सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वह मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण रखने के पक्ष में नहीं है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 21 अप्रैल 2026 को 9 जजों की संविधान बेंच के सामने स्पष्ट किया कि सरकार का मकसद धार्मिक संस्थाओं को काबू करना बिल्कुल नहीं है। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि वर्तमान में देश के हजारों बड़े मंदिर अलग-अलग राज्यों के सरकारी बोर्डों द्वारा चलाए जा रहे हैं।
संविधान की व्याख्या पर छिड़ी बहस
कोर्ट में बहस इस बात पर थी कि क्या सरकार को धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में दखल देना चाहिए। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने आरोप लगाया था कि केंद्र की दलीलें मंदिरों पर सरकारी कब्जे को सही ठहरा रही हैं।
इस पर तुषार मेहता ने तुरंत सफाई दी कि उनके बयानों का गलत मतलब निकाला गया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सरकार सिर्फ धार्मिक संस्थाओं के आर्थिक और राजनीतिक कामों में ही नियम बना सकती है, उनकी धार्मिक परंपराओं में नहीं।
सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा कानून
सुनवाई के दौरान जब जस्टिस अमनुल्लाह ने पूछा कि क्या यह रुख सिर्फ हिंदू मंदिरों के लिए है, तो सरकार ने स्पष्ट किया कि इसे किसी एक धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। तुषार मेहता ने कहा कि कानून हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या किसी भी अन्य धर्म पर समान रूप से लागू होता है। जस्टिस बागची ने भी सहमति जताई कि ऐसे मामलों को ‘धर्म’ के बजाय ‘नागरिकों के अधिकार’ के तौर पर देखा जाना चाहिए।
फिलहाल भारत के कई बड़े और प्रसिद्ध मंदिर सरकारी बोर्डों के अधीन हैं। केरल का त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड करीब 3000 मंदिरों (जैसे सबरीमाला) की देखरेख करता है। तमिलनाडु में सरकार 30,000 से ज्यादा मंदिरों का प्रबंधन संभालती है। इसके अलावा तिरुपति बालाजी और उत्तराखंड के चार धाम (बद्रीनाथ-केदारनाथ) भी सरकारी बोर्डों के जरिए ही मैनेज किए जाते हैं।

