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गौरवशाली इतिहास उगल रही बिहार की धरती, अलग-अलग स्थानों से मिलीं विष्णु-गणेश-सूर्य-बुद्ध की हजारों वर्ष पुरानी प्रतिमाएँ

बिहार ऐतिहासिक रूप से ज्ञान और धर्म की धरती रही है। हाल ही में खुदाई में नालंदा, गया, वैशाली और जमुई जैसे जिलों से जो पुरावशेष मिले हैं, वे राज्य की समृद्ध विरासत को फिर से जीवित कर रहे हैं। नालंदा और गया से प्राप्त भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ करीब 1,200 से 2,000 वर्ष पुरानी हैं।

भारत की मिट्टी सिर्फ फसलों के लिए ही उपजाऊ नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर हजारों सालों के इतिहास और अनगिनत कहानियों को दबाए हुए है। हाल के दिनों में बिहार से लेकर कर्नाटक और ओडिशा से लेकर गुजरात तक हुई पुरातात्विक खोजों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। कहीं भगवान गणेश की 1,500 साल पुरानी अनोखी प्रतिमा मिली है, तो कहीं 10,000 साल पुराने शैल चित्र मिले हैं। ये खोजें यह साबित करती हैं कि जब दुनिया सभ्यता के शुरुआती चरण में थी, तब भारत के अलग-अलग हिस्सों में कला, धर्म और संस्कृति अपनी जड़ें जमा चुकी थीं।

बिहार: मूर्तिकला और आस्था का जीवंत केंद्र

बिहार ऐतिहासिक रूप से ज्ञान और धर्म की धरती रही है। हाल ही में खुदाई में नालंदा, गया, वैशाली और जमुई जैसे जिलों से जो पुरावशेष मिले हैं, वे राज्य की समृद्ध विरासत को फिर से जीवित कर रहे हैं।

नालंदा और गया से प्राप्त भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ करीब 1,200 से 2,000 वर्ष पुरानी हैं। ये उस काल की याद दिलाती हैं जब मगध क्षेत्र बौद्ध धर्म का वैश्विक केंद्र था। इसके अलावा, लखीसराय और मधुबनी में पाल काल (8वीं से 10वीं शताब्दी) की भगवान विष्णु और सूर्य देव की सुंदर मूर्तियाँ मिली हैं।

पाल राजवंश के दौरान बिहार में कला और स्थापत्य का बहुत विकास हुआ था, जिसकी झलक इन मूर्तियों की बारीकियों में साफ दिखती है। वहीं, नवादा और गया में मिली 1,000 साल पुरानी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि बिहार हमेशा से सर्व-धर्म समभाव की भूमि रहा है।

जमुई की गणेश प्रतिमा: ‘पेड़कीया’ और प्राचीन मोदक का रहस्य

जमुई की नागार्जुनी पहाड़ियों से मिली भगवान गणेश की 1,500 साल पुरानी प्रतिमा सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। इस मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत गणेश जी के हाथ में मौजूद ‘पेड़कीया’ मिठाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आज के प्रसिद्ध मोदक का ही एक प्राचीन रूप है। पेड़कीया का आकार अर्धचंद्राकार होता है, जो भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है।

यह खोज दर्शाती है कि खान-पान और प्रसाद की परंपराएँ सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही हैं। इसी जमुई क्षेत्र से सूर्य देव की भी एक अत्यंत प्राचीन और भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो इस इलाके के धार्मिक महत्व को रेखांकित करती है।

ओडिशा: 10,000 साल पुराने इंसानी जीवन के निशान

बिहार के बाद ओडिशा के संबलपुर जिले में भी एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। रेडाखोल क्षेत्र की भीममंडली पहाड़ियों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को करीब 10,000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं।

साइट पर मिली पत्थर की नक्काशी की तस्वीर। (फोटो: देशकाल न्यूज)

यहाँ के संरक्षित वनों में 42 अलग-अलग स्थानों पर ‘शैल चित्र’ (Rock Paintings) मिले हैं। इन चित्रों में इंसानों ने जानवरों और पक्षियों की आकृतियाँ उकेरी हैं। ये चित्रकारी हमें बताती है कि आदिमानव किस तरह प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहते थे। यहाँ मिले पत्थर के औजार उस दौर की तकनीक और जीवनशैली की दुर्लभ झलक पेश करते हैं।

गुजरात: हड़प्पा से भी 5,000 साल पुरानी बस्ती

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने इतिहास की किताबों को बदलने वाली खोज की। आईआईटी गाँधीनगर और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रमाण खोजे हैं जिनसे पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता (Indus Valley Civilization) के उभरने से भी 5,000 साल पहले वहाँ इंसान बसते थे।

सोर्स : PIB

कच्छ के मैंग्रोव इलाकों में बड़ी मात्रा में ‘शेल मिडन’ (सीपियों के ढेर) मिले। इससे यह साफ होता है कि हजारों साल पहले के लोग समुद्री भोजन, जैसे सीप और घोंघे पर निर्भर थे। यह खोज प्राचीन मानव के भोजन और उनके तटीय क्षेत्रों में बसने की आदतों पर नया प्रकाश डालती है।

कर्नाटक: रायचूर की प्राचीन और समृद्ध बस्ती

इतिहास की यह कड़ी दक्षिण भारत तक भी फैली हुई है। जुलाई 2025 में कर्नाटक के रायचूर (मस्की) में एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने मल्लिकार्जुन पहाड़ी के पास खुदाई की। यहाँ करीब 4,000 साल पुराने औजार और घर के अवशेष मिले थे। भारत, अमेरिका और कनाडा के वैज्ञानिकों की यह साझा खोज बताती है कि यह क्षेत्र कभी एक बहुत ही सक्रिय और विकसित आबादी का घर था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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