दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज और मणिपुर हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस, जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल द्वारा 16 साल के न्यायिक कार्यकाल के दौरान एलपीजी गैस एजेंसी चलाने का मामला सामने आया है। न्यायिक आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए, भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने उनकी ‘किचन फ्लेम’ एजेंसी की डीलरशिप रद्द कर दी है।
दरअसल किसी भी संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति दूसरा ऐसा काम नहीं कर सकता, जिससे आर्थिक लाभ हो। संविधान के तहत कोर्ट के जज का शपथ ग्रहण होता है। ये उसका भी उल्लंघन है।
साथ ही अलिखित आचार संहिता के तहत उसे सरकार या किसी राजनीतिक पार्टी, सरकारी या गैरसरकारी संस्थानों, कंपनियों या पीएसयू से किसी भी तरह का आर्थिक, व्यापारिक या कॉन्ट्रेक्ट वाला संबंध रखने की मनाही है। यह नैतिकता का भी तकाजा है कि जज की कुर्सी पर आसीन व्यक्ति किसी दूसरे काम से नहीं जुड़ सकता। रिटायर जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल ने इसका उल्लंघन किया है।
दिल्ली हाईकोर्ट से शुरू किया करियर
रिपोर्ट के मुताबिक, रिटायर्ड जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल ने 1986 में एक वकील के तौर पर दिल्ली हाईकोर्ट से अपनी करियर शुरू की। 22 साल की प्रैक्टिस के बाद वे दिल्ली हाईकोर्ट में ही जज के रूप में नियुक्त हुए। करीब 15 साल बाद 2023 में पदोन्नति के साथ उनका ट्रांसफर मणिपुर हाईकोर्ट में हुआ। यहाँ वे चीफ जस्टिस बने। लेकिन हाईकोर्ट में वकालत करने से पहले उन्होंने 1983 में ‘किचन फ्लेम’ नाम की एलपीजी एजेंसी बनाई थी।
इस एजेंसी का बीपीसीएल के साथ 1984 में ही समझौता हुआ था। इसे 25 अगस्त 1995, 24 अगस्त 2005, 23 अगस्त 2010, 25 अगस्त 2015, 7 मई 2025 और 29 सितंबर 2025 तक रिन्यू किया गया। इसकी वैधता 2030 तक है, लेकिन अब जब मामला सामने आ गया है तो बीपीसीएल ने एजेंसी की मान्यता रद्द कर दी है।
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— Indian Advocate (@AdvocateIndian) July 16, 2026
सवाल यह है कि वकालत शुरू करने से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में जज बनने और मणिपुर हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनने तक उन्होंने कभी भी अपने एजेंसी के बारे में कोर्ट को आधिकारिक रूप से सूचना नहीं दी। जबकि नियम के मुताबिक, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को पारदर्शिता के तहत हितों के टकराव यानी कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट से बचने के लिए किसी भी तरह के आर्थिक स्रोत या हिस्सेदारी की जानकारी देना जरूरी है।
ऐसे में जज के रूप में उन्होंने पूरे कार्यकाल में आचार संहिता का उल्लंघन किया है क्योंकि 1984 में ही उनकी कंपनी का भारत पेट्रोलियम के साथ डील हो गई थी। एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप का यह डील रिन्यू होते होते उनके रिटायर्ड होने के बाद तक जारी रहा। उन्होंने कभी भी अपने जज होने की जानकारी भारत पेट्रोलियम को नहीं दी। 21 नवंबर 2024 को मणिपुर हाईकोर्ट से चीफ जस्टिस के रूप में सिद्धार्थ मृदुल रिटायर हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कोई जज गैस एजेंसी कैसे चला सकता है?
कैसे खुला पूरा मामला
दरअसल बीपीसीएल को दिसंबर 2025 में शिकायत मिली कि रिटायर जज सिद्धार्थ मृदुल की एजेंसी उनके पद पर रहते हुए पिछले 16 साल से बीपीसीएल की गैस डिस्टीब्यूटर है। इस पर बीपीसीएल ने 29 मई 2026 को पूर्व जस्टिस मृदुल को नोटिस भेजा।
उन्होंने जब नोटिस का जवाब नहीं दिया तो एक के बाद एक कई नोटिस भेजे। कई नोटिसों के बावजूद जब पूर्व जज ने जवाब नहीं दिया तो कंपनी ने उनकी डीलरशिप रद्द कर दी। इसके बाद एजेंसी चला रही मोनिका यादव ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके बाद सारा मामला सामने आ गया।
नोटिस में क्या कहा बीपीसीएल ने
कंपनी ने तर्क दिया कि बगैर कंपनी को जानकारी दिए, जस्टिस और चीफ जस्टिस रहते हुए डील को जारी रखना, समझौते की शर्तों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। इसलिए क्यों न उनके डीलरशिप को रद्द कर दिया जाए।
बीपीसीएल ने कहा, प्रथम दृष्टि में ऐसा लगता है कि डीलरशिप समझौते के दौरान आपने न्यायिक पद पर काम करने और आपकी गैरमौजूदगी में इसका संचालन किसी और द्वारा किए जाने को लेकर कंपनी को कभी जानकारी नहीं दी गई।
बीपीसीएल ने इसको लेकर 30 जनवरी 2026 और 29 फरवरी 2026 को लिखे लेटर का भी जिक्र किया है, जिसमें उनसे स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया था।
हाईकोर्ट में ‘किचन फ्लेम’ एजेंसी का तर्क
‘किचन फ्लेम’ एजेंसी के मालिक पूर्व जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल हैं, लेकिन उसका संचालन मोनिका यादव नाम की महिला करती है। उन्होंने एजेंसी का प्रोपराइटरशिप अपने नाम करने का आवेदन बीपीसीएल को किया था। हाईकोर्ट में अर्जी डालकर उन्होंने ऐसा करने का निर्देश बीपीसीएल को देने का आग्रह किया। उसका कहना है कि भले ही पूर्व जस्टिस ने बीपीसीएल के कई नोटिस का जवाब नहीं दिया हो, लेकिन वह तो पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रही है और सारे नियम का पालन करते हुए एजेंसी चला रही है, इसलिए बीपीसीएल उसके साथ डील करे।
एजेंसी चाहे जो भी तर्क दे, लेकिन यह मामला मात्र डीलरशिप का नहीं है। यह एक जज जैसे उच्च पद पर विराजमान व्यक्ति से जुड़ा है, जिससे नैतिकता के उच्च मानदंड का पालन करने की देश और समाज उम्मीद करता है। उन्होंने अपने डीलरशिप को लगातार रिन्यू कराया और इस दौरान एजेंसी से सच्चाई छिपाई, जज के रूप में शपथ ली उस वक्त भी सच्चाई छिपाई। इस तरह झूठ बोल कर कोई जज अपनी एजेंसी चलाए, तो नैतिकता की बात करना भी बेमानी है।

