‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुश्दी पर न्यूयॉर्क में साल 2022 में हुए जानलेवा हमले के मामले में अमेरिका की फेडरल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। 28 साल के हादी मतार को आतंकवाद से जुड़े गंभीर आरोपों में दोषी ठहराया गया है। अमेरिकी फेडरल जूरी ने माना कि उसने सुनियोजित तरीके से हमला किया और विदेशी आतंकी संगठन हिज्बुल्लाह से जुड़ी गतिविधियों का समर्थन किया।
फेडरल कोर्ट अब हादी मतार की सजा पर अंतिम फैसला सुनाएगी। अदालत ने इसके लिए 3 नवंबर की तारीख तय की है। आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए जाने के कारण उसे उम्रकैद तक की सजा मिल सकती है। अमेरिकी न्याय विभाग का कहना है कि इस फैसले से साफ संदेश गया है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ से प्रेरित हिंसा को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
फेडरल जूरी ने आतंकवाद से जुड़े आरोपों में ठहराया दोषी
अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, फेडरल जूरी ने हादी मतार को आतंकवाद की कार्रवाई में शामिल होने का दोषी माना है। अदालत ने यह भी माना कि उसने विदेशी आतंकवादी संगठन हिज्बुल्लाह को समर्थन देने की कोशिश की थी।
जाँच में यह भी सामने आया कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद फैलाने और आतंकी गतिविधियों में मदद करने से जुड़े आरोपों में भी दोषी है। अमेरिकी कानून के तहत इन आरोपों में उसे अधिकतम उम्रकैद तक की सजा मिल सकती है।
हादी मतार के खिलाफ यह पहला फैसला नहीं है। इससे पहले न्यूयॉर्क की राज्य अदालत उसे सलमान रुश्दी की हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहरा चुकी है। उस मामले में अदालत ने उसे 25 साल की जेल की सजा सुनाई थी। अब फेडरल कोर्ट में आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए जाने के बाद उसकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। दोनों मामलों की सजा अलग-अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होगी।
जाँच में क्या सामने आया?
अमेरिकी जाँच एजेंसियों ने दावा किया कि हादी मतार के घर से लेबनान के ईरान समर्थित उग्रवादी संगठन हिज्बुल्लाह से जुड़ी सामग्री बरामद हुई थी। इसी आधार पर अदालत ने उसे हिज्बुल्लाह को समर्थन देने का दोषी भी माना।
नेशनल सिक्योरिटी के असिस्टेंट अटॉर्नी जनरल जॉन आइजेनबर्ग ने अदालत में बताया कि हादी मतार एक साल से ज्यादा समय तक हिज्बुल्लाह की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित रहा। उसने लंबे समय तक हमले की तैयारी की और पूरी योजना बनाकर इस वारदात को अंजाम दिया।
1989 के फतवे से जुड़ा बताया गया हमला
अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि हादी मतार ने 1989 में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी द्वारा सलमान रुश्दी के खिलाफ जारी किए गए फतवे का अध्ययन किया था।
सरकारी वकीलों के मुताबिक, उसने उसी फतवे से प्रेरित होकर हमला करने की योजना बनाई थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि बाद के वर्षों में कई कट्टरपंथी नेताओं ने भी इस फतवे का समर्थन किया, जिससे उसकी सोच और मजबूत हुई।
अमेरिकी अटॉर्नी माइकल डिजियाकोमो ने कहा कि हादी मतार ने ईरान समर्थित कट्टरपंथी विचारधारा को अपनाया था। उसने कई महीनों तक योजना बनाई और फिर शांतिपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम में हमला किया।
असिस्टेंट अटॉर्नी जनरल जॉन आइजेनबर्ग ने कहा कि यह हमला केवल एक लेखक पर हमला नहीं था। यह दुनिया को यह याद दिलाने वाली घटना है कि ईरान समर्थित आतंकवाद की पहुँच कितनी व्यापक हो सकती है। उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले से न्याय हुआ है।
2022 में साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हुआ था हमला
सलमान रुश्दी पर हमला अगस्त 2022 में न्यूयॉर्क राज्य के चौटाउक्वा इंस्टीट्यूशन में हुआ था। उस समय सलमान रुश्दी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुँचे थे। कार्यक्रम शुरू होने से ठीक पहले हादी मतार अचानक मंच पर चढ़ गया।
इसके बाद उसने करीब छह इंच लंबे चाकू से सलमान रुश्दी पर कई बार हमला किया। इस हमले में सलमान रुश्दी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनकी गर्दन और पेट पर गहरे घाव आए थे। बाद में इलाज के दौरान उनकी एक आँख की रोशनी भी चली गई थी। इस घटना में कार्यक्रम के सह-संचालक भी घायल हुए थे।
सलमान रुश्दी लंबे समय से रहे हैं विवादों में
सलमान रुश्दी का उपन्यास ‘द सैटेनिक वर्सेज’ वर्ष 1988 में प्रकाशित हुआ था। इस किताब को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में विवाद हुआ था। मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने इस किताब पर ईशनिंदा का आरोप लगाया था।
इसी विवाद के बाद 1989 में अयातुल्ला खुमैनी ने सलमान रुश्दी की हत्या का फतवा जारी किया था। इसके बाद से वर्षों तक उनकी सुरक्षा बढ़ाई गई और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहीं।
हमले के बाद हिंसा पर जताई चिंता
हमले के बाद सलमान रुश्दी कई बार सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रख चुके हैं। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में विचारों को दबाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल बढ़ रहा है। सलमान रुश्दी ने चिंता जताई कि संस्कृति, पत्रकारिता, विश्वविद्यालय और लेखन जैसे क्षेत्रों को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना आज पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

