इसके बाद इस्लाम पार्टी ने समाजवादी पार्टी से बात की और ‘मालेगांव सेक्यूलर फ्रंट’ बनाया। कॉन्ग्रेस से समर्थन हासिल किया और 43 तक आँकड़ा पहुँचा। इस्लाम पार्टी को 35, एआईएमआईएम को 21, शिवसेना को 18, एसपी को 5, कॉन्ग्रेस 3 और बीजेपी 2 सीटों पर विजयी रही।
‘बाहरी’ नहीं ‘अपनी’ पार्टी चाहिए मुस्लिम बहुल मालेगांव को
पावरलूम और बुनकरों के शहर मालेगांव में मुस्लिम आबादी करीब 80 फीसदी से ज्यादा है। शेख नसरीन को ‘बुर्केवाली मेयर’ कहा जा रहा है, क्योंकि ओवैसी ने निकाय चुनाव के दौरान कहा था कि एक दिन ‘बुर्के वाली’ मेयर बनेगी। शेख नसरीन आसिफ शेख के छोटे भाई शेख खालिद की बीवी हैं। आसिफ शेख 2014 में मालेगांव सेंट्रल से कॉन्ग्रेस विधायक बने थे। 2019 में कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन एआईएमआईएम के मुफ्ती इस्माइल ने हरा दिया।
इस्लाम पार्टी की स्थापना 2024 में आसिफ शेख ने की थी। पार्टी का मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्दे हैं – पावरलूम उद्योग बचाना, बिजली-पानी की सुविधाएँ और बुनकरों की समस्याएँ हैं। पार्टी लोकल मुद्दों की बात करती है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय दल बड़े वादे करते हैं, लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। इस्लाम पार्टी ने यही गैप भरा। यह जीत साबित करती है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में अब ‘बाहरी’ पार्टियों से ज्यादा ‘अपनी’ और लोकल पहचान वाली पार्टियाँ पसंद की जा रही हैं।
कॉन्ग्रेस और सेकुलर दलों का नुकसान
इन नतीजों से सबसे बड़ा नुकसान कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी जैसे दलों को हुआ। मुस्लिम वोटबैंक, जो दशकों से इन दलों का मजबूत आधार था, अब बंट रहा है। ओवैसी लगातार उन मुद्दों पर बोलते हैं, जिन पर सेकुलर दल चुप रहते हैं। अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा की भावना और स्थानीय समस्याएँ उनके एजेंडे में शामिल हैं। इसका असर भी चुनाव में दिखा। युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी दमदार बोलने की शैली लोकप्रिय है।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों में बढ़ती असुरक्षा और पारंपरिक दलों की नाकामी ने यह बदलाव लाया है।अब मुस्लिम मतदाता खुद तय कर रहे हैं कि उन्हें अपनी पहचान वाली पार्टी चाहिए।

