बंगाल का वो दौर आपको याद होगा जब पूरे राज्य में तुष्टिकरण का बोलबाला था। ऐसे चौराहे थे, जिन्हें एक खास समुदाय अपनी बपौती मान बैठा था, वो सड़कें- जहाँ नियमों को ताक पर रखकर नमाज पढ़ना आम बात बन चुकी थी, और वो लाचार व्यवस्था, जहाँ देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए BSF जवानों को भी ज़मीन का एक टुकड़ा पाने के लिए संघर्ष करना पड़।
जनता बेबस थी- चाहकर भी वे न तो केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का लाभ ले पा रही थी और न ही ‘आयुष्मान भारत’ के तहत अस्पतालों में इलाज करा पाती थी। ऐसा लगता था जैसे बंगाल देश की मुख्यधारा से पूरी तरह कट चुका हो, लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि जिस बंगाल में कभी बदलाव असंभव सा लगता था, मात्र 100 दिनों में बदलाव साफ़ और सीधा दिखने लगा है।
दरअसल, बदलाव की असली शुरुआत हुई 9 मई 2026 को! कोलकाता का वो ऐतिहासिक ‘ब्रिगेड परेड ग्राउंड’… जहाँ शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल जैसे दिग्गजों के मंच से एक साथ शपथ ली, तो पूरे बंगाल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और पश्चिम बंगाल की जनता में वापस से एक उम्मीद सी जगी कि अब शायद नया निजाम हमारे लिए कुछ बेहतर करेगा!
यह वही सपना था, जिसे पूर्व की टीएमसी सरकार ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए चूरन की तरह बाँटा… लेकिन जब धरातल पर काम करने की बारी आई, तो वे अपनी तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति में ही उलझे रहे।
पर इस बार माहौल कुछ अलग था! 9 मई के बाद बंगाल के इतिहास में पहली बार लोग बेखौफ होकर भगवा लहरा रहे थे, एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर मानो असली आजादी का जश्न मना रहे थे तो कुछ मंदिरों की घंटियाँ बजाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व महसूस कर रहे थे। मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज अब किसी को चुभ नहीं रही थी, बल्कि जनता के चेहरों पर बंगाल की बदलती तस्वीर साफ दिख रही थी और इन्हीं कुछ तस्वीरों को देखते 100 दिन बीत गए।
अब जब बंगाल में भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। तो आइए जानते हैं कि इन 100 दिनों के भीतर बंगाल की तस्वीर कितनी बदली है?
बंगाल में BSF को मिली भूमि
आपको याद होगा कि बंगाल में सालों तक बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए गृह मंत्रालय राज्य सरकार से ज़मीन माँगता रहा, लेकिन ममता सरकार ने अपने तुष्टिकरण के चक्कर में इसे लटकाए रखा और फिर खुली सीमा का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपनी मनमर्जी से भारत आते-जाते रहे, लेकिन राज्य में भाजपा सरकार बनने के महज दो हफ्तों के भीतर ही सीएम शुभेंदु अधिकारी ने इस पर सबसे बड़ा फैसला लिया और कहा, “हम सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को 27 किलोमीटर ज़मीन सौंपने जा रहे हैं।”
यह सिर्फ एक प्रशासनिक ऐलान नहीं था बल्कि इस आधिकारिक घोषणा का असर कुछ ऐसा हुआ कि आज विभिन्न सीमावर्ती जिलों में प्रक्रिया तेज़ करते हुए 1100 एकड़ से अधिक भूमि BSF को सौंपी जा चुकी है। इसका परिणाम ये है कि देश की सीमाएँ अब सुरक्षित होने वाली हैं। जिन बॉर्डर्स से अपनी मनमर्जी से बांग्लादेशी आते-जाते थे, वो अब सील हो रहे हैं।
आयुष्मान भारत की बंगाल में शुरुआत
इसी तरह केंद्र की क्रांतिकारी ‘आयुष्मान भारत योजना’, जिसे ममता बनर्जी ने सिर्फ़ राजनीतिक द्वेष के कारण राज्य में लागू नहीं किया था उसे शुभेंदु सरकार ने 16 अगस्त को पूरे राज्य में लागू कर दिया। इसके चलते आज बंगाल के लगभग 1 करोड़ 43 लाख परिवार यानी 6 करोड़ लोगों को हर साल 5 लाख रुपये तक के मुफ़्त कैशलेस इलाज का लाभ मिल सकेगा। यहां तक कि अब बंगाल के 1,240 निजी और 627 सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ, राज्य के नागरिक देशभर के 38 हज़ार से अधिक सूचीबद्ध अस्पतालों में मुफ़्त इलाज का लाभ उठा सकेंगे।
पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत का नया अध्याय!
— Ministry of Health (@MoHFW_INDIA) August 16, 2026
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने कोलकाता में ‘आयुष्मान दिवस’ के अवसर पर अपने संबोधन में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य को साकार करने में आयुष्मान भारत की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश… pic.twitter.com/yDEJCqPanm
आवास योजना
ममता सरकार ने सिर्फ़ केंद्र सरकार से बैर के चलते राज्य के गरीब लोगों को आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा था। यही नहीं प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी ममता सरकार में जमकर धांधली और भ्रष्टाचार की बातें सामने आईं थीं। मगर, शुभेंदु सरकार ने सत्ता में आते ही इस पूरे सिस्टम का शुद्धिकरण किया।
राज्य में इसे पारदर्शी बनाते हुए ‘पश्चिम बंगाल आवास योजना’ का रूप दिया गया। हाल ही में एक कार्यक्रम के जरिए राज्य के 10.20 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों के खातों में सीधे ₹6122.27 करोड़ की राशि भेजी गई है। इतना ही नहीं, पिछली टीएमसी सरकार द्वारा तैयार की गई 30 लाख लोगों की संदेहास्पद सूची की जाँच की गई तो उसमें 12 लाख से अधिक अयोग्य और फर्जी नाम सामने आए जिन्हें शुद्धिकरण के तहत हटाया गया।
सरकार का संदेश साफ है- बिना किसी धर्म, जाति या राजनीतिक भेदभाव के, योजना का शत-प्रतिशत लाभ केवल असली ज़रूरतमंदों को ही मिलना चाहिए। इसी का परिणाम है कि वर्तमान में 18 लाख से अधिक पात्र परिवारों के मकानों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।
अन्नपूर्णा योजना
चुनाव के दौरान भाजपा का प्रमुख वादा था कि सरकार बनने पर महिलाओं के लिए ‘अन्नपूर्णा योजना’ लागू की जाएगी। सरकार ने पहले ही चरण में इसे ज़मीन पर उतारा। आज इस योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं को ₹3,000 प्रति माह की सीधी वित्तीय सहायता दिए जाने का काम शुरू हो गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 1.45 करोड़ पात्र महिलाओं को इस योजना के तहत 3,000 रुपए मिलेंगे।
भाजपा जो वादा करती है उसे पूरा भी करती है 🪷
— BJP Scheduled Tribe Morcha (@BJPSTMORCHA) June 4, 2026
बंगाल में महिलाओं के लिए शुरू की गयी अन्नपूर्णा योजना।
पहले चरण में 28.25 लाख महिलाओं के खाते में हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता।#AnnapurnaYojana pic.twitter.com/YMckebYkfp
तो ये वह कुछ जनकल्याणकारी योजनाएँ थीं जिनसे ममता सरकार ने राजनीतिक द्वेष व मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते बंगाल की जनता को आज तक वंचित रखा था।
अब बात करते हैं पश्चिम बंगाल के विकास और कानून व्यवस्था की…
मेट्रो का सुलझा मुद्दा
शुभेंदु सरकार आने से पहले बंगाल में कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन से जुड़ा एक 62 मीटर का एक गैप भरने का काम प्रशासनिक अड़चनों के कारण रुका हुआ था।
बंगाल में 15 सालों से अटका काम 15 दिन में पूरा
— Panchjanya (@epanchjanya) May 25, 2026
जो काम ममता बनर्जी 15 सालों में नहीं कर पाईं, उसे सुवेंदु अधिकारी और भाजपा सरकार ने सिर्फ 15 दिनों में कर दिखाया है।
रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन के तहत आने वाले और लंबे समय से लटके 'चिंगरीघाटा… pic.twitter.com/cc8emGW7xc
ममता सरकार तो ट्रैफिक का हवाला देते हुए इसके खिलाफ कोर्ट तक चली गई थी कि ये नहीं हो सकता। लेकिन नई सरकार बनते ही जो अनुमति मिलने का काम सालों से अटका था, वह चंद दिनों में हल हो गया और फिर 15 मई को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि कोलकाता पुलिस की अनुमति समेत तमाम एनओसी (NOC) जारी कर दी गई हैं।
जूट मीलें दोबारा शुरू
इसी तरह टीएमसी शासन में तालाबंदी का शिकार हुई ऐतिहासिक जूट मिलों को दोबारा शुरू किया गया। सुनने में भले ये सामान्य लगे लेकिन श्रम विभाग की त्वरित कार्रवाई के चलते जो 14 जूट मिलें फिर से चालू हुई हैं उनसे हज़ारों मज़दूरों को अपने ही राज्य में रोजगार मिल सकेगा।
कानून व्यवस्था और डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट
इसके बाद शुभेंदु सरकार के आने के बाद सबसे बड़ा असर अगर देखें तो राज्य की कानून-व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। उपद्रवियों और सिंडिकेट राज पर नकेल कसने के लिए ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ लागू किया गया।
‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति का असर जगह-जगह दिखा। याद करिए सत्ता परिवर्तन होते ही बांग्लादेशी सीमाओं पर भारत छोड़ने वाले घुसपैठियों की लंबी कतारें देखी गईं थीं। टीएमसी के नेता जहाँ राज्य में किसी भी घुसपैठिए की होने की बात को नकारते थे, वहीं उस कतार में समान बटोरे लोग खुद स्वीकार कर रहे थे कि वो घुसपैठिए हैं…
बंगाल में 15 सालों से अटका काम 15 दिन में पूरा
— Panchjanya (@epanchjanya) May 25, 2026
जो काम ममता बनर्जी 15 सालों में नहीं कर पाईं, उसे सुवेंदु अधिकारी और भाजपा सरकार ने सिर्फ 15 दिनों में कर दिखाया है।
रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन के तहत आने वाले और लंबे समय से लटके 'चिंगरीघाटा… pic.twitter.com/cc8emGW7xc
सालों से संरक्षण पा रहे अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क पर जब शिकंजा कसा, तो सिंडिकेट चलाने वाले सहाबुद्दीन मंडल जैसे अपराधियों का पर्दाफाश हुआ, जो बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ कराने में मुख्य रूप से शामिल था।
सड़कों पर किसी समुदाय की मनमानी नहीं बल्कि कानून का राज दिखना शुरू हुआ- लोग ये देखकर हैरान थे कि आखिर जिस रेड रोड पर नमाज़ के नाम पर घटों तक यातायात ठप कर दिया जाता था और जिसे पूर्व मुख्यमंत्री खुद बढ़ावा देती थीं, 2026 की ईद पर वही ‘रेड रोड’ कैसे पूरी तरह सुचारू नजर आया। वहाँ नमाज के नाम पर कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं, कोई आम जनता के लिए असुविधा नहीं थी।
क्या पड़ा बंगाल पर असर
कट-मनी वसूलने वाले टीएमसी नेताओं से हिसाब माँगना हो, बंद पड़े स्कूलों को खुलवाना हो और मंदिरों को पुनर्जीवित करना हो, या फिर उद्योगों के लिए भयमुक्त माहौल बनाना हो… इन 100 दिनों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि बंगाल की जनता को अब बिना डरे सच बोलने का साहस मिल गया है। जो बदलाव कभी नामुमकिन कहे जाते थे, वे अब धरातल पर हकीकत बन चुके हैं।
ममता बनर्जी के 15 साल के राज में 12 गुना बढ़ाया गया था अल्पसंख्यक और मदरसों का बजट
— OpIndia.tv (@OpIndia_tv) June 22, 2026
अब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने की 62% की कटौती; 5713 करोड़ रुपये से घटाकर 2165 करोड़ रुपये किया गया अल्पसंख्यक बजट
मुस्लिम तुष्टिकरण में कैसे बंगाल का खजाना लुटा रही थी ममता बनर्जी? समझा रहे हैं… pic.twitter.com/D8q0xbuhjH
मजहब देखकर वित्तीय सहायता देने का दौर पश्चिम बंगाल से अब जा चुका है और बंगाल के विकास की कहानी बेहतर इन्फ्रा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, महिला कल्याण, युवाओं के लिए रोजगार देखकर तय होनी शुरू हो गई है।


