Saturday, April 20, 2024
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फेसबुक का न्यूज़ टैब: क्वालिटी कंटेंट या न्यूज़ के नाम पर वामपंथी ज़हर को फीड में घुसाने की कोशिश?

फ़ेसबुक की इस योजना की स्याह संभावनाएँ भी कम नहीं हैं क्योंकि घोषित रूप से वामपंथी झुकाव वाली संस्था का प्रभाव संस्था की नीतियों से लेकर किसे बैन करना है, किसे चलने देना है जैसे निर्णयों तक फैला है।

फ़ेसबुक के CEO मार्क ज़ुकरबर्ग ने हाल में जर्मनी और यूरोप के सबसे बड़े डिजिटल प्रकाशन हाउस एक्सेल स्प्रिंगर के सीईओ मैथियास डॉप्फ्नर से बात की। यह ज़ुकरबर्ग की उस संवाद श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें वह कई सारे बिजनेस और टेक्नोलॉजी कम्पनियों के टॉप लीडर्स से तकनीक और समाज के भविष्य के बारे में वार्तालाप कर रहे हैं।

इसी दौरान ज़ुकरबर्ग ने खुलासा किया कि वे फ़ेसबुक ऐप पर न केवल उच्च-गुणवत्ता वाली ख़बरों के लिए एक अलग टैब बनाना चाहते हैं बल्कि वे इसके लिए उन समाचारों के प्रकाशकों को धनराशि भी देने के लिए तैयार हैं। यह फ़ेसबुक के समाचारों को लेकर पिछले स्टैंड से अलग है। पिछले वर्ष फ़ेसबुक ने यह घोषणा की थी कि वह अपने यूज़र्स की न्यूज़ फीड में ‘समाचार’ कम और उनकी फ्रेंडलिस्ट में जुड़े हुए लोगों की पोस्ट्स ज्यादा दिखाएगा।

इस बात का सामान्य यूज़र्स ने स्वागत किया था क्योंकि पिछले काफी समय से पाश्चात्य बौद्धिक जगत में फ़ेसबुक और ट्विटर न्यूज़ फीड के पूर्ण राजनीतिकरण को लेकर लोग खिन्न चल रहे थे। पर समाचार प्रकाशकों समेत डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों ने इसका विरोध किया था- खासकर कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने यह निराशा जताई थी कि इससे उनकी कमाई के स्रोत और भी कम हो जाएँगे।

गौरतलब है कि मुख्यधारा के मीडिया की कमाई का सबसे बड़ा पारंपरिक स्रोत विज्ञापन होते थे, जो गूगल और फ़ेसबुक के आने के बाद से बहुत कम हो चुका है- यहाँ तक कि द गार्जियन जैसा पुराना अख़बार भी अब अपने हर लेख के नीचे अपने पाठकों से आर्थिक सहयोग की अपील करता है।

समाचारपत्रों को मिलेगी नई जान?

यूरोप की संसद में पहले ही एक ऐसे कानून पर बहस चल रही है, जिसके अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स- जैसे फेसबुक, यूट्यूब आदि- को किसी कॉपीराइट वाली सामग्री के अपने प्लेटफ़ॉर्म पर इस्तेमाल के बदले लाइसेंस फीस चुकानी होगी। यहाँ तक कि यदि कोई यूज़र फ़ेसबुक पर कोई लिंक शेयर करता है और snippet/preview में कॉपीराइट के अंतर्गत आने वाली सामग्री है तो संभव है कि फ़ेसबुक को उस सामग्री के कॉपीराइट की लाइसेंस फ़ीस देनी पड़े

यदि समाचारपत्र और समाचार पोर्टल इस हद की तंगहाली से गुज़र रहे हैं तो जाहिर है कि उनके हिसाब से फ़ेसबुक का उनकी ख़बरें दिखाने के लिए उन्हें पैसे देना किसी संजीवनी से कम नहीं है।

इसके अलावा जो लोग समसामयिक ख़बरों में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए भी फेसबुक की यह सेवा लाभदायक होने की उम्मीद है क्योंकि फ़ेसबुक प्रतिष्ठित प्रकाशनों की सामग्री छाँट कर उन तक पहुँचा देगी।

अपने राजनीतिक दबदबे और bias को और मजबूत करने की तैयारी?

सिक्के के दूसरे पहलू की और देखें तो फ़ेसबुक की इस योजना की स्याह संभावनाएँ भी कम नहीं हैं। फ़ेसबुक के सर्वेसर्वा मार्क ज़ुकरबर्ग अमेरिकी संसद से बात करते हुए यह मान चुके हैं कि उनकी संस्था वामपंथी झुकाव वाली है। यह झुकाव न ही केवल उनके लोगों का व्यक्तिगत मतदान झुकाव है, बल्कि यह आग्रह फ़ेसबुक की नीतियों से लेकर किसे बैन करना है, किसे चलने देना है जैसे निर्णयों तक फैला है। कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि फेसबुक ने अमेरिका में दक्षिणपंथी झुकाव के मशहूर लोगों की पोस्ट्स पर गुप्त रूप से अड़ंगे लगाने शुरू कर दिए थे। हाल ही में भारत में फ़ेसबुक ने अकारण ही भाजपा समर्थक एक बड़े पेज The Third Eye और कॉन्ग्रेस समर्थक 600+ छोटे-मोटे पेजों को बैन कर दिया था।

ऐसे में यह अति महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या फ़ेसबुक इस टैब में भी वामपंथी और अपने bias पर आधारित ख़बरें ही चलाएगा?

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ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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