यूरोपियन यूनियन यानी EU दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक समूहों में से एक है। 27 देशों का यह समूह साथ मिलकर व्यापार, कानून, मानवाधिकार और कई बड़े फैसलों पर एक साथ काम करते हैं। लेकिन इन दिनों यह रेप के कानून को लेकर चर्चा में है।
हाल ही में यूरोपियन पार्लियामेंट ने एक अहम प्रस्ताव पास किया है, जिसमें ‘Yes Means Yes’ (‘हाँ का मतलब हाँ’) यानी स्पष्ट सहमति को रेप की परिभाषा का आधार बनाने की बात कही गई है। आसान भाषा में समझें तो अब सवाल यह नहीं होगा कि पीड़िता ने ना कहा था या नहीं बल्कि यह होगा कि क्या उसने साफ तौर पर हाँ कहा था। अगर स्पष्ट सहमति नहीं है, तो उस स्थिति को अपराध माना जाएगा।
यह बदलाव इसलिए ऐतिहासिक कहा जा रहा है क्योंकि यह कानून के नजरिए को पूरी तरह बदल देता है। पहले जहाँ जोर इस बात पर होता था कि क्या जबरदस्ती हुई, अब फोकस इस पर है कि क्या दोनों पक्षों की सहमति साफ और स्पष्ट थी।
EU का ऐतिहासिक फैसला
‘हाँ का मतलब हाँ’ यानी ‘Yes Means Yes’ मॉडल पहली नजर में बहुत सीधी बात लगती है लेकिन असल में यह कानून के नजरिए में एक बड़ा और बुनियादी बदलाव है।
इस मॉडल का मतलब यह है कि किसी भी तरह के शारीरिक संबंध के लिए दोनों लोगों की साफ, स्पष्ट और अपनी मर्जी से दी गई सहमति होना जरूरी है। यहाँ सहमति का मतलब सिर्फ चुप्पी या विरोध न करना नहीं है बल्कि सामने वाले व्यक्ति का सक्रिय रूप से हाँ कहना या ऐसा व्यवहार दिखाना है जिससे उसकी मर्जी साफ समझ आए।
पहले कई देशों में कानून इस बात पर ज्यादा निर्भर करता था कि क्या पीड़िता ने ना कहा था, क्या उसने विरोध किया था या क्या उस पर शारीरिक जबरदस्ती की गई थी। लेकिन व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो हर स्थिति में कोई व्यक्ति विरोध नहीं कर पाता। कई बार डर, सदमे या स्थिति की गंभीरता के कारण व्यक्ति प्रतिक्रिया ही नहीं दे पाता। ऐसे में पुराने कानूनों में कई मामले कमजोर पड़ जाते थे, क्योंकि वहाँ फोर्स या विरोध को साबित करना जरूरी होता था।
नया ‘Yes Means Yes’ मॉडल इसी सोच को बदलता है। यह कहता है कि अगर साफ और स्पष्ट हाँ नहीं है, तो उसे सहमति नहीं माना जाएगा। यानी अब फोकस इस बात से हटकर कि ना कहा गया था या नहीं, इस बात पर आ जाता है कि क्या स्पष्ट रूप से हाँ दी गई थी या नहीं। इससे कानून यह मानकर चलता है कि सहमति एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसे हर कदम पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इस बदलाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह जिम्मेदारी को भी नए तरीके से तय करता है। अब यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति यह सुनिश्चित करे कि सामने वाला व्यक्ति पूरी तरह से सहज और सहमत है।
पुराने कानून vs नया स्टैंडर्ड
अब तक कई यूरोपीय देशों में ‘नो मीन्स नो’ या फोर्स बेस्ड कानून लागू थे। यानी अगर किसी केस में यह साबित नहीं हो पाता था कि पीड़िता ने विरोध किया या उसके साथ जबरदस्ती हुई, तो केस कमजोर हो जाता था। कई बार अदालत में यह सवाल उठता था कि पीड़िता ने आवाज क्यों नहीं उठाई या उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया।
यहीं पर Yes Means Yes मॉडल पूरी तस्वीर बदल देता है। अब यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि पीड़िता ने कितना विरोध किया। बल्कि यह देखा जाएगा कि क्या स्पष्ट सहमति थी। इस बदलाव से न्याय प्रणाली का नजरिया ही बदल जाता है, अब ध्यान इस पर है कि क्या संबंध दोनों की सहमति से बनाया गया था, न कि इस पर कि विरोध कितना हुआ।
इस नए दृष्टिकोण का सबसे बड़ा असर पीड़ितों पर पड़ेगा। पहले उन्हें अदालत में यह साबित करना पड़ता था कि उनके साथ जबरदस्ती हुई, जो कि मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद मुश्किल होता था। कई बार ट्रॉमा की वजह से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती, लेकिन कानून इसे समझने में पीछे रह जाता था।
अब नए मॉडल में यह दबाव कम हो सकता है। पीड़िता को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि उसने कितना संघर्ष किया। बल्कि सवाल यह होगा कि क्या उसने सहमति दी थी। इससे न्याय पाने की प्रक्रिया कुछ हद तक आसान और संवेदनशील बन सकती है।
हाई-प्रोफाइल केस का असर
इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए फ्रांस के चर्चित पेलिकोट केस को थोड़ा विस्तार से समझना जरूरी है। इस मामले में आरोप था कि पीड़िता को पहले नशीला पदार्थ दिया गया, जिससे वह अपनी स्थिति को समझने या विरोध करने की हालत में नहीं रही।
इसके बाद उसके साथ कई लोगों ने रेप किया। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं था बल्कि इसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति होश में ही नहीं है, तो उसकी ना या हाँ का सवाल ही कैसे उठ सकता है।
जब यह मामला सामने आया, तो पूरे यूरोप में लोगों के बीच गुस्सा और चिंता दोनों देखने को मिले। लोगों ने सवाल उठाना शुरू किया कि क्या मौजूदा कानून ऐसे मामलों को सही तरीके से कवर करते हैं, जहाँ जबरदस्ती सीधे तौर पर दिखाई नहीं देती, लेकिन सहमति पूरी तरह गायब होती है।
इस केस ने यह दिखाया कि कई बार अपराधी शारीरिक हिंसा के बजाय ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं, जहाँ पीड़ित विरोध ही नहीं कर पाता। इसी के बाद फ्रांस में फ्रेंच रेप लॉ रिफॉर्म 2025 की दिशा में बदलाव शुरू हुआ, जहाँ सहमति को ज्यादा स्पष्ट तरीके से कानून का आधार बनाने की कोशिश की गई।
महिला अधिकार समूहों का दबाव
इन घटनाओं के बाद महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने जोरदार आवाज उठाई। उनका कहना है कि यह अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं। अगर कानून नहीं बदला गया, तो ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल होगा।
NGOs लगातार EU स्तर पर एक समान कानून की माँग कर रही हैं, ताकि सभी सदस्य देशों में एक जैसी कानूनी परिभाषा लागू हो सके। उनका मानना है कि जब तक कॉन्सेंट को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।
इस पूरे मुद्दे की गंभीरता हम आकड़ों से समझ सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक EU में हर 6 में से 1 महिला ने किसी न किसी रूप में सेक्शुअल वाइअलन्स का सामना किया है। वहीं हर 10 में से 1 महिला अपने जीवन में रेप का शिकार होती है।
ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं बल्कि एक बड़ी सामाजिक सच्चाई को दिखाते हैं। इसका मतलब है कि यह समस्या बहुत व्यापक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समाज, कानून और सिस्टम तीनों के लिए एक चेतावनी है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल जो प्रस्ताव पास हुआ है, वह एक रेजोल्यूशन है, यानी यह अभी कानून नहीं बना है। इसे लागू करने के लिए EU के सभी सदस्य देशों को इसे अपने-अपने राष्ट्रीय कानून में शामिल करना होगा। अगर यह बदलाव लागू होता है, तो यह पूरे यूरोप में रेप लाॅ की दिशा बदल सकता है।
भारत में सहमति का कानून: वर्तमान स्थिति क्या कहती है?
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में रेप को धारा 63 में परिभाषित किया गया है जबकि इसके लिए सजा धारा 64 में दी गई है। यह पहले की IPC धारा 375 और 376 के समान है। इस धारा के अनुसार, यदि किसी महिला की इच्छा के खिलाफ या उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाया जाता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आता है।
कानून में कन्सेंट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि सहमति स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई होनी चाहिए। यदि सहमति डर, दबाव, धोखे या नशे की हालत में ली गई हो, तो उसे वैध नहीं माना जाता।
साल 2013 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के जरिए कानून में बड़े बदलाव किए गए। यह संशोधन निर्भया केस के बाद लाया गया था। इसके तहत रेप की परिभाषा को विस्तृत किया गया और कॉन्सेंट को लेकर कानूनी भाषा को अधिक स्पष्ट बनाया गया। साथ ही यह भी जोड़ा गया कि ना का मतलब ना ही होता है।
भारतीय कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि महिला बेहोशी, नशे या मानसिक रूप से असमर्थ स्थिति में है, तो उस स्थिति में दी गई सहमति मान्य नहीं होगी। अदालतों में मामलों की सुनवाई के दौरान सहमति का सवाल प्रमुख होता है और साक्ष्यों, परिस्थितियों और गवाही के आधार पर निर्णय लिया जाता है।


