नेपाल में नई राजनीतिक लहर, बालेन शाह की RSP 86 सीटों पर आगे: ओली पिछड़े, Gen-Z आंदोलन के बाद चुनाव में पुरानी पार्टियाँ साफ

नेपाल में हुए आम चुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझानों ने देश की राजनीति में बड़ा उलटफेर होने के संकेत दे दिए हैं। गुरुवार (5 मार्च 2026) को हुए इस चुनाव में अब तक के रुझानों में पुरानी और पारंपरिक पार्टियाँ काफी पीछे नजर आ रही हैं, जबकि युवाओं के समर्थन से उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) जबरदस्त बढ़त बनाती दिख रही है।

खास तौर पर झापा-5 सीट पर रैपर से नेता बने और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह चार बार के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से आगे चल रहे हैं। यदि शुरुआती रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो नेपाल में 36 साल बाद किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल सकता है।

नेपाल में प्रतिनिधि सभा की 275 सीटों के लिए मतदान हुआ था, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई। देशभर में 10963 मतदान केंद्र बनाए गए थे। चुनाव आयोग के अनुसार, 165 सीटों का फैसला सीधे मतदान यानी फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली से होगा, जबकि 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से तय होंगी। मुख्य चुनाव आयुक्त राम प्रसाद भंडारी ने कहा है कि 9 मार्च 2026 तक पूरी मतगणना खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।

बालेन शाह की पार्टी का दबदबा, पुरानी पार्टियाँ पीछे

मतगणना के शुरुआती रुझानों में बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी बड़ी ताकत बनकर उभरी है। हालाँकि वो पार्टी के अध्यक्ष नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री पद के चेहरे हैं। अब तक आए रुझानों में पार्टी 101 सीटों पर आगे चल रही है। इसके मुकाबले नेपाली कॉन्ग्रेस सिर्फ 12 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (UML) महज 9 सीटों पर आगे है। श्रम शक्ति पार्टी एक सीट पर बढ़त बनाए हुए है।

काठमांडू-4 सीट पर RSP के उम्मीदवार पुकार बाम ने भी शानदार बढ़त बना ली है। उन्हें 9821 वोट मिले हैं, जबकि नेपाली कॉन्ग्रेस के सचिन तिमलसेना को 2744 वोट और UML के राजन भट्टराई को 2327 वोट मिले हैं।

झापा-5 सीट पर भी मुकाबला बेहद दिलचस्प बना हुआ है, जहाँ शुरुआती गिनती में बालेन शाह को 814 वोट मिले हैं, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को 384 वोट मिले हैं।

Gen-Z आंदोलन के बाद पहली बार चुनाव, भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा

नेपाल में यह चुनाव पिछले साल सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन के बाद पहला आम चुनाव है। उस आंदोलन के बाद केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार गिर गई थी और प्रतिनिधि सभा भंग कर दी गई थी। इसके बाद सुशीला कार्की को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था।

इस चुनाव में भ्रष्टाचार, सुशासन, भाई-भतीजावाद का अंत और राजनीति में नई पीढ़ी की भागीदारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। कुल 1 करोड़ 89 लाख मतदाता इस चुनाव में वोट डालने के पात्र थे और 65 राजनीतिक दलों के 3400 से अधिक उम्मीदवार मैदान में हैं। नेपाल में पिछले 18 वर्षों में 14 सरकारें बदल चुकी हैं, जिससे देश की राजनीति काफी अस्थिर रही है।

सबहेड: ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति से भारत के लिए खुल सकते हैं नए अवसर

नेपाल की राजनीति में उभर रही राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) की ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति भारत के लिए कई नए अवसर लेकर आ सकती है। पार्टी का कहना है कि नेपाल को भारत और चीन के बीच एक ‘ज्वलंत पुल’ बनाया जाए, जिससे तीनों देशों को आर्थिक फायदे मिल सकें।

RSP 1950 की भारत-नेपाल संधि को नए सिरे से तैयार करने की बात भी कर रही है, ताकि दोनों देशों के रिश्ते ज्यादा पारदर्शी, व्यावहारिक और मौजूदा समय के मुताबिक बन सकें।

इस सोच का सबसे बड़ा फायदा भारत को आर्थिक और तकनीकी सहयोग के रूप में मिल सकता है। नेपाल ने आने वाले समय में 30 अरब डॉलर की IT इंडस्ट्री खड़ी करने का लक्ष्य रखा है। अगर भारत और नेपाल मिलकर इस दिशा में काम करते हैं तो इससे भारत की टेक कंपनियों, निवेश और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिल सकता है।

साथ ही ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच साझेदारी मजबूत हो सकती है। हालाँकि RSP चीन से दूरी बनाने की बात नहीं करती, लेकिन उसका ‘नेपाल फर्स्ट’ नजरिया संतुलित विदेश नीति की ओर इशारा करता है। ऐसे में नेपाल में अगर नई राजनीतिक दिशा बनती है, तो यह भारत के लिए केवल चुनौती नहीं बल्कि सहयोग और विकास की नई संभावनाओं का रास्ता भी खोल सकती है।

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