प्याज-लहसुन वाले खाने की बात पर हुआ तलाक, फैमिली कोर्ट ने तलाक का आधार माना वैध: मेंटेनेंस की रकम बढ़ाने से गुजरात HC ने किया इंकार

गुजरात हाई कोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखा। यह मामला एक ऐसे पति-पत्नी से जुड़ा था, जिनकी 23 साल पुरानी शादी प्याज और लहसुन के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के कारण टूट गई।

पत्नी स्वामीनारायण पंथ का पालन करती थी और प्याज-लहसुन नहीं खाती थी, जबकि पति और उसके परिवार के लिए इन दोनों चीजों का भोजन में उपयोग सामान्य था। पति ने कोर्ट को बताया कि उसकी माँ को रोज दो तरह का खाना बनाना पड़ता था, पत्नी के लिए बिना प्याज-लहसुन का और परिवार के बाकी सदस्यों के लिए सामान्य खाना।

वहीं पत्नी का कहना था कि उसकी यह खाने से संबंधी आदत शादी से पहले ही पति को पता थी। हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच ने माना कि धार्मिक आस्था से जुड़े खाने के नियम ही दोनों के बीच बढ़ते तनाव और अलगाव का मुख्य कारण रहे।

यह मामला सीधे तलाक को लेकर नहीं, बल्कि भरण-पोषण (maintenance) संबंधी विवाद के कारण हाई कोर्ट पहुँचा था। पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई मेंटनेंस राशि बढ़ाने की माँग की, जबकि पति हर महीने पैसे देने के बजाय एक बार में रकम चुकाना चाहता था।

हाई कोर्ट ने दोनों की अपीलें खारिज करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति की आय, उसकी जिम्मेदारियों (माता-पिता और बड़े बेटे की देखभाल) और पत्नी द्वारा पहले दिए गए बयानों को ध्यान में रखकर सही निर्णय लिया था।

कोर्ट ने तय किया था कि पति पत्नी को जुलाई 2013 से जुलाई 2020 तक ₹8,000 प्रतिमाह और जुलाई 2020 से आगे ₹10,000 प्रतिमाह देगा। हाई कोर्ट ने पाया कि कोई भी पक्ष ऐसा नया सबूत नहीं दे पाया जिससे इस राशि या भुगतान के नियम में बदलाव किया जा सके।

इस विवाद की शुरुआत 2007 में हुई, जब पति ने अहमदाबाद महिला पुलिस स्टेशन में पत्नी पर उत्पीड़न और परेशान करने की शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पत्नी अपने बच्चे के साथ मायके चली गई।

उसी साल दोनों के बीच रिश्ते को बचाने के लिए एक समझौते (MOU) पर भी हस्ताक्षर हुए, लेकिन सुलह संभव नहीं हो सकी। आखिरकार पति ने 2013 में परेशान हो कर तलाक की याचिका दायर की।

मई 2024 में फैमिली कोर्ट ने तलाक मंजूर कर दिया, जिसे दोनों पक्षों ने चुनौती नहीं दी। हाई कोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए तलाक और भरण-पोषण से जुड़े आदेश को बरकरार रखा।