सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग उच्च न्यायालयों के 40 से अधिक पूर्व जजों ने एक संयुक्त बयान जारी कर सूर्यकांत के खिलाफ चल रहे ‘मोटिवेटेड अभियान’ पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। दरअसल, रोहिंग्याओं को लेकर एक कड़ी टिप्पणी के बाद कई पूर्व जजों, वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों ने CJI का विरोध किया था।
पूर्व जजों ने अपने बयान में कहा कि 5 दिसंबर को कुछ पूर्व जजों, वरिष्ठ वकीलों और कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) की ओर से जारी खुले पत्र में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। उस पत्र में आरोप लगाया गया था कि 2 दिसंबर की सुनवाई के दौरान रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में अमानवीय टिप्पणी की गई थी।
44 former Judges issue a statement objecting to “motivated campaign targeting” Chief Justice of India Surya Kant for his comments concerning Rohingyas.#SupremeCourtofIndia pic.twitter.com/XZKnguMwQb
— Live Law (@LiveLawIndia) December 9, 2025
CJI के समर्थन में आए इन पूर्व जजों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की आलोचना अस्वीकार्य है। उनका कहना है कि न्यायिक कार्यवाही पर आलोचना की जा सकती है लेकिन CJI के खिलाफ प्रेरित अभियान चलाया जा रहा है जो न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश है।
पूर्व जजों ने लिखा, “संवैधानिक रूप से सही तरीके को अमानवीयता का आरोप बताना चीफ जस्टिस के साथ अन्याय है और संस्था के लिए नुकसानदायक है। अगर राष्ट्रीयता, माइग्रेशन, डॉक्यूमेंटेशन या सीमा सुरक्षा पर हर जाँच वाले न्यायिक सवाल का जवाब नफरत या भेदभाव के आरोपों से दिया जाता है, तो न्यायिक स्वतंत्रता खुद खतरे में पड़ जाएगी।”
देश के कई पूर्व न्यायाधीशों ने रोहिंग्या समुदाय की भारत में मौजूदगी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि रोहिंग्या भारत के किसी शरणार्थी ढाँचे के तहत नहीं आए थे और उन्हें किसी भी प्रकार की वैधानिक शरणार्थी-सुरक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं था।
पूर्व जजों के अनुसार, ज्यादातर रोहिंग्याओं ने भारत में अवैध तरीके से प्रवेश किया और चूँकि भारत न तो 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता है और न ही 1967 के प्रोटोकॉल का हिस्सा, इसलिए उन्हें शरणार्थी का कानूनी दर्जा देना संभव नहीं है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब उनका प्रवेश ही अवैध था, तो फिर बड़ी संख्या में रोहिंग्याओं ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य भारतीय पहचान दस्तावेज कैसे प्राप्त कर लिए। पूर्व जजों ने इसे ‘गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता’ बताते हुए कहा कि इस प्रक्रिया की जाँच होनी चाहिए, क्योंकि यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि अवैध रूप से देश में प्रवेश करने वाले लोग भारतीय पहचान प्रणाली तक कैसे पहुँच गए।

