‘पलटू चाचा’ के लिए RJD का पिघला मन, राबड़ी ने कहा- महागठबंधन में आते हैं तो स्वागत है

नीतीश कुमार की स्थिति साँप-छछूंदर वाली हो गई है। कायदे से वो अगले पाँच साल तक केंद्र सरकार के साथ न कोई सौदा करने की स्थिति में हैं और न ही दबाव डलवाकर अपनी माँगे मनवा सकने की स्थिति में हैं। लिहाजा अगर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वे एक बार फिर से......

जब से 30 मई को नरेंद्र मोदी ने पीएम पद की शपथ ली है तब से ही बिहार की सियासत के सुर बदलने लगे थे। लगातार बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डाला जाए तो बिहार में राजनीतिक उठापटक साफ नज़र आएगी। इसी उठापटक का परिणाम है कि बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने कह दिया है कि अगर नीतीश कुमार महागठबंधन में आने की सोचते हैं तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा।

राबड़ी देवी के इस कथन के वर्तमान सियासी हालात में मायने कुछ ज़्यादा ही हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में नीतीश कुमार ने 30 मई को नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि मात्र एक सीट के लिए JDU मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बनेगा। उसी दिन नीतीश अमित शाह के ऑफर को ठुकरा कर चुपचाप पटना लौट गए थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि जब 2 जून को नीतीश ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो बीजेपी को इससे बाहर रखकर बदला ले लिया।

ऐसे में इस राजनीतिक परिदृश्य में आरजेडी नेता राबड़ी का यह कहना कि अगर जेडीयू महागठबंधन में आने की पहल करता है तो महागठबंधन इस पर विचार करेगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा सोमवार (जून 3, 2019) को पटना में दी गई इफ्तार पार्टी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी शामिल थे लेकिन दोनों के बीच मुलाकात नहीं हो सकी थी। फिर भी ऐसे बयान राजनीतिक पलटूपन का शानदार उदाहरण है। क्योंकि इससे पहले नीतीश को आरजेडी नेता ‘पलटू चाचा’ कह चुके हैं। पर यहाँ मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आरजेडी मौजूदा हालात के मद्देनज़र नीतीश की बीजेपी से तल्खी का फायदा उठाना चाहती है।

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बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले आरजेडी ने दावा किया था कि नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होने के मात्र 6 महीने बाद ही दोबारा महागठबंधन में वापस आना चाहते थे, लेकिन इसके लिए लालू यादव और तेजस्वी यादव तैयार नहीं हुए। जून 2018 में तेजस्वी ने यहाँ तक कहा था कि नीतीश कुमार की विश्वसनीयता नहीं बची है। अगर मान भी लिया जाए कि हम फिर से नीतीश को गठबंधन में ले लेते हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे कुछ समय बाद हमें धोखा नहीं देंगे। उनके लिए महागठबंधन के दरवाजे बंद हो चुके हैं। इसी पर, तेजस्वी यादव ने नीतीश को कई बार ‘पलटू राम’ और ‘पलटू चाचा’ की उपाधि भी दे डाली है।

बिहार की सियासत गज़ब के मोड़ पर है, एक तरफ जहाँ आरजेडी नीतीश को एक बार फिर से महागठबंधन में लेने को बेताब है क्योंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार से नीतीश के मन में पैदा हुए असंतोष को भुनाना चाहती है। लोकसभा के परिणामों से आरजेडी जान चुकी है कि नीतीश के कंधे पर सवार होकर शायद पार्टी को एक बार फिर बिहार की सत्ता मिल सकती है।

इधर नीतीश कुमार की स्थिति साँप-छछूंदर वाली हो गई है। कायदे से वो अगले पाँच साल तक केंद्र सरकार के साथ न कोई सौदा करने की स्थिति में हैं और न ही दबाव डलवाकर अपनी माँगे मनवा सकने की स्थिति में हैं। लिहाजा अगर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वे एक बार फिर से आरजेडी के साथ आ जाएँ तो शायद अगले पाँच साल तक वे एक बार फिर से सीएम बन सकते हैं।

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