76 साल के वीरेन्द्रनाथ तिवारी पर 16 साल से चल रहा था SC-ST के तहत केस, बॉम्बे HC ने अब जाकर रद्द किया: 2010 में दलित टीचर से योग्यता पूछने पर हुआ था मुकदमा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के वकील और लॉ कॉलेज के प्रोफेसर वीरेन्द्रनाथ तिवारी को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत 2010 के मामले को रद्द कर दिया।

जस्टिस अश्विन डी. भोबे ने कहा कि आरोप SC/ST एक्ट या भारतीय दंड संहिता के धाराओं के तहत अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं थे।कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में एफआईआर और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों से ऐसा साबित नहीं होता कि अपराध जो बताया गया है, वह हुआ है।

क्या है मामला

मुंबई के सिद्धार्थ लॉ कॉलेज की लेक्चरर चित्रा सालुंखे की शिकायत पर जून 2007 में लगाए गए थे। इसमें कहा गया था कि आरोपित तिवारी ने सालुंखे पर नकली सर्टिफिकेट जमा करने का आरोप लगाते हुए छाते से हमला किया।

मुंबई पुलिस ने तिवारी को एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया।

कोर्ट में आरोपित तिवारी ने अपनी दलीलें खुद रखीं। उन्होंने कहा कि सालुंखे ने एससी-एसटी एक्ट के तहत लगातार 3 शिकायतें तब दर्ज करवाईं, जब उन्होंने उनकी योग्यता और शैक्षणिक डिग्रियों पर सवाल उठाया। दरअसल ये बदले की कार्रवाई के तहत दर्ज किया गया है। वकील तिवारी ने ये भी कहा कि उन्हें ऐसे ही आरोपों में दो अन्य मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका है।

कोर्ट में सालुंखे के वकील ने माना कि एफआईआर में जाति सूचक अपमान की बात नहीं है। इसलिए एससी एसटी एक्ट की धारा 3(1) नहीं लागू होगी। हालाँकि उन्होंने दलील दी कि आईपीसी की धारा 323 और धारा 354 के तहत मामला जारी किया जाना चाहिए।

जस्टिस भोबे ने इस दलील को नहीं नाकाफी माना और वकील तिवारी को बरी कर दिया। अपने फैसले में जज ने कहा कि 74 साल के सीनियर सिटिजन वीरेन्द्रनाथ तिवारी की दलील सही है कि सालुंखे ने बदले की भावना से आरोप लगाया था।