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जनजातीय महिलाओं का यौन शोषण, शरिया अदालत, बलात्कार-हत्या, डॉक्टरों की पिटाई, BJP नेता पर गोलीबारी… अराजकता की किस हद के बाद लगता है राष्ट्रपति शासन?

बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी हिंसा को 'क्रांति' कहने वालों की जुबान पर लगाम लग गया और वो यहाँ प्रदर्शनकारियों को ही गुंडा बताने लगे। पुलिसिया दमन के खिलाफ अगले दिन भाजपा ने बंद बुलाया तो भाटपारा में भाजपा नेता प्रियांगु पांडेय की गाड़ी को घेर कर उन पर गोलीबारी की गई, बम फेंके गए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा है कि पश्चिम बंगाल की राजधानी स्थित कोलकाता के RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में महिला डॉक्टर के बलात्कार और हत्या की भयानक घटना से वो निराश और भयभीत हैं। उन्होंने छात्रों और डॉक्टरों के विरोध प्रदर्शन का संज्ञान लेते हुए कहा है कि अपराधी कहीं छिप कर बैठे हुए हैं। उन्होंने याद किया है कि कैसे उन्हें राखी बाँधने आई छात्रों ने उनसे आश्वासन माँगा था कि देश में फिर से ‘निर्भया’ (2012 में दिल्ली में गैंगरेप) जैसी घटना फिर नहीं दोहराई जाएगी।

राष्ट्रपति ने उन बच्चों को बताया था कि जहाँ एक तरफ ये राज्य की जिम्मेदारी है कि वो हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करे, सबको, खासकर लड़कियों को, आत्मरक्षा के तकनीक और मार्शल आर्ट्स सीखने चाहिए। अपने बयान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा है कि ये वो मानसिकता है जो महिलाओं कमतर आँकती है – कम योग्य, कम ताकतवर, कम प्रतिभावान। अब आप सोचिए, हालात कितने भयावह हैं जब राष्ट्रपति को एक घटना को लेकर इस तरह का बयान जारी करना पड़ा हो।

पूरा मामला कोलकाता स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का है। वहाँ एक महिला डॉक्टर का बलात्कार कर उसे बेरहमी से मार डाला गया। इस घटना में शामिल संजय रॉय नामक एक शराबी शख्स को गिरफ्तार किया गया जो कोलकाता पुलिस का वॉलंटियर था। वो जिस बाइक का इस्तेमाल कर रहा था वो भी पुलिस कमिश्नर के नाम पर रजिस्टर्ड थी। पीड़िता को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि उसके आँख-नाक से खून निकल रहे थे, प्राइवेट पार्ट क्षत-विक्षत था और पाँव 90 डिग्री पर मुड़े हुए थे।

परिवार को पहले बताया गया कि ये आत्महत्या है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि FIR दर्ज करने में देरी हुई। पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए, जो समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद भी हैं। पीड़िता के परिवार ने भी कहा था कि हड़बड़ी में अंतिम संस्कार पुलिस-प्रशासन ने कराया। जब डॉक्टर प्रदर्शन करने उतरे तो RG Kar मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल में आधी रात के दौरान गुंडों की भीड़ पहुँची और घटनास्थल को तहस-नहस कर दिया, प्रदर्शनकारियों की पिटाई की गई।

इधर TMC के नेता CBI के पास जाँच जाने के बाद CBI को भला-बुरा कहने लगे। मोदी सरकार को तानाशाह बताने वाली महुआ मोइत्रा जैसी सांसद अपनी पुलिस की गलतियाँ छिपाने लगीं। कोलकाता पुलिस ने सोशल मीडिया के जरिए इस प्रकरण में न्याय माँगने वालों को चुन-चुन कर नोटिस भेजा। पत्रकार सागरिका घोष जो TMC की राज्यसभा सांसद भी हैं, वो चुप हैं। उनके पति और ‘इंडिया टुडे’ के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई रोज कुछ न कुछ ट्वीट कर के सरकार का बचाव करते हैं।

इधर पश्चिम बंगाल में युवा सड़कों पर उतरे और ‘नबन्ना अभियान’ चलाया, यानी विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने आँसू गैस के गोलों से लेकर पानी की बौछार और लाठीचार्ज तक का सहारा लिया। बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी हिंसा को ‘क्रांति’ कहने वालों की जुबान पर लगाम लग गया और वो यहाँ प्रदर्शनकारियों को ही गुंडा बताने लगे। पुलिसिया दमन के खिलाफ अगले दिन भाजपा ने बंद बुलाया तो भाटपारा में भाजपा नेता प्रियांगु पांडेय की गाड़ी को घेर कर उन पर गोलीबारी की गई, बम फेंके गए।

RG Kar मेडिकल कॉलेज-अस्पताल में इससे पहले भी कई संदिग्ध मौतें हो चुकी हैं, दबी जुबान से वहाँ सेक्स-ड्रग्स रैकेट चलने की बातें हुईं। हालाँकि, CBI की चार्जशीट से पहले कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिर भी, जिस तरह से प्रिंसिपल संदीप घोष का तुरंत ट्रांसफर किया गया, जिस तरह उनके रसूख की बात सामने आई और पता चला कि इससे पहले 2 बार वो अपना ट्रांसफर रुकवा चुके हैं – दाल में बहुत कुछ काला है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक दिन पैदल मार्च कर के न्याय की माँग कर इतिश्री कर ली, जब वो सिर्फ CM ही नहीं बल्कि राज्य की गृह और स्वास्थ्य मंत्री भी हैं।

अब भाजपा के बंद के बाद ममता बनर्जी असम, ओडिशा, बिहार, झारखंड और दिल्ली को जलाने की बातें कह रही हैं। उन्होंने उलटे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ही भला-बुरा कहना शुरू कर दिया और पूछने लगीं कि वो पहलवान आंदोलन पर क्यों चुप थीं। सवाल करने लगीं कि क्या भाजपा के खिलाफ बोलना कठिन है? ये पश्चिम बंगाल ही है जहाँ संदेशखली में शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों ने मिल कर जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण किया था। उसे गिरफ्तार करने गई ED की टीम पर हमला हुआ था।

पश्चिम बंगाल ही था वो जहाँ चोपरा में TMC नेता ताजेमुल को शरिया अदालत लगा कर महिलाओं को बाँध कर उनकी पिटाई करते हुए देखा गया था। ये वही पश्चिम बंगाल है जहाँ इस घटना का बचाव करते हुए सत्ताधारी दल के विधायक हमीदुल रहमान ने राज्य को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ करार दिया था। और पीछे जाएँ तो ये वही पश्चिम बंगाल है जहाँ चुनावों के दौरान विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा होती है, उनके घरों को तबाह कर दिया जाता है, उन्हें पलायन को मजबूर होना पड़ता है।

हमने भाजपा के दफ्तरों में परिवार सहित रातें बिताते लोगों के वीडियो देखे हैं। पश्चिम बंगाल में सरकार के विरोध की स्वतंत्रता नहीं है। हमने देखा है कैसे प्रदर्शनकारी चिकित्साकर्मियों को तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेताओं ने धमकाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरफ उठने वाली हर उँगली तोड़ दी जाएगी। एक अन्य नेता ने कहा कि जब डॉक्टरों को लोग पीटेंगे तो उन्हें बचाने कोई नहीं आएगा। बदहाली से जूझते पश्चिम बंगाल में उद्योग-धंधे भी चौपट हैं, चुनाव दर चुनाव हिंसा होती रहती है तो क्या अब वहाँ राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाना चाहिए?

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों तक में भी जम कर हिंसा होती है। सवाल ये है कि क्या वहाँ लोकसभा और विधानसभा चुनाव निष्पक्ष तरीके से हो पाते होंगे? चुनाव बाद अर्धसैनिक बलों के रहते भी हिंसा जारी रहती है, यानी पूरा पुलिस-प्रशासन सत्ताधारी दल की मुट्ठी में है। शिक्षक भर्ती से लेकर राशन तक में घोटाला हुआ है। आखिर अराजकता की वो कौन सी सीमा है जिसे पार करने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है? अब पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा कर निष्पक्ष चुनाव कराए जाएँ बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों को लगा कर, यही एक उपाय बचा है।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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