उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों के लिए एक बीड़ा उठाया है। सीएम योगी ने इन शरणार्थियों के लिए जो काम शुरू किया है, वह सिर्फ पुनर्वास की सामान्य सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक लंबी ऐतिहासिक त्रासदी का देर से मिला न्याय है।
1960 के दशक से लेकर 1975 तक, पूर्वी पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और असुरक्षा से भागकर कई हिंदू परिवार भारत के उत्तर प्रदेश के जिलों पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर, रामपुर आदि में आकर बस गए थे। वे दशकों से जिस जमीन पर घर और खेत बनाकर रह रहे हैं, उस पर अब जाकर कानूनी मालिकाना हक की प्रक्रिया तेज हुई है। इसके कारण हिंदू डेमोग्राफी में भी अहम बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: विभाजन के बाद भी खत्म न हुआ पलायन
1947 के विभाजन के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू समुदाय के लिए हालात सहज नहीं हुए। अलग- अलग दौर में सांप्रदायिक हिंसा, धार्मिक भेदभाव, संपत्तियों पर कब्जे, मंदिरों पर हमले और स्थानीय स्तर पर संगठित उत्पीड़न की वजह से वहाँ से हिंदुओं का पलायन लगातार जारी रहा।
1960 से 1975 के बीच यह पलायन उत्तर भारत के कई हिस्सों तक पहुँचा, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल था। इन्हीं वर्षों में हजारों बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी परिवारों को भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने अलग- अलग जिलों में पुनर्वासित किया।
पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में इन परिवारों को कुछ गाँवों में बसाया गया। उन्हें रहने के लिए जगह और खेती के लिए जमीन दी गई, लेकिन उस समय की कानूनी संरचना, रिकॉर्ड की गड़बड़ियों और बाद के बदलावों के कारण ज्यादातर मामलों में जमीन पर उनका मालिकाना हक पूरी तरह से उन्हें नहीं मिल पाया।
बांग्लादेश से आए ये परिवार भारत में बस गए, उनकी पीढ़ियाँ यहीं बीत गईं। वोटर कार्ड से लेकर राशन कार्ड तक हर जगह उनका नाम आया, पर जमीनों के रिकॉर्ड में वे या तो ‘राज्य सरकार की भूमि’ पर बसे दिखे या किसी अधूरी प्रविष्टि के साथ दर्ज रहे।
योगी सरकार का निर्णय: प्रशासनिक आदेश नहीं, नैतिक घोषणा
जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्देश दिया कि पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस बैठक में सीएम ने साफ कहा कि इसे सिर्फ पुनर्वास का मामला नहीं, बल्कि ‘सामाजिक न्याय, मानवता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ के रूप में देखा जाना चाहिए।
सीएम के निर्देशों के मुख्य बिंदुओं में कुछ बातें साफ तौर से शामिल की गई थी। पहला, 1960 से 1975 के बीच विस्थापित होकर आए लगभग 10,000 परिवारों को पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर में बसाया गया था, उनके जमीन के मामलों की समीक्षा की जाए।
दूसरा, जिन परिवारों को आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, वहाँ कानूनी विसंगतियों और रिकॉर्ड की समस्याओं की वजह से भूमि अधिकार लंबित हैं, उन्हें सुलझाया जाए।
तीसरा, अगर किसी जगह पर जमीन उपलब्ध नहीं है, या कानूनी रूप से देना संभव नहीं, तो वैकल्पिक भूमि आवंटित की जाए। चौथा, पुराने सरकारी अनुदान (Government Grants Act) खत्म होने के बाद जो कानूनी शून्य बना, उसे किसी वैकल्पिक व्यवस्था से भरकर इन परिवारों को अधिकार दिया जाए।
सीएम ने अधिकारियों को साफ तौर पर ये कहा कि ‘कानून जनता की सेवा के लिए है, उन्हें पीड़ा में फंसाने के लिए नहीं’। पीलीभीत के लिए ये निर्णय पहले किए गए। उन फैसलों को राज्य सरकार ने इसे सिर्फ कागजी घोषणा तक सीमित नहीं रहने दिया। वहाँ लगभग 2,196 परिवारों के लिए जमीन के मालिकाना हक की प्रक्रिया शुरू की गई।
25 गाँवों में बसाए गए हिंदू शरणार्थी परिवारों के मामलों में सत्यापन रिपोर्टों को राज्य सरकार को भेजा गया और औपचारिक दिशानिर्देश मिलते ही अंतिम दस्तावेज सौंपने की योजना बनाई गई। इसी मॉडल को लखीमपुर खीरी और अन्य जिलों में भी लागू करने की दिशा में काम हो रहा है।
लखीमपुर खीरी की बदलती तस्वीर- 331 परिवार, 4 गाँव, 3 तहसीलें
आधिकारिक आँकड़ों से लखीमपुर खीरी की स्थिति बहुत साफ होकर सामने आती है। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, कुल 331 परिवार पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित होकर लखीमपुर खीरी जिले में पुनर्वासित किए गए हैं।
ये परिवार 3 तहसीलों गोला, धौरहरा और मोहम्मदी में बसाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन 331 परिवारों का बंटवारा करने के लिए तहसील धौरहरा के गाँव सुतकुईया में 97 परिवार बसाए गए। तहसील गोला के ग्राम संख्या-3 में 37 परिवारों को जगह मिली। इसके अलावा तहसील मोहम्मदी के गाँव मोहनगंज (कॉलोनी) में 41 परिवारों की बसाहट की गई।
इसके अलावा लखीमपुर खीरी में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों की सबसे बड़ी बस्ती मोहम्मदी तहसील के फैयानगर में है, जहाँ अकेले 156 परिवार बसाए गए हैं। कुल मिलाकर यह चार बस्तियाँ बिखरी हुई सही, पर एक साझा ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी हुई हैं।
परिवारों की संरचना: तीन पीढ़ियों की जीवन-कथा
रिपोर्ट में यह भी शामिल किया गया है कि हर परिवार सदस्यों की औसत संख्या कितनी है। यह आँकड़ा ‘जनसंख्या’ के वास्तविक पैमाने को भी सामने लाता है। तहसील गोला में एक परिवार में लगभग 1 से 8 सदस्य हैं। तहसील धौरहरा में एक परिवार में लगभग 1 से 6 सदस्य हैं। तहसील मोहम्मदी में एक परिवार में लगभग 1 से 10 सदस्य तक हैं।
इस लिहाज से अगर देखा जाए तो 331 परिवारों की कुल आबादी लगभग 1500 से 1800 के आसपास है। इसमें अब दूसरी- तीसरी पीढ़ी की मिश्रित आबादी है। पहली पीढ़ी वे थे जिन्होंने सीमाएँ पार कीं, दूसरी पीढ़ी ने अस्थिर पुनर्वास में जीवन बिताया और तीसरी पीढ़ी अब उसी जमीन पर अपने कानूनी हक की प्रतीक्षा कर रही है।
जमीन को लेकर लखीमपुर खीरी का माइक्रोडेटा
जारी हुई आधिकारिक रिपोर्ट में प्रति परिवार आवासीय/कृषि भूमि का लेखाजोखा भी शामिल है। तहसील गोला के 37 परिवारों को प्रति परिवार औसतन 3 बीघा (कृषि भूमि) आवंटित की गई है।
वहीं, तहसील धौरहरा के सुतकुईया गाँव में 60 परिवारों को प्रति परिवार लगभग 1.620 बीघा कृषि भूमि दी गई। तहसील मोहम्मदी ग्राम मोहनगंज (कॉलोनी) में15 परिवारों को प्रति परिवार 3 बीघा भूमि मिली। वहीं, 9 परिवारों को प्रति परिवार 7 बीघा भूमि आवंटित की गई। इसके अलावा 17 परिवारों को प्रति परिवार 5 बीघा भूमि दी गई।
इनके अलावा तहसील मोहम्मदी के फैयानगर गाँव में बसे 156 परिवारों को खेली के लिए प्रति परिवार लगभग 4.75 बीघा कृषि भूमि आवंटित की गई।
इन आँकड़ों से ये तो साफ है कि लखीमपुर खीरी के बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी न तो बिल्कुल भूमिहीन हैं पर न ही बड़े जमींदार। वे छोटे और मझोले किसान हैं, जिनकी आजीविका 1-7 बीघा की जमीन पर टिकी है।
असल में समस्या यह नहीं कि जमीन नहीं मिली, समस्या यह रही कि जिस जमीन पर वे पीढ़ियों से काम कर रहे हैं, उसका पूर्ण कानूनी दस्तावेज अब तक उनके नाम नहीं था।
पीलीभीत के 2,196 परिवार और 62 साल का इंतजार
पीलीभीत की स्थिति उत्तर प्रदेश के इस बड़े फैसले का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम दिखाती है। पीलीभीत जिले में लगभग 2,196 परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के रूप में दर्ज हैं, जो 25 गाँवों में बसे हुए हैं।
इन्हें 1960 के दशक में आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, पर कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला। रिकॉर्ड में कहीं जमीन वन विभाग के अधीन दर्ज हो गई, कहीं म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ, कहीं पुराने सरकारी अनुदान अधिनियम के खत्म होने के बाद कानूनी रास्ता ही नहीं बचा।
सीएम योगी के हस्तक्षेप के बाद पीलीभीत के जिलाधिकारी ने बताया कि 2,196 में से 1,466 परिवारों की सत्यापन रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और अंतिम दिशानिर्देश मिलते ही उन्हें कागज देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह प्रक्रिया केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के उन सभी जिलों में लागू की जा रही है, जहाँ ऐसे शरणार्थी बसाए गए थे।
एक बड़ा तकनीकी पक्ष यह है कि इन जमीनों को शुरू में ‘गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट’ के तहत आवंटित किया गया था। 2018 में इस अधिनियम को समाप्त कर दिया गया, जिसके बाद पुराने अनुदानों को वैध करने का सीधा कानूनी रास्ता स्पष्ट नहीं बचा।
अधिकारियों ने सीएम योगी को बताया कि यही वजह थी कि वैध शरणार्थी परिवारों को भी मालिकाना हक देने की प्रक्रिया तेज नहीं हो पा रही थी, क्योंकि किसी के नाम पर म्यूटेशन करने के लिए साफ कानूनी प्रावधान नहीं था। इस पर सीएम का जवाब था- “कानून लोगों को पीड़ा में फँसाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सेवा के लिए है।” इस आधार पर अधिकारियों को वैकल्पिक कानूनी रास्ता निकालने को कहा गया।
लखीमपुर खीरी के दस्तावेज से पता चलता है कि राज्य सरकार ने इन परिवारों को अन्य कल्याणकारी योजनाओं से बाहर नहीं रखा। रिपोर्ट के मुताबिक, इन शरणार्थी परिवारों को नियमों के अनुसार पात्रता के आधार पर कई योजनाओं का लाभ मिलता रहा है।
इन योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान दुर्घटना कल्याण योजना, फसल बीमा से जुड़ी योजनाएँ, प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान योजनाएँ, वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन योजनाएँ, विवाह अनुदान/ मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाएँ, शिक्षा सहायता, छात्रवृत्ति और स्कूल–संबंधी लाभ, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी योजनाएँ, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन स्वच्छ भारत मिशन, ग्राम सड़क योजनाएँ, ग्रामीण रोजगार और आजीविका योजनाएँ आदि भी शामिल रही हैं।
सीएम योगी आदित्यनाथ की पहल और सरकार के प्रयासों से इन्हें ‘नागरिक’ की तरह सम्मान मिलना शुरू हुआ। जमीन के सवाल पर वे पहले ‘अधूरे शरणार्थी’ बने रहे थे। योगी सरकार की मौजूदा पहल में कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के साथ इन्हें अब भूमि अधिकार को जोड़ा जा रहा है, ताकि उनका आर्थिक आधार मजबूत हो सके।
उत्तर प्रदेश सरकार की पहल दिखाती है कि राज्य स्तर पर शरणार्थियों के दस्तावेज तैयार करने और जमीन के अधिकार देने की प्रक्रिया एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं।
उत्तर प्रदेश मॉडल बना शरणार्थियों के कल्याण की एक मिसाल
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के संदर्भ में कई स्तरों पर काम आगे बढ़ाया है। उन्हें ऐतिहासिक स्वीकृति मिली। सरकार ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि ये परिवार दशकों से यहाँ हैं। इन्हें उस समय जमीन दी गई, पर मालिकाना हक नहीं मिला। इस गलती को योगी सरकार ने ठीक किया।
इसके बाद उन्हें कानूनी समाधान मिला। Government Grants Act खत्म होने के बाद बने कानूनी शून्य को पाटने के लिए वैकल्पिक रास्ते अब भी खोजे जा रहे हैं, जिससे पुराने आवंटन को वैध करके इन परिवारों को भू- स्वामी अधिकार दिया जा सके।
इसके अलावा प्रशासनिक क्रियान्वयन को बढ़ाया गया। जिलेवार रिपोर्टें मंगवाकर (जैसे पीलीभीत में 2,196 परिवार, लखीमपुर खीरी में 331 परिवार), हर परिवार का सत्यापन, प्रति परिवार भूमि का माप और उसके आधार पर दस्तावेज तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
इसके साथ ही योगी सरकार की ओर से शरणार्थियों की सूची केंद्र को भेजकर उन्हें CAA के दायरे में लाने की कोशिश, कल्याणकारी योजनाओं में उनकी निरंतर भागीदारी और ‘शरणार्थी’ से आगे बढ़कर ‘स्थिर नागरिक-किसान’ के रूप में स्थापित करने की राजनीतिक इच्छा दिखती है।
इस लिहाज से कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश वर्तमान परिदृश्य में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के कल्याण, सम्मान और भूमि अधिकार के प्रश्न पर एक सक्रिय मॉडल प्रस्तुत कर रहा है, जहाँ केवल राहत नहीं, बल्कि अधिकार–आधारित समाधान की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
यह कहना कि ‘उत्तर प्रदेश की योगी सरकार बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के कल्याण के लिए कार्य कर रही है’ महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जमीन, घर और पहचान से जुड़ा एक ठोस, ऐतिहासिक और कानूनी प्रयास खड़ा दिखता है। पीलीभीत की 2,196 बस्तियाँ हों या लखीमपुर खीरी के 331 परिवारों के छोटे–छोटे खेत, सब इस बदलती कहानी के गवाह हैं।


