Thursday, October 1, 2020
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बिन बुर्क़े बाहर जाओगी तो हल्ला मच जाएगा: आईसिस ने यज़ीदी सेक्स स्लेव से यही कहा

आज का विश्व आँख मूँद कर इस आतंक को 'आतंक का कोई रिलीजन नहीं होता' कहते हुए शुतुरमुर्ग की तरह नकार रहा है। उनके झंडे पर उनके मज़हब का नारा बुलंद है, उनके कुकर्मों से पहले 'अल्लाह' के नाम का जयघोष होता है, और आप कहते हैं कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता!

इस्लामी आतंकियों और सेक्स कुंठा से भरे समाज के कई हिस्सों के बारे में जब कुछ बातें सामने आती हैं तो आश्चर्य होता है कि विरोधाभास और विडम्बना कहाँ तक जा सकती हैं। कल एक वीडियो सामने आया जहाँ यज़ीदी महिलाएँ, जो आईसिस द्वारा सेक्स स्लेव के रूप में हर दिन बलात्कार का शिकार होती रहीं थीं, बुर्कों को जला रही थीं।

इसके पीछे का कारण यह था कि आईसिस इस्लाम के उन तौर तरीक़ों में पूरी आस्था दिखाता है जो उसकी मर्ज़ी के हों। जैसे कि बुर्क़ा पहनना चाहिए, काफ़िरों को काट देना चाहिए, उन्हें बमों से उड़ा देना चाहिए, बलात्कार करना चाहिए आदि। बुर्क़ा पहनने के पीछे जो क्यूट कारण बताते हैं ये आतंकवादी, वो सुनकर कान से ख़ून निकल आता है, “ऐसे बाहर मत निकलो। मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।”

अब आप कहिए ‘वॉव, जस्ट फकिंग वॉव!’ 

शब्दों के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा क्योंकि ये सब जानने के बाद और कोई प्रतिक्रिया निकल नहीं पाती। पिछले सप्ताह कई सेक्स स्लेव (बलात्कार करने हेतु ग़ुलाम बनाई गई युवतियाँ और बच्चियाँ) इन आतंकियों के चंगुल से बाहर निकलकर आईं और रेगिस्तान में पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपने बुर्क़ो को आग लगाया। हम या आप इन लड़कियों के अनुभव को समझ नहीं कर सकते क्योंकि इनकी यातना शरीर और दिमाग से परे इनकी निश्छल आत्माओं तक है। ये घाव हर स्तर पर गहरे हैं, और इनकी जिजीविषा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

इस वीडियो में एक यज़ीदी लड़की कहती है, “जब उन्होंने पहली बार मुझे वह (बुर्क़ा) पहनने के लिए विवश किया, तो मुझे अपना दम घुटता सा लगा। मुझे उसमें काफ़ी परेशानी हो रही थी। मैं बुर्क़ा पहनना नहीं चाहती थी पर उन्होंने इसे उतारने की अनुमति नहीं दी। वो कहते थे कि हर कोई पहन रहा है। जब भी मैं अकेली होती थी तो उसे उतार फेंकती थी। वह कहते थे, ‘ऐसे बाहर मत निकलो।’ ‘मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।’ पर जब भी वे मुझे अकेले में छोड़ते थे, मैं उसे उतार देती थी। अब मैं (यहाँ) आ गई हूँ और इसे उतार दिया है, और जला दिया है। यह क़िस्सा ख़त्म कर दिया है, ईश्वर की कृपा से। काश मैं दएश (आईसिस) को यहाँ ला पाती और जला पाती, जैसे मैंने अपने उन कपड़ों को जला दिया है।”

These sex slaves are setting fire to the burqas they were forced to wear by ISIS

These sex slaves are setting fire to the burqas they were forced to wear by ISIS

Posted by Daily Mail Try Not To Cry on Thursday, March 14, 2019
यजीदी लड़कियाँ बता रही हैं आपबीती

इस विचारधारा की जड़ में इस्लाम को दुनिया पर स्थापित करने की पुरानी ज़िद है। लेकिन आज का विश्व आँख मूँद कर इस आतंक को ‘आतंक का कोई रिलीजन नहीं होता’ कहते हुए शुतुरमुर्ग की तरह नकार रहा है। उनके झंडे पर उनके मज़हब का नारा बुलंद है, उनके कुकर्मों से पहले ‘अल्लाह’ के नाम का जयघोष होता है, और आप कहते हैं कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता!

एक तरफ इस्लाम को स्थापित करने की चाह, एक तरफ बुर्क़ा पहनाकर महिलाओं को यह बताना कि मर्दों के आस-पास शरीर को ढक कर रखना चाहिए, और दूसरी तरफ बलात्कार? दिन-रात बलात्कार कर रहे हों और ज्ञान दे रहे हो कि बाहर बुर्क़े में रहा करो क्योंकि मर्दों के सामने ऐसे नहीं जाना चाहिए! ये उच्च क़िस्म का घटिया नशा है जो शायद इन्होंने एक साथ सीरिया के किसी कच्चे तेल के कुएँ से पीकर पाया होगा, क्योंकि लॉजिक तो घास ही चरता दिख रहा है! 

ऐसे ही एक वीडियो देखा था जिसमें कई महिलाएँ (अलग-अलग जगहों पर) हिजाब पहनकर, कई अरबी/ इस्लामी कपड़ों में बैठे मर्दों के बीच उत्तेजक नृत्य कर रही थी। मैं कपड़ों का ज़िक्र कर रहा हूँ क्योंकि वीडियो से मज़हब का पता लगाना मुश्किल है। अंग्रेज़ी में इसे सिडक्टिव डान्स कह सकते हैं। क़ालीन बिछा हुआ है, मर्द घेरे पड़े हैं, टोपियाँ सर पर हैं, लड़की ने हिजाब से सर ढक रखा है और उसके कूल्हे थिरक रहे हैं। ये विचित्र स्तर का मानसिक दिवालियापन है कि सेक्सी नाच भी देखना है, और लड़की के संस्कार भी क़ायम रखने हैं। आप यूट्यूब पर वो वीडियो ख़ुद ढूँढ लीजिए क्योंकि वो इतना घटिया है कि मैं यहाँ रख नहीं सकता।

मतलब, समाज और मज़हबी जानकार कहते हैं कि महिला को सर ढक कर रखना चाहिए। इसलिए गर्दन से नीचे टू-पीस बिकिनी चलेगा, सेक्सी नाच चलेगा लेकिन सर तो ढका ही होना चाहिए क्योंकि मौलवी जी ने कहा है! ऐसे उदाहरणों पर आप न तो हँस सकते हैं, न गम्भीर हो सकते हैं। हँस इसलिए नहीं सकते कि हर व्यक्ति की भावनाएँ होती हैं, जज़्बात होते हैं, उन्हें उत्तेजक नृत्य देखना ज़रूरी लगता है, तो वो अपने मज़हबी बातों से रास्ता निकाल कर अपनी इच्छा की पूर्ति करते हैं।

गम्भीर इसलिए नहीं हो सकते कि आख़िर ये हो क्या रहा है! देखना है तो पूरा देख लो ठीक से कि नाचने वाली महिला ही है या किसी ने बुर्क़ा पहनकर पागल तो नहीं बनाया! ये कैसी मानसिकता है जिससे एक तरफ तो मज़हब का भी सम्मान हो रहा है और दूसरी तरफ अपनी ठरक का भी। जी, सही शब्द ‘ठरक’ ही है क्योंकि किसी महिला को उस तरह से घेरकर नचाना आपकी कुंठा की परिणति ही है, न कि आपके अंदर बैठा कला-प्रेमी जाग गया है।

ये इस विचारधारा का सत्य है। जो भी ऐसे आतंकियों के विरोध में नहीं हैं, वो इन्हें सहमति देने वाले हैं। क्योंकि किसी मसीहा और दूत के नाम पर बलात्कार, क़त्ल, ग़ुलामी आदि को जायज़ बताने को धिक्कार नहीं पाना बताता है कि आप भीतर से क्या चाहते हैं।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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