शिकायत में कंपनी ने कहा कि नायर ने कंपनी और अडानी ग्रुप को टारगेट करते हुए उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के इरादे से कई ट्वीट और ऑनलाइन आर्टिकल प्रकाशित किए।
लगातार ट्वीट और लेख से प्रतिष्ठा धुमिल करने की कोशिश- कोर्ट
AEL ने तर्क दिया कि विवादित ट्वीट निष्पक्ष टिप्पणी या वैध आलोचना नहीं थे, बल्कि जनता और निवेशकों की नजर में कंपनी की विश्वसनीयता को कम करने के लिए किए गए थे। जानकारी के मुताबिक, जिन ट्वीट्स पर सवाल है, वे अक्टूबर 2020 और जुलाई 2021 के बीच नायर के सोशल मीडिया हैंडल ट्विटर (अब X) और एक वेबसाइट से पब्लिश किए गए थे।
कोर्ट ने माना कि लेख आलोचना से कहीं आगे था। कंपनी पर करप्शन, कानूनों में हेरफेर, सरकारी एजेंसियों का गलत इस्तेमाल और गलत राजनीतिक मदद का आरोप लगाने वाले साफ-साफ दावे थे।
कोर्ट ने देखा कि आरोप राय के बजाय फैक्ट्स के तौर पर पेश किए गए थे। इसके अलावा, जब ऐसे पोस्ट बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सर्कुलेट किए गए, तो वे इन्वेस्टर्स, रेगुलेटर्स, बिजनेस पार्टनर्स और समाज के लोगों के बीच कंपनी की धुमिल कर सकते हैं।
रवि नायर की दलीलें खारिज
कोर्ट ने नायर के नेक इरादे और पब्लिक इंटरेस्ट के बचाव को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नायर कंपनी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी भरोसेमंद मटीरियल रिकॉर्ड पर पेश करने में नाकाम रहे। कई महीनों तक ट्वीट्स का लगातार होना शिकायतकर्ता को बदनाम करने की जानबूझकर कोशिश थी न की आलोचना थी।
बोलने की आजादी के सवाल पर, कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के तहत मिला अधिकार पूरी तरह से नहीं है और यह आर्टिकल 21 के तहत उतने ही सुरक्षित प्रतिष्ठा के अधिकार को नजरअंदाज नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने माना कि प्रतिष्ठा जीवन के अधिकार का एक जरूरी हिस्सा है।

