सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि इस मामले में FIR दर्ज करने लायक कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। यह मामला CPI(M) नेता बृंदा करात की याचिका से जुड़ा था।
याचिका में उन्होंने केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया।
FIR पर कोर्ट की स्पष्ट राय
कोर्ट ने रिकॉर्ड और संबंधित भाषणों की सामग्री का अध्ययन करने के बाद कहा कि इनमें ऐसा कुछ नहीं पाया गया, जिससे किसी संज्ञेय अपराध का मामला बनता हो। कोर्ट ने माना कि भाषण किसी विशेष समुदाय को सीधे निशाना नहीं बनाते थे और न ही वे हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काने के स्पष्ट इरादे को दर्शाते हैं।
हालाँकि कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट को धारा 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज करने का आदेश देने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जाँच शुरू करने के शुरुआती चरण में ऐसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।
याचिका में 27 जनवरी 2020 को दिए गए अनुराग ठाकुर के कथित नारे “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को” का भी उल्लेख था। इसके अलावा प्रवेश वर्मा के भाषण और मीडिया इंटरव्यू का भी हवाला दिया गया, जिनमें शाहीन बाग में चल रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर विवादित बयान दिए गए थे।
करात ने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं ने अपने भाषणों में शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को बल प्रयोग से हटाने की धमकी दी। यह भी आरोप लगाया गया कि उनके भाषणों में मुस्लिमों को घरों में घुसकर रेप और हत्या करने वाला आक्रमणकारी बताकर उनके प्रति नफरत को बढ़ावा दिया गया।
हेट स्पीच कानून पर कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हेट स्पीच से निपटने के लिए कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की है, न कि न्यायपालिका की। कोर्ट ने माना कि ऐसे मुद्दे समाज में भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करते हैं, लेकिन कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जाकर नए कानून नहीं बना सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा कानूनों में कोई कमी नहीं बताई जा सकती, हालाँकि बदलते समय के अनुसार सरकारें चाहें तो नए प्रावधान या नीतियाँ बनाने पर विचार कर सकती हैं। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने बृंदा करात की याचिका को खारिज कर दिया।

