न्यायमूर्ति ए. मुहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की खंडपीठ ने एक अन्य मामले में लगाए गए जुर्माने के पैसे से ट्यूशन फीस के लिए ₹91,000 भी जुटाए।
कोर्ट नशामुक्ति के बाद लोगों के पुनर्वास पर जोर देता रहा है। कोर्ट का मानना है कि नशे की लत के लिए दंडित करने के बजाय उसे सुधार के लिए समाज में शामिल किया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा, “उन्हें (नशे के आदी लोगों को) यह महसूस होना चाहिए कि व्यवस्था उनके साथ है।”
न्यायालय ने एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया जहाँ एक व्यक्ति ने नशे की हालत में अपनी ही माँ के साथ बलात्कार किया। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में भी, सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
दरअसल नशे का आदी युवक के पिता ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उनके बेटे ने दवा लेना छोड़ दिया है। वह मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। उसे एंटी-साइकोटिक और एंटी-कन्वल्सेंट दवाएँ दी गई थीं। लेकिन इलाज के दौरान बेटे को एनडीपीएस एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और उसने दवा लेने से मना कर दिया। यहाँ तक कि बेल मिलने के बाद भी उसने दवा का सेवन नहीं किया।
न्यायालय के निर्देश पर, याचिकाकर्ता के बेटे को एक सरकारी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, लेकिन वहाँ एक बाईस्टैंडर व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य थी।
इसके बाद याचिकाकर्ता पिता ने बाईस्टैंडर व्यक्ति को हटाने की माँग करते हुए कोर्ट का रुख किया। उसने कहा कि वह ऑटो चालक है और उसकी पत्नी नौकरानी का काम करती है। इसलिए एक व्यक्ति के खर्च को वे वहन नहीं कर सकते।
कोर्ट ने उनकी पक्ष में फैसला सुनाया। हालाँकि इस मामले को तब तक लंबित रखा गया, जब तक कि युवक को छुट्टी नहीं मिल गई।
इसके बाद न्यायालय ने उससे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की और पाया कि वह औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में एक पाठ्यक्रम में शामिल होना चाहता है।
न्यायमित्र के रूप में नियुक्त अधिवक्ता वी रामकुमार नांबियार ने न्यायालय को सूचित किया कि अलुवा स्थित समाज कल्याण संस्थान युवक को प्रवेश देने के लिए तैयार है।
हालाँकि, पाठ्यक्रम में आवेदन करने की अंतिम तिथि बीत चुकी थी। इसके बाद न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीवीईटी) और केंद्र सरकार को पक्षकार बनाया और उनसे उसके लिए अंतिम तिथि बढ़ाने पर विचार करने को कहा।
अधिकारियों ने उनकी बात मान ली और कुछ ही दिनों में उसे कॉलेज में प्रवेश मिल गया। याचिकाकर्ता के वकील जॉन एस राल्फ ने ₹25,000 की अग्रिम फीस का भुगतान किया।
हालाँकि, न्यायालय ने जोर देकर कहा कि वह किसी अन्य मामले में लगाए गए खर्च से ₹91,000 की पूरी फीस का भुगतान करेगा। इसलिए, न्यायालय ने केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को पूरी राशि जारी करने और वकील को भी धन वापस करने का निर्देश दिया।
न्यायालय युवक की प्रगति पर नजर रखेगी। इसके लिए न्यायमित्र को हर दो महीने में एक बार उससे बात करने का निर्देश दिया।

