई ₹864.99 करोड़ तक। CAG की ऑडिट रिपोर्ट में भी यही दो आँकड़े दर्ज हैं, शुरुआती 265.59 करोड़ और संशोधित 864.99 करोड़।
यहीं से यह कहानी सिर्फ ‘एक अधूरी इमारत’ की नहीं रह जाती, यह सार्वजनिक पैसे के हिसाब-किताब और जवाबदेही की कहानी बन जाती है।

लागत तीन गुने से भी ज्यादा कैसे बढ़ी
निर्माण की जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को दी गई थी। मार्च 2013 में जब लागत ₹265.59 करोड़ तय हुई, उसके कुछ ही महीनों बाद मई 2013 में LDA ने काम एक ठेकेदार को सौंप दिया ₹149.60 करोड़ में जो अनुमानित लागत से करीब 12.35 फीसदी ज्यादा था।
फिर धीरे-धीरे प्रोजेक्ट में बदलाव जुड़ते गए। जैसे, शुरुआती डिज़ाइन में हेलिपैड का कोई ज़िक्र नहीं था। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड की शर्तों के चलते छत पर हेलिपैड जोड़ना पड़ा, और इसके लिए नींव में 600 मिमी की जगह 1,000 मिमी वाले पाइल इस्तेमाल करने पड़े। अब यह बदलाव अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं, निर्माण के दौरान ऐसे फेरबदल होते रहते हैं। असली सवाल इस काम पर चुकाई गई दर को लेकर उठा।
और यहीं CAG ने उंगली उठाई
ऑडिट में सामने आया कि 1,000 मिमी पाइल के काम के लिए ठेकेदार को ₹8,773.69 प्रति मीटर की दर से भुगतान हुआ, जबकि CAG के मुताबिक 2013 की लागू दर के हिसाब से यह सिर्फ ₹8,201.40 प्रति मीटर बनती थी। कुल 24,680 मीटर के इस काम पर यह छोटा-सा अंतर जुड़कर करीब ₹1.41 करोड़ का ‘अनुचित लाभ’ ठेकेदार की जेब में गया और उतनी ही रकम का घाटा सरकारी खजाने को हुआ। रिपोर्ट में इसे साफ शब्दों में ‘undue benefit’ कहा गया है।
यह कोई विपक्ष का लगाया आरोप नहीं बल्कि खुद देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज है।
योगी सरकार ने गड़बड़ियों की जाँच कराई
2017 में सरकार बदली और योगी आदित्यनाथ ने JPNIC के खर्चों पर आई रिपोर्ट के आधार पर जाँच कराई जिससे काम रुक गया। इसके बाद बरसों तक यह विशाल परिसर लगभग सुनसान पड़ा रहा। आखिरकार 2025 में सरकार ने फैसला लिया कि इसे फिर से LDA के जिम्मे किया जाए, ताकि अधूरा काम पूरा हो सके और कोई संचालन मॉडल तय हो।
अब हुआ क्या
अगस्त 2026 में योगी कैबिनेट ने JPNIC को निजी क्षेत्र के जरिए चलवाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के एक संयुक्त उपक्रम को चुना गया।
अब यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि ‘बेचना’ और ‘लीज पर देकर चलवाना’, दोनों एक चीज नहीं हैं। सरकार ने न तो JPNIC की जमीन बेची है, न ही इसकी सरकारी मिल्कियत किसी कंपनी के नाम की है। जो व्यवस्था बनी है वह लीज और सहभागिता की है और कंपनी को संचालन का अधिकार मिलेगा, मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा। जैसे कि म्यूजियम ब्लॉक, जो LDA के नियंत्रण में ही रहने वाला है।
तो अखिलेश यादव का यह कहना कि JPNIC ‘बेच दिया गया’ सरासर उनकी सरकार के विरोध और खुद असफल होने की कुंठा का प्रतीक है। यह बिक्री नहीं लंबी अवधि की लीज पर निजी संचालन की व्यवस्था है।
निजी कंपनी को बदले में करना क्या होगा
अब इस फैसले का वह हिस्सा जो अक्सर नारेबाजी में दब जाता है। JPNIC अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है, इसमें इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी जैसे कई काम बाकी हैं, जिन पर करीब ₹200 से ₹250 करोड़ और खर्च होने का अंदाजा है और यह खर्च सरकार नहीं, निजी ऑपरेटर अपनी जेब से उठाएगा।
इसके अलावा कंपनी को LDA को शुरुआत में ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी देनी होगी। संचालन शुरू होते ही हर साल ₹6 करोड़ का भुगतान होगा, जिसमें हर वर्ष 5 फीसदी की बढ़ोतरी भी जुड़ी है।
यानी सालों से अधूरा पड़ा जो परिसर सरकार खुद पूरा नहीं करवा पाई, उसे अब पूरा करने, चलाने और संभालने के लिए निजी पैसा लगाया जा रहा है।
पहले लगे 821.74 करोड़ का क्या होगा
एक और अहम पहलू है जो अक्सर बहस में छूट जाता है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर अब तक करीब ₹821.74 करोड़ जारी हो चुके हैं। यह रकम सरकार ने LDA को दी थी और अब इसे एक ‘ट्रांसफर्ड लोन’ माना जा रहा है, जिसे LDA को अगले 30 सालों में वापस चुकाना होगा।
मतलब सरकार का मौजूदा मॉडल सिर्फ ‘कंपनी को सौंप दो’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें पहले खर्च हो चुके पैसे की वसूली, बाकी निर्माण, आगे के संचालन का खर्च और JPNIC को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, ये सारी चीज़ें एक साथ जुड़ी हैं।
अखिलेश को नहीं पता बेच देने और लीज पर देने फर्क
विपक्ष का काम ही है सवाल पूछना और इस मायने में अखिलेश यादव का सरकार पर निशाना साधना कोई अटपटी बात नहीं। लेकिन जब आरोप ‘संपत्ति बेचने’ जैसा गंभीर हो, तो तथ्य और राजनीतिक भाषा में फर्क करना ज़रूरी हो जाता है।
तथ्य यह है कि JPNIC की शुरुआत खुद अखिलेश सरकार के दौर में हुई। तथ्य यह भी है कि इसकी लागत 265 करोड़ से बढ़कर CAG के रिकॉर्ड के मुताबिक 865 करोड़ तक पहुँच गई। तथ्य यह भी कि CAG ने पाइल के काम में दर के हेरफेर से 1.41 करोड़ के नुकसान की आपत्ति दर्ज की।
यह भी सच है कि 2017 के बाद जाँच बैठी, काम बरसों रुका रहा और आखिरकार 2025-26 में सरकार ने इसे LDA के जरिए फिर से पटरी पर लाने और निजी भागीदारी से संचालित करने का रास्ता चुना जिसके एवज में उसे प्रीमियम, गारंटी और नियमित लीज आय मिलेगी।
भाजपा सरकार है या दुकानदार?
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) August 25, 2026
अब उप्र की भाजपा सरकार ने लखनऊ के JPNIC (जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर) को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय कैबिनेट में ले लिया है।
अब तो बस सरकार को ही ठेके पर देना या बेचना बचा है।
‘कमीशन’ भ्रष्ट भाजपा की गाड़ी का तेल-पानी है और ‘निजीकरण’ उसका… pic.twitter.com/JtY9oMSD5L
इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो सीधे ‘JPNIC बेच दिया गया’ कह देना पूरे मामले को बहुत ज्यादा सरल बना देना है।
’97 हजार करोड़’ वाली रिपोर्ट का JPNIC से क्या नाता है
अखिलेश सरकार के दौर के वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर 2018 में एक और CAG रिपोर्ट सामने आई थी, जिसका ज़िक्र अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। 2014 से मार्च 2017 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े ₹97,906.27 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे और CAG ने कहा था कि इससे धन के दुरुपयोग का जोखिम पैदा होता है।
असली सवाल बेचने का नहीं, इस्तेमाल में लाने का है
पिछले करीब दस साल से JPNIC उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अधूरे वादे की तरह खड़ा रहा है और सैकड़ों करोड़ खर्च होने के बावजूद जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अब सरकार इसका संचालन मॉडल बदलने जा रही है।
बहस सिर्फ इस एक लाइन पर टिकी है कि ‘JPNIC बेच दिया गया’, तो मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह दावा टिकता नहीं दिखता। मामला बिक्री का नहीं, लंबी लीज और निजी भागीदारी से चलाए जाने का है।
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस प्रोजेक्ट की लागत 265 करोड़ से बढ़कर 865 करोड़ तक पहुँच गई, जिसके निर्माण में CAG ने ठेकेदार को दिए गए 1.41 करोड़ के अनुचित फायदे पर आपत्ति जताई और जो सालों तक अधूरा पड़ा रहा, उसी को अब पूरा कराने के लिए सरकार निजी पैसे का सहारा ले रही है।


