दाँतों से काटा पुलिस को, डंडे-बैनर और जूते लेकर हमला किया: JNU में वामपंथी छात्रों ने फिर मचाया बवाल, FIR होने के बाद 51 हिरासत में

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर हिंसा और हंगामे का केंद्र बन गया है। गुरुवार (26 फरवरी) को वामपंथी छात्र संगठनों (JNUSU) ने शिक्षा मंत्रालय तक ‘लॉन्ग मार्च’ निकालने की कोशिश की, जो पुलिस के साथ खूनी झड़प में बदल गई।

इस बवाल के बाद दिल्ली पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए 51 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है, जिनमें छात्र संघ के 4 पदाधिकारी भी शामिल हैं। जानकारी के मुताबिक, वसंत कुंज नॉर्थ पुलिस ने इन छात्रों के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने, पुलिसकर्मियों पर हमला करने और चोट पहुँचाने जैसी गंभीर धाराओं (BNS 221, 121[1], 132 और 3[5]) के तहत FIR दर्ज कर ली है।

पुलिस पर हमला और ‘काटने’ की शर्मनाक करतूत

दिल्ली पुलिस के अनुसार, छात्रों को पहले ही बता दिया गया था कि कैंपस के बाहर विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद करीब 400-500 छात्र इकट्ठा हुए और जबरन मार्च निकालने लगे। जब पुलिस ने उन्हें बैरिकेड्स लगाकर रोका, तो छात्र हिंसक हो गए।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर डंडे, बैनर और जूते फेंके। इतना ही नहीं, पुलिस ने आरोप लगाया है कि कुछ छात्र इस हद तक गिर गए कि उन्होंने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को शारीरिक रूप से घायल करने के लिए उन्हें दाँतों से काट (Biting) लिया। इस हिंसक झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।

प्रशासन का आरोप: हिंसा छिपाने के लिए खेल रहे ‘विक्टिम कार्ड’

JNU प्रशासन ने इस पूरे हंगामे पर सख्त बयान जारी किया है। प्रशासन का कहना है कि छात्र संघ (JNUSU) उन 5 पदाधिकारियों के निलंबन के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहता है, जिन्होंने लाइब्रेरी में सरकारी संपत्ति और कैमरों की तोड़फोड़ की थी।

प्रशासन के मुताबिक, एक ‘महिला ओबीसी वाइस चांसलर’ पर जातिवाद के झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं ताकि छात्र अपनी हिंसा और अनुशासनहीनता को छिपा सकें। प्रशासन ने दो टूक कहा कि कैंपस में तोड़फोड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

बेबुनियाद आरोप और यूनिवर्सिटी की बदनामी

वामपंथी छात्र संगठन अपनी पुरानी रणनीति अपनाते हुए पुलिस पर बदसलूकी और डॉ अंबेडकर की तस्वीर के अपमान का आरोप लगा रहे हैं। हालाँकि, पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

पुलिस का कहना है कि वे केवल भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और किसी भी तस्वीर को जानबूझकर नुकसान नहीं पहुँचाया गया। यूनिवर्सिटी के भीतर जारी इस राजनीति और आए दिन होने वाले हंगामे से आम करदाताओं के पैसे और संस्थान की साख पर सवाल उठ रहे हैं।