भगवंत मान की लापरवाही ने प्राकृतिक आपदा को मानव निर्मित त्रासदी में बदल दिया, लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जबकि केंद्र सरकार ने तुरंत मदद पहुँचाई।
पंजाब इस समय पिछले सत्तर वर्षों की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। पूरे 23 जिले और 2,000 से अधिक गाँव पानी में डूब चुके हैं। लाखों लोग बेघर हो गए हैं और 1.75 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि जलमग्न हो गई है। पूरी फसलें बर्बाद हो चुकी हैं और आने वाला बुवाई का मौसम भी खतरे में है। ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि उन किसानों की पीड़ा है जिनकी सालभर की मेहनत कुछ ही दिनों में बह गई। यह उन परिवारों का दर्द है जिनके घर उजड़ गए, और उन बच्चों की असहायता है जिनके पास अब स्कूल लौटने की जगह नहीं बची।
हालाँकि प्रकृति का कहर टालना संभव नहीं था, लेकिन इतनी बड़ी तबाही को रोका जा सकता था। इस संकट को बढ़ाने का असली कारण भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार की लापरवाही और असंवेदनशीलता है। यह आपदा केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि शासन की विफलता का प्रमाण बन गई है।
इस आपदा की मानवीय कीमत बहुत भयावह है। गुरदासपुर, अजनाला और ससराली जैसे जिलों में परिवारों को अपने घरों की छतों पर फँसा हुआ देखा गया, जो राहत कार्य के इंतजार में थे। माताएँ पूरी रात अपने बुखार से तपते बच्चों को गोद में उठाए पानी के बढ़ते स्तर से बचाने की कोशिश कर रही थीं। किसानों की आँखों में आंसू थे जब उन्होंने अपने खेतों की ओर इशारा किया, जहाँ कभी गेहूँ की लहलहाती फसल होती थी, अब सिर्फ रेत के ढेर थे।
लोगों में एक ही भावना थी त्याग दिए जाने की पीड़ा। गाँववालों ने कहा, “हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया गया है।” कई दिनों तक कोई डॉक्टर, कोई दवाई और प्रशासन का कोई कर्मचारी नहीं दिखा। विडंबना यह है कि AAP सरकार द्वारा प्रचारित मोहल्ला क्लीनिक इस आपदा के समय कहीं नजर नहीं आए। राहत कार्य का भार स्वयंसेवकों, सेना, NDRF जवानों, गुरुद्वारों और आम ग्रामीणों पर आ गया। राज्य की प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह नदारद रही।
इस संकट के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मुख्यमंत्री भगवंत मान खुद राज्य में मौजूद नहीं थे। जब गांव पानी में डूब रहे थे, तब मुख्यमंत्री तमिलनाडु में छुट्टियां मना रहे थे। जब हालात बेकाबू हो गए और लोगों का आक्रोश बढ़ा, तभी वे पंजाब लौटे। संकट के समय नेतृत्व की असली परीक्षा होती है, और इस परीक्षा में मान पूरी तरह असफल साबित हुए।
इससे भी बड़ी समस्या यह रही कि अरविंद केजरीवाल इस आपदा को भी राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल करने आ पहुँचे। पंजाब में कोई संवैधानिक पद न होने के बावजूद, केजरीवाल ने मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर, सुरक्षा और संसाधनों का उपयोग ऐसे किया जैसे यह उनका निजी राज्य हो। जब मौसम साफ होता है, तो वे फोटो खिंचवाने आते हैं, और जैसे ही हालात बिगड़ते हैं, तुरंत दिल्ली लौट जाते हैं। यह पंजाब की जनता के जनादेश का खुला मजाक है।
इस बीच, दिल्ली के शराब घोटाले में आरोपित मनीष सिसोदिया को पंजाब में तैनात कर दिया गया है। पंजाब को एक ऐसे परीक्षण मैदान में बदल दिया गया है, जहाँ असफल मॉडलों और भ्रष्ट नेताओं को बसाया जा रहा है। AAP के भीतर जो नेता इसका विरोध करते हैं, उन्हें चुप करा दिया जाता है। पठानमाजरा मामले में देखा गया कि जिसने भी आवाज उठाई, उसे धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
इस आपदा के बीच AAP मंत्रियों का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे राहत नौका पर बैठकर स्वीडन और गोवा की छुट्टियों की चर्चा कर रहे थे। जबकि लाखों पंजाबी बाढ़ में फँसे थे, उनके नेता मौज-मस्ती में लगे थे। यह असंवेदनशीलता और घमंड की पराकाष्ठा है, जिसे जनता कभी नहीं भूलेगी।
इसके बिल्कुल विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पंजाब का दौरा किया। उन्होंने हवाई सर्वेक्षण किया, गुरदासपुर में समीक्षा बैठक की, प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और तुरंत ₹1,600 करोड़ की राहत राशि की घोषणा की। इसके अलावा, पहले से ही पंजाब के राज्य राहत कोष में मौजूद ₹12,000 करोड़ को जोड़कर कुल ₹13,600 करोड़ अब बाढ़ राहत और पुनर्वास के लिए उपलब्ध हैं।
प्रधानमंत्री ने यह भी घोषणा की कि मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख, घायलों को ₹50,000, और अनाथ बच्चों की देखभाल PM CARES के तहत की जाएगी। उनका दीर्घकालिक दृष्टिकोण सिर्फ राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें घर और स्कूलों का पुनर्निर्माण, खेती को दोबारा खड़ा करना, पशुपालन को समर्थन, और जल संरक्षण प्रणालियों में निवेश शामिल है ताकि भविष्य में ऐसी तबाही दोबारा न हो।
यह तुलना बेहद स्पष्ट है। एक ओर गायब मुख्यमंत्री और विफल राज्य सरकार, जो सिर्फ प्रचार में लगी है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार, जो संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्य कर रही है। हालाँकि, राहत राशि तभी प्रभावी होगी जब उसका सही उपयोग और निगरानी की जाए।
यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हर एक रुपया पीड़ितों तक पहुँचे और केजरीवाल व उनकी टीम की जेब में न जाए। यह भी चिंताजनक है कि पहले बाढ़ प्रबंधन के नाम पर खर्च किए गए ₹230 करोड़ का अब तक कोई हिसाब नहीं दिया गया। अवैध बालू खनन के नेटवर्क और राहत राशि के दुरुपयोग की स्वतंत्र जाँच जरूरी है। किसानों को उनकी नष्ट हुई फसलों का उचित मुआवजा मिलना चाहिए और प्रभावित गाँवों में वास्तविक पुनर्वास कार्य दिखना चाहिए, न कि केवल सरकारी विज्ञापनों में।
इस आपदा से कई सबक लेने होंगे। तैयारी को विकल्प नहीं, अनिवार्यता बनाना होगा। मौसम विभाग और विशेषज्ञों की चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जवाबदेही तय करनी होगी, और जो लोग जनता की रक्षा करने में विफल रहे हैं उन्हें जिम्मेदार ठहराना होगा। राहत निधियों का पारदर्शी और ऑडिटेड खर्च सुनिश्चित करना होगा। पंजाब का शासन दिल्ली के राजनीतिक बॉसों के हाथों में नहीं, बल्कि पंजाब में रहकर करना होगा। और सबसे जरूरी, नेताओं को पंजाब को राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि गर्वित नागरिकों का राज्य मानना होगा।
पंजाब के लोग साहसी और दृढ़निश्चयी हैं। वे अपने घर, खेत और स्कूल दोबारा बनाएँगे। लेकिन वे टूटे हुए विश्वास को भी पुनर्निर्मित करेंगे। बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन यह याद हमेशा रहेगी कि कौन उनके साथ खड़ा था और कौन उन्हें छोड़कर भाग गया।
यह त्रासदी एक मोड़ है। इसने AAP सरकार की खोखली राजनीति को उजागर किया और यह दिखाया कि पंजाब को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो भागे नहीं, सेवा करे। पंजाब को ऐसी सरकार चाहिए जो सेवा को राजनीति पर, जवाबदेही को अहंकार पर, और करुणा को असंवेदनशीलता पर प्राथमिकता दे।
इतिहास जब इस बाढ़ को याद करेगा, तो वह सिर्फ प्रकृति के प्रकोप को नहीं, बल्कि उन नेताओं की विफलता को भी याद करेगा जिन्हें पंजाब की रक्षा करनी थी। अब समय आ गया है कि ऐसी विश्वासघातपूर्ण राजनीति को दोहराया न जाने दिया जाए।


