POCSO में केस, संत भी कर रहे किनारा: जानिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर क्यों उठ रहे सवाल

ज्योतिर्मठ के ‘शंकराचार्य’ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों धार्मिक, सामाजिक और कानूनी-तीनों स्तरों पर विवादों में घिरे हुए हैं। कुछ संत उनके बयानों से न केवल दूरी बनाते दिख रहे हैं, बल्कि उनकी मुखर आलोचना भी कर रहे हैं। ऐसे में अदालत के आदेश पर दर्ज हुए पॉक्सो मामले ने स्थिति को अत्यंत गंभीर बना दिया है।

पहले के उनके विवादों से इतर, इस बार प्रकरण केवल व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा की गरिमा और संत समाज की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न भी बन गया है।

संत समाज की नाराजगी

हाल के दिनों में कई प्रमुख संतों ने अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों और कार्यशैली पर सार्वजनिक आपत्ति दर्ज कराई है। जिस प्रकार, वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे संत समाज न केवल आहत है, बल्कि खुलकर उनका विरोध कर रहा है।

इस विषय में हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने तो उनके वक्तव्यों को ‘शंकराचार्य की गरिमा के प्रतिकूल’ बताते हुए सवाल उठाया। उन्होंने पूछा “शंकराचार्य की गद्दी पर बैठकर ऐसे शब्दों का प्रयोग क्या उचित है?”

उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की बयानबाजी सनातन समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करती है।

अखाड़ा परिषद, जगद्गुरु ने भी किया किनारा

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी भी अविमुक्तेश्वरानंद की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए कह चुके हैं, “संत समाज सरकार के साथ है।” उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद की आंदोलनात्मक शैली को ‘दादागिरी’ बताया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ऐसे आंदोलनों के पीछे एजेंडा और फंडिंग की जाँच होनी चाहिए

वहीं, जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने संगम पर हुए स्नान विवाद के संदर्भ में स्पष्ट कहा, “नियमों का पालन सभी को करना चाहिए और किसी प्रकार के अन्याय की बात निराधार है।”

राजनीतिक आरोपों से विश्वसनीयता पर चोट

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवादों का दायरा केवल धार्मिक मतभेदों तक सीमित नहीं रहा। जगद्गुरु प्रमोद कृष्णम ने तो सीधे आरोप लगाया, “अविमुक्तेश्वरानंद सनातन के कंधे पर बंदूक रखकर हिंदुओं को बाँटने का प्रयास कर रहे हैं और उनका उद्देश्य राजनीतिक लाभ पहुँचाना है।” उन्होंने इसे समाज को जातीय आधार पर विभाजित करने की कोशिश बताया। उनके अतिरिक्त, कई अन्य बड़े संत-महंत भी इस बात को दोहरा चुके हैं।

विवादों से पहले भी रहा नाता

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नाम इससे पहले भी कई बार विवादों में आ चुका है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूरी बनाना, धारा 370, सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दों पर आलोचनात्मक रुख।

शंकराचार्य पद पर भी सवाल

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के गाँव में उमाशंकर पांडेय के तौर पर जन्मे अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति भी विवादों से अछूती नहीं रही। 2022 में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में उनकी ताजपोशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुँचा।

याचिकाओं में कहा गया कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारंपरिक सहमति का अभाव था। हालाँकि उनके समर्थकों का दावा है कि वे अपने गुरु के नामित उत्तराधिकारी हैं और परंपरा के अनुसार उनकी नियुक्ति हुई है।

संगम पर स्नान को लेकर विवाद

प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान संगम स्नान को लेकर उत्पन्न विवाद से शुरू हुआ वर्तमान प्रकरण अब लगातार तेजी से नई जटिलताओं की ओर बढ़ रहा है। उस समय विवाद के बाद भी कुछ संतों ने अविमुक्तेश्वरानंद से किनारा कर लिया था। कई संतों ने प्रशासनिक नियमों के पालन को प्राथमिकता देने की बात कही थी। महंत रविंद्र पुरी ने तो यहाँ तक कहा, “ये मेले में जप-तप करने नहीं, राजनीति करने आए हैं।”

पॉक्सो मामले में कानूनी जाँच

इन सभी विवादों के बीच सबसे गंभीर स्थिति तब बनी, जब प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।

आरोप है कि विद्या मठ आश्रम में रहने वाले बटुकों के साथ यौन शोषण हुआ है। अदालत ने पीड़ितों के बयान और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर जाँच का आदेश दिया है।

ऐसे में, यह मामला केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि अत्यंत गंभीर आपराधिक श्रेणी में आता है, जिसकी जाँच और न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हालाँकि इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है, “सच्चाई जाँच के बाद सामने आएगी और झूठे आरोपों का पर्दाफाश होगा।”