ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की लेबर सरकार ने बड़ा राजनीतिक यू-टर्न लेते हुए विवादास्पद चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता से जुड़ा विधेयक हाउस ऑफ लॉर्ड्स के एजेंडे से हटा लिया है। यह फैसला कंजर्वेटिव पार्टी के बढ़ते दबाव और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीखी आलोचना के बाद लिया गया है।
इस कदम से हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से बेहद अहम चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस को सौंपने की योजना फिलहाल के लिए रुक गई है। हालाँकि, इस समझौते के तहत ब्रिटेन ने अमेरिका द्वारा संचालित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे के लिए 99 साल की लीज पहले ही तय कर ली थी, जिसके बदले ब्रिटेन को हर साल 101 मिलियन पाउंड मिलने थे।
यह बिल सोमवार (26 जनवरी 2026) को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में बहस और मतदान के लिए रखा जाना था लेकिन शुक्रवार को इसे वापस ले लिया गया। इससे पहले कंजर्वेटिव पार्टी ने एक प्रस्ताव लाकर ‘बदलते भू-राजनीतिक हालात’ का हवाला देते हुए इस बिल पर चर्चा और वोटिंग को टालने की माँग की थी।
कंजर्वेटिव नेताओं का दावा है कि चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस को सौंपने वाला यह बिल न केवल अमेरिका के साथ 1966 में हुए UK-USA संधि का उल्लंघन करता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के भी खिलाफ है। कंजर्वेटिव पार्टी ने सरकार के इस फैसले को ‘बड़ी जीत’ बताया है। उनका कहना है कि यह कीर स्टार्मर की ‘शर्मनाक चागोस सरेंडर’ नीति के खिलाफ जीत है। विपक्ष का आरोप है कि इस सौदे के तहत ब्रिटेन अपनी संप्रभु भूमि और टैक्सपेयर्स के करीब 35 अरब पाउंड मॉरीशस को दे देगा, जिसे वे चीन का करीबी सहयोगी बताते हैं।
कंजर्वेटिव पार्टी की शैडो विदेश मंत्री और विथम से सांसद प्रीति पटेल ने इसे ‘कीर स्टार्मर की शर्मनाक चागोस सरेंडर के खिलाफ खड़े सभी लोगों की बड़ी जीत’ बताया। उन्होंने मॉरीशस के साथ पहले से साइन किए गए ट्रांसफर डील को पूरी तरह रद्द करने की माँग भी की।
Breaking news on CHAGOS.
— Priti Patel MP (@pritipatel) January 23, 2026
In the face of relentless Conservative pressure, Labour have pulled their shameful Chagos Surrender Bill from Monday’s House of Lords order paper.
This is a major victory for everyone standing against Keir Starmer’s disgraceful Chagos Surrender.
The…
हालाँकि, सरकार ने साफ किया है कि यह बिल पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है और भविष्य में इसे दोबारा पेश किया जाएगा। सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा, “सरकार डिएगो गार्सिया में संयुक्त UK-USA सैन्य अड्डे को सुरक्षित रखने वाले इस समझौते के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, जो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।” सरकार ने कंजर्वेटिव पार्टी पर राष्ट्रीय सुरक्षा में दखल देने का आरोप भी लगाया है।
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 2025 में जब यह समझौता हुआ था तब इसका समर्थन किया था लेकिन इस हफ्ते उन्होंने अचानक रुख बदलते हुए ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में इसे ‘बेहद मूर्खतापूर्ण कदम’ करार दिया। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेने की मुहिम तेज कर रहे हैं। ट्रंप की इन टिप्पणियों से UK-US के रिश्तों में तनाव बढ़ गया है। कीर स्टारमर ने आरोप लगाया कि ट्रंप चागोस मुद्दे का इस्तेमाल बड़े सौदों में दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं, जिनमें ग्रीनलैंड और टैरिफ से जुड़े खतरे भी शामिल हैं।
हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीपसमूह 1960 के दशक से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय रहा है। उस समय ब्रिटेन ने मॉरीशस से इसे अलग कर ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी बनाया था। इस द्वीपसमूह में डिएगो गार्सिया भी शामिल है जहाँ 1970 के दशक में एक अहम संयुक्त UK-US सैन्य अड्डा स्थापित किया गया था, जो मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया में सैन्य अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
मॉरीशस इन द्वीपों पर अपनी संप्रभुता का दावा करता रहा है और उन्हें वापस पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय अदालतों और ट्रिब्यूनलों का रुख कर चुका है। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने एक गैर-बाध्यकारी फैसले में कहा था कि अगर ब्रिटेन चागोस को अपने पास रखता है तो मॉरीशस की डिकॉलोनाइजेशन प्रक्रिया अधूरी मानी जाएगी और ब्रिटेन को इन द्वीपों की संप्रभुता मॉरीशस को लौटानी चाहिए।
इसके बाद तत्कालीन कंजर्वेटिव प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की सरकार ने द्वीपों के हस्तांतरण को लेकर बातचीत शुरू की थी। आखिरकार 2024 में लेबर सरकार ने इस समझौते को अंतिम रूप दिया। इस डील में डिएगो गार्सिया पर 99 साल की लीज शामिल थी ताकि सैन्य अड्डा चलता रहे।

