गुजरात के धोलेरा में बंजर और खारी जमीन पर पेड़ उगाने का एक अनोखा और सफल प्रयोग हुआ है। यहाँ ‘ड्रम प्लांटेशन तकनीक’ की मदद से 3,200 से ज्यादा पेड़ न सिर्फ बच गए हैं, बल्कि बहुत तेजी से बड़े हो रहे हैं। अगस्त 2025 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की कामयाबी को देखकर अब यहाँ 50,000 और नए पौधे लगाने की तैयारी है।
‘ड्रम प्लांटेशन तकनीक’ पेड़ लगाने का एक आधुनिक और अनोखा तरीका है। इसमें प्लास्टिक के बड़े ड्रमों का इस्तेमाल किया जाता है। इन ड्रमों के दोनों तरफ हवा के लिए छोटे छेद किए जाते हैं। फिर इन्हें करीब एक फीट तक जमीन में गाड़ दिया जाता है। इसके बाद ड्रम के अंदर पौधे को लगाया जाता है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
‘ड्रम प्लांटेशन तकनीक’ में पौधों को सीधे खारी मिट्टी में नहीं लगाया जाता। ड्रम के अंदर खास तरह की परतें बनाई जाती हैं। इसमें रेत, उपजाऊ मिट्टी और केंचुआ खाद डाली जाती है। साथ ही इसमें पराली और कोकोपीट (नारियल का बूरा) भी मिलाया जाता है। यह मिक्सचर पौधों को जरूरी पोषण देता है।
खारे पानी और नमक से कैसे मिलेगी मुक्ति?
धोलेरा की जमीन में नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है। यहाँ 6 महीने तक खारा पानी भरा रहता है। यह ड्रम तकनीक पौधों की नाजुक जड़ों के लिए एक ढाल की तरह काम करती है। प्लास्टिक का ड्रम बाहर के खारे पानी और नमक को जड़ों तक नहीं पहुँचने देता। पौधों को जिंदा रखने के लिए ड्रिप सिस्टम से अलग से मीठा पानी दिया जाता है। इससे पौधे खारेपन से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
बंजर इलाके में कैसे लौट रही है हरियाली?
‘ड्रम प्लांटेशन तकनीक’ का असर जादुई रहा है। एक साल से भी कम समय में पौधे 12 फीट तक ऊँचे हो गए हैं। यहाँ नीम, पीपल, बरगद और इमली समेत 15 प्रजातियों के पेड़ लहलहा रहे हैं। कई पेड़ों में तो फल भी आने लगे हैं। जिस जमीन पर पहले घास भी नहीं उगती थी, वहाँ अब हरियाली छा गई है। इस हरियाली को देखकर अब इलाके में पक्षी और तितलियाँ भी लौटने लगे हैं।
इस शानदार प्रोजेक्ट को वन विभाग और धोलेरा अथॉरिटी (DSIRDA) ने मिलकर चलाया है। इस सफलता से उत्साहित होकर सरकार ने 20 हेक्टेयर जमीन और दे दी है। अगले फेज में इसी ड्रम तकनीक से 50,000 और पौधे लगाए जाएँगे। जब ये पेड़ बड़े और मजबूत हो जाएँगे, तब इन प्लास्टिक के ड्रमों को निकालकर रीसायकल कर दिया जाएगा।

