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FIFA 2026: समय के खिलाफ आखिरी मुकाबला, जब दुनिया एक गेंद के पीछे चल पड़ती है

कहीं कोई बच्चे की तरह जर्सी पहन रहा होगा। कहीं कोई पुराने विश्व कप की तस्वीरें देख रहा होगा। कहीं कोई मेसी की आखिरी जादूगरी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कहीं कोई रोनाल्डो के आखिरी गोल का सपना देख रहा होगा।

कुछ आयोजनों का कैलेंडर में आना केवल तारीखों का बदलना नहीं होता। वे ऋतुओं की तरह आते हैं और फुटबॉल विश्व कप उनमें सबसे बड़ी ऋतु है। 11 जून 2026 से अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की धरती पर एक बार फिर वही मौसम उतरने वाला है, जिसमें करोड़ों लोग अपने-अपने देशों की सीमाओं से निकलकर एक गोल गेंद के नागरिक बन जाते हैं।

इस बार मंच और भी विशाल है। 48 टीमें। 104 मैच। तीन मेजबान देश। लेकिन सच पूछिए तो विश्व कप कभी आँकड़ों का उत्सव नहीं रहा। विश्व कप दरअसल स्मृतियों का उत्सव है। किसी को याद होगा कि कैसे कतर की उस सुनहरी रात में लियोनेल मेसी ने ट्रॉफी को अपने होंठों से लगाया था। वह केवल एक खिलाड़ी नहीं था जो कप को चूम रहा था, वह एक अधूरी पीढ़ी थी जो अपने सबसे सुंदर सपने को छू रही थी।

किसी को याद होगा कि कैसे किलियन एम्बाप्पे हारकर भी विजेता की तरह मैदान छोड़ रहे थे। किसी को याद होगा कि मोरक्को ने दुनिया को बताया था कि चमत्कार केवल परीकथाओं में नहीं होते। और किसी को शायद आज भी वह तस्वीर याद होगी जिसमें क्रिस्टियानो रोनाल्डो अकेले सुरंग की ओर बढ़ रहे थे, जैसे समय स्वयं उन्हें धीरे-धीरे विदा कह रहा हो। विश्व कप यही करता है। गोल से ज़्यादा यादें बनाता है।

अमेरिका इस बार केवल मेजबान नहीं है। यह उस देश की मेजबानी है जिसने दशकों तक दुनिया को हॉलीवुड, एनबीए और सुपर बाउल दिए लेकिन फुटबॉल को कभी अपने सांस्कृतिक सिंहासन का हिस्सा नहीं बनाया। अब वही अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है।

लॉस एंजेलिस की रोशनी, न्यूयॉर्क की बेचैनी, डलास की गर्मी, मेक्सिको सिटी का शोर और टोरंटो की बहुभाषी भीड़… पूरा उत्तरी अमेरिका अगले एक महीने तक एक विशाल स्टेडियम में बदल जाएगा। और फिर शुरू होगा वह अनुष्ठान जो हर चार साल में दुनिया को कुछ समय के लिए युद्धों, चुनावों, आर्थिक संकटों और वैचारिक लड़ाइयों से ऊपर उठा देता है।

दर्शक फिर इंतजार कर रहे हैं। अर्जेंटीना के प्रशंसक मेसी को आखिरी बार विश्व कप में देखने के लिए तैयार बैठे हैं। 39 वर्ष की आयु में शायद यह उनका अंतिम नृत्य हो। शायद आखिरी बार हम उन्हें नीली-सफेद जर्सी में कप्तान की पट्टी बाँधे देखेंगे। शायद आखिरी बार किसी कॉर्नर फ्लैग के पास खड़े होकर वे दुनिया को यह याद दिलाएँगे कि प्रतिभा उम्र से बड़ी होती है।

दूसरी तरफ रोनाल्डो हैं। 41 वर्ष। छठा विश्व कप। समय के साथ लड़ता हुआ एक मनुष्य। फुटबॉल इतिहास में शायद ही कोई खिलाड़ी अपनी महत्वाकांक्षा को इतने लंबे समय तक जीवित रख पाया हो।

यह विश्व कप उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं, इस विरासत का अंतिम अध्याय भी हो सकता है। लेकिन विश्व कप केवल विदाई का मंच नहीं होता। यह आगमन का भी मंच है। कहीं लामिन यामाल अपने समय की घोषणा करने को तैयार हैं। कहीं एरलिंग हालैंड पहली बार विश्व कप के बड़े रंगमंच पर अपने गोलों की भूख लेकर उतरेंगे।

कहीं जूड बेलिंघम, मुसियाला, पेड्री और अर्दा गुलर जैसी नई पीढ़ी दुनिया से कहेगी, कि ‘अब कहानी केवल मेसी और रोनाल्डो की नहीं रही।’ हर विश्व कप एक पीढ़ी को विदा करता है और दूसरी को जन्म देता है।

और फिर वे टीमें हैं जिनका इंतज़ार पूरी दुनिया कर रही है।

  • स्पेन अपनी तकनीकी कविता लेकर उतरेगा।
  • फ्रांस अपनी गति और शक्ति के साथ।
  • ब्राजील अपनी शाश्वत सांबा आत्मा के साथ।
  • इंग्लैंड अपनी उम्मीदों और पुराने अभिशापों के साथ।
  • अर्जेंटीना अपने गौरव की रक्षा करने के लिए।
  • पुर्तगाल अपने महानतम खिलाड़ी के लिए।
  • मोरक्को फिर साबित करना चाहेगा कि पिछली बार का सफर दुर्घटना नहीं था।
  • और नॉर्वे… शायद हालैंड के साथ अपनी नई कथा लिखना चाहेगा।

फिर उद्घाटन समारोह, रोशनी। संगीत होगा और कैमरे होंगे। दुनिया के सबसे बड़े कलाकार। और उन सबके बीच लाखों दर्शकों की धड़कनें होंगी जो अपने-अपने शहरों में रात भर जागने वाले हैं। दिल्ली से लेकर ढाका तक। ब्यूनस आयर्स से लेकर कासाब्लांका तक। लिस्बन से लेकर सियोल तक। कहीं कोई बच्चे की तरह जर्सी पहन रहा होगा। कहीं कोई पुराने विश्व कप की तस्वीरें देख रहा होगा। कहीं कोई मेसी की आखिरी जादूगरी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कहीं कोई रोनाल्डो के आखिरी गोल का सपना देख रहा होगा।

और यही विश्व कप की सबसे सुंदर बात है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और संघर्षों का प्राणी नहीं है। हम सभी के भीतर अब भी एक शिशु जीवित है। एक शिशु जो एक गेंद को उड़ते हुए देखकर अपनी साँस रोक लेता है। जो अंतिम मिनट के गोल पर अजनबियों को गले लगा लेता है। जो हारने पर रो पड़ता है। और जीतने पर पूरी रात नहीं सोता। 11 जून से वही बच्चा फिर जागने वाला है।

दुनिया फिर से एक गेंद के पीछे चल पड़ेगी। और अगले कुछ सप्ताहों तक पृथ्वी का सबसे बड़ा धर्म न राष्ट्रवाद होगा, न विचारधारा। वह होगा, फुटबॉल।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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