PM मोदी के दौरे के बीच नीदरलैंड ने भारत को लौटाई चोल राजवंश की ऐतिहासिक ‘अनाइमंगलम कॉपर प्लेट्स’, 1700 में डच ईसाई मिशनरी लूटकर ले गए थे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाँच देशों के दौरे पर हैं। इसी बीच भारत को अपनी पुरानी संस्कृति से जुड़ी एक बड़ी कामयाबी मिली है। नीदरलैंड की सरकार ने चोल राजवंश के बहुत कीमती और ऐतिहासिक ताम्रपत्र (तांबे की प्लेट्स) भारत को वापस सौंप दिए हैं।

इन्हें ‘अनाइमंगलम कॉपर प्लेट्स’ या ‘लेडन प्लेट्स’ भी कहा जाता है। ये प्लेट्स 11वीं सदी की हैं और पिछले 300 सालों से नीदरलैंड की लेडन यूनिवर्सिटी में रखी हुई थीं। अपनी पुरानी विरासत को देश वापस लाने के लिए इसे एक बहुत बड़ा कदम माना जा रहा है।

ये ताम्रपत्र क्यों खास हैं?

ये तांबे की प्लेट्स चोल राजा राजराजा प्रथम और उनके बेटे राजेंद्र चोल के जमाने की हैं। इन सभी प्लेट्स का कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है। इसमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेट्स को एक गोल छल्ले में पिरोया गया है। इस छल्ले पर चोल राजवंश की शाही मुहर भी लगी है। इन प्लेट्स पर संस्कृत और तमिल भाषा में चोल वंश के इतिहास और उनके राज-काज के बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं।

इन प्लेट्स पर क्या लिखा है?

इन ताम्रपत्रों पर लिखा है कि कैसे उस समय के एक हिंदू राजा ने बौद्ध मठ को जमीन और गाँवों से मिलने वाला टैक्स दान में दिया था। यह बौद्ध मठ नागपट्टिनम में बना हुआ था। इतिहासकारों का कहना है कि यह इस बात का बहुत बड़ा सबूत है कि पुराने भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग मिल-जुलकर और शांति से रहते थे। इससे यह भी पता चलता है कि उस जमाने में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के बीच बहुत अच्छे व्यापारिक रिश्ते थे।

ये दस्तावेज विदेश कैसे पहुंचे थे?

साल 1700 के आस-पास भारत के समुद्री इलाकों पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। उसी दौरान एक डच ईसाई मिशनरी ने इन प्लेट्स को अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद साल 1862 में ये प्लेट्स नीदरलैंड की लेडन यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में रख दी गईं। भारत सरकार साल 2012 से ही इन ऐतिहासिक प्लेट्स को वापस देश लाने की कोशिश कर रही थी। अब जाकर सरकार को इस काम में बड़ी सफलता मिली है।