कुरान में लड़कियों के खतरे का नहीं कोई आधार, फिर भी दाऊदी बोहरा समुदाय में क्यों जारी?: SC ने केंद्र सरकार से माँगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं और लड़कियों के खतने (फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन-एफजीएम) की अमानवीय प्रथा पर सख्त रुख अपनाते हुए शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को केंद्र सरकार से जवाब माँगा। जस्टिस बीआर नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसायटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कानून एवँ न्याय मंत्रालय सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिए। कोर्ट ने इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए तत्काल कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह प्रथा मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा मुसलमानों में प्रचलित है, लेकिन इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं। वरिष्ठ वकील शशि किरण और साधना संधू ने कहा, “मजहब में इसका कोई आधार नहीं, कुरान में जिक्र भी नहीं। फिर भी बच्चियों पर ये क्रूरता क्यों? इससे गंभीर शारीरिक-मानसिक नुकसान होता है।”

लड़कियों के खतने पर रोक का क्या है मामला?

एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसायटी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के हवाले से बताया कि एफजीएम से संक्रमण, आजीवन दर्द, प्रसव जटिलताएँ और कई स्वास्थ्य खतरे पैदा होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का जिक्र करते हुए इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन कहा गया।

याचिका में खुलासा किया गया कि भारत में दाऊदी बोहरा समुदाय की करीब 75 फीसदी महिलाएँ अपनी बेटियों पर यह प्रक्रिया करवाती हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन भारत में कोई विशेष कानून नहीं है। वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराएँ और पॉक्सो एक्ट इसे अपराध मानते हैं, फिर भी अमल की कमी है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चूँकि मामला नाबालिग लड़कियों के अधिकारों से जुड़ा है, इसे प्राथमिकता दी जाएगी। याचिकाकर्ताओं ने माँग की कि एफजीएम को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित कर सजा का प्रावधान हो। केंद्र सरकार को अब अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।

यह फैसला महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक जागरूकता के साथ कानूनी सख्ती जरूरी है, ताकि ऐसी प्रथाएँ जड़ से समाप्त हों।