Saturday, May 18, 2024
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1962 के युद्ध में चीनी सैनिकों के दाँत खट्टे करने वाले वीरों के सम्मान में रेजांग ला में बना स्मारक: 18 नवंबर को रक्षा मंत्री करेंगे उद्घाटन

चीनी जैसे ही नजदीक पहुँचे, भारतीय सेना के जवानों ने ऐसा आक्रमण किया कि वहाँ केवल चीनी सैनिकों की ही लाशें नज़र आईं। मेजर शैतान सिंह एक पलटन से दूसरे पलटन तक घूम-घूम कर स्थिति की समीक्षा कर रहे थे और सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे।

भारत औऱ चीन के बीच 1962 में हुए इंडो-सिनो वार में अदम्य वीरता औऱ शौर्य का प्रदर्शन करते हुए 13वीं कुमाऊँ बटालियन की चार्ली कंपनी के मेजर शैतान सिंह ने अपने 114 जवानों के साथ सर्वोच्च बलिदान देने से पहले चीनियों को कई बार मात दी थी। अब इन्हीं रियल लाइफ हीरोज के सम्मान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत के साथ लद्दाख में रेजांग ला युद्ध की बरसी पर 18 नवंबर को एक नया स्मारक राष्ट्र को समर्पित करेंगे।

रेजांग ला युद्ध के दौरान हथियारों से सुसज्जित चीनी पीएलए ने भारतीय चौकी पर हमला कर दिया। शैतान सिंह के नेतृत्व में बहादुरी और साहस की मिशाल कायम करते हुए भारतीय सेना ने करीब 400 चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया था। वीरगति को प्राप्त होने से पहले इस कंपनी ने सात बार चीनियों को धूल चटाई। इसका एक स्मारक चुशूल में युद्ध स्थल के करीब बनाया गया था। अब यहाँ रेजांग ला में बनने वाले स्मारक में 13 कुमाऊँ चार्ली कंपनी के सैनिकों के सम्मान में एक सभागार और एक फोटो गैलरी है। इसमें उन 20 सैनिकों के नाम का भी उल्लेख किया जाएगा, पिछले साल गलवान घाटी में संघर्ष के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके अलावा यहाँ युद्ध क्षेत्र का मॉडल भी लगाया जाएगा।

पिछली सरकारों ने देश के असली नायकों को दबा दिया था

पिछली सरकारों ने 1962 के युद्ध के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले नायकों के बलिदान को भुला दिया था। लेकिन रेजांग ला के युद्ध नायकों के सम्मान में स्मारकों का निर्माण कर मोदी सरकार ने इस दिशा में नीतिगत बदलाव किए हैं। भले ही भारत तकनीकी तौर पर 1962 का युद्ध हार गया था, लेकिन भारत के जवानों की शौर्य का गाथाएँ अमर हैं। 1962 की लड़ाई के बाद सर्वाधिक समय तक सत्ता में रहने वाली कॉन्ग्रेस ने 1962 की बरसी को नजरअंदाज किया था। 2012 में ही इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति पर 1962 के युद्ध को याद करने के लिए औपचारिक समारोह आयोजित किया गया था।

रेजांग ला का युद्ध

रेजांग ला युद्ध 18 नवंबर, 1962 को हुआ था। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में बहादुरी के प्रतिमान गढ़ इतिहास में दर्ज हो गए। भारतीय सेना की अपेक्षा चीनी सैनिकों के अधिक हथियार और सेना होने के बाद भी भारतीय सेना ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाते हुए उसे पीछे धकेल दिया।

रेजांग ला युद्ध में भारत के 6 सैनिक ही बच पाए, जिन्होंने समय-समय पर अपने अनुभवों और साथियों की बहादुरी से दुनिया को अवगत कराया। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी ने चुसुल में मुस्तैद होकर चीनियों के आक्रमण को ध्वस्त किया, जिससे लद्दाख शेष भारत से अलग होने से बच गया। मेजर (रिटायर्ड) गौरव आर्या ने अपने ब्लॉग पर लिखा था कि 13 कुमाऊँ रेजिमेंट को बारामुला से युद्धस्थल पर भेजा गया था।

गन हिल, गुरुंग पहाड़ी और मुग्गेर पहाड़ियों पर विभिन्न बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी तरह चार्ली कम्पनी को रेजांग ला का जिम्मा सौंपा गया था। हड्डी गला देने वाली ठंड, शीत लहर और पत्थरों के बीच हमारे जवान उस परिस्थिति में लड़े, जिसके वे आदी नहीं थे। समुद्र से 16,000 फ़ीट की ऊँचाई पर उनके पास न तो कवर था और न सपोर्ट के लिए कोई और दस्ता। सबसे पहले 9वें पलटन पर 350 चीनी सेना ने आक्रमण किया।

चीनी जैसे ही नजदीक पहुँचे, भारतीय सेना के जवानों ने ऐसा आक्रमण किया कि वहाँ केवल चीनी सैनिकों की ही लाशें नज़र आईं। मेजर शैतान सिंह एक पलटन से दूसरे पलटन तक घूम-घूम कर स्थिति की समीक्षा कर रहे थे और सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे। कहते हैं कि उन्होंने ऐसा युद्ध किया था कि उन्हें अपने शरीर, अपनी सुरक्षा और अपने आसपास का कुछ भान ही नहीं था। हालाँकि, इस युद्ध में 7वें और 8वें पलटन का एक भी जवान जिन्दा नहीं बचा, सब बलिदान हो गए। मेजर गौरव आर्या ने अपने ब्लॉग में चीनी सैनिकों की संख्या 3000 के करीब बताई है। हालॉंकि इस युद्ध में जीवित बचे सैनिकों के अनुसार चीनी 5-6 हजार की संख्या में थे।

मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर में उनके गाँव बनासर ले जाया गया और पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

‘वीर अहीर’ रेजांग ला की बर्फीली चोटियों पर कहावत ‘लास्ट मैन, लास्ट राउंड’ तक लड़े। चार्ली कंपनी के 123 सैनिकों में से 114 वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि बाकी को चीनी सेना ने पकड़ लिया था। हालाँकि, बाद में वे उन्हें चकमा देकर वहाँ से निकलने में सफल रहे। रंजांग ला में सर्वोच्च बलिदान देने वाला हर जवान एक नायक था और कृतज्ञ राष्ट्र उनमें से हर एक को याद करता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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