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हिंदू की हत्या भूल जाओ, मुस्लिमों को विक्टिम बताओ: ईद से पहले शुरू हुआ ‘हेट स्पीच’ का रोना, जानिए कैसे हर्ष मंदर से जुड़ी संस्था APCR मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने में जुटी

तरुण कुमार की हत्या के मामले में जवाबदेही तय होना अपने आप में एक जरूरी माँग है। इसे किसी ऐसी बड़ी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा बनाकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो असल घटना से ध्यान भटकाती हो। अगर संस्थाओं को जनता का भरोसा बनाए रखना है, तो उन्हें अपनी प्रतिक्रियाएँ तथ्यों, निष्पक्षता और कानून के हिसाब से रखनी होंगी।

होली के दौरान दिल्ली के उत्तम नगर में 26 साल के तरुण कुमार की बेरहमी से हत्या के बाद, भारत के एक्टिविस्ट- लीगल इकोसिस्टम में एक जाना-पहचाना पैटर्न उभरने लगा है।

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें ईद से पहले मुसलमानों के खिलाफ कथित हेट स्पीच को रोकने के लिए तुरंत दखल देने की माँग की गई है।

याचिका में सांप्रदायिक अशांति की आशंका जताई गई है, जिसमें भड़काऊ नारों, सोशल मीडिया पर लोगों को जुटाने और त्योहार के समय हिंसा की आशंकाओं का हवाला दिया गया है।

ऊपरी तौर पर, यह याचिका संवैधानिक दखल देने के लिए दायर की गई लगती है, जिसका मकसद सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना है। हालाँकि जब उत्तम नगर घटना के तथ्यों और APCR के इतिहास को खंगाला जाए, तो यह कदम एक निष्पक्ष, संवैधानिक अधिकार के तहत दखल देने की माँग करना कम लगती है।

यह कहानी को अपने हिसाब से गढ़ने की एक सोची-समझी कोशिश ज़्यादा लगती है। एक ऐसी कोशिश जो तरुण की लिंचिंग की तरफ से ध्यान हटाकर, मुस्लिम के ‘पीड़ित होने की कहानी’ की तरफ मोड़ने की कोशिश है।

उत्तम नगर हत्या को अलग नजरिए से पेश किया गया

उत्तम नगर घटना के तथ्य न तो अस्पष्ट हैं और न ही उनके अहम पहलुओं पर कोई विवाद है। होली के जश्न के दौरान तरुण कुमार के परिवार की 11 साल की बच्ची ने अपनी छत से पानी का एक गुब्बारा फेंका, जिसका निशाना उसके पिता थे।

गुब्बारा अपने निशाने से चूक गया और पड़ोस के एक मुस्लिम परिवार की महिला पर जा गिरा। इसके बाद शुरू में तो दोनों पक्षों में कहा-सुनी हुई, जो हिन्दू परिवार के माफी माँगने के बाद खत्म हो गई। ये बात पीड़ित परिवार और पुलिस के बयान से भी साफ होता है।

आमतौर पर त्योहार के दौरान होने वाला छोटा-मोटा झगड़ा बहस बाजी के बाद खत्म हो जाता है। लेकिन ये मामला अलग था। शाम होते-होते हालात ने हिंसक मोड़ ले लिया। जब तरुण होली मना कर घर लौट रहे थे, तो पड़ोसी मुस्लिम समुदाय के 15 से 20 लोगों ने उसे रोक लिया। उस पर लोहे की रॉड, ईंटों और पत्थरों से बेरहमी से हमला किया गया।

जब उसके परिवार के सदस्य उसे बचाने दौड़े, तो उन पर भी हमला किया गया। इस झड़प में कई लोग घायल हुए, जिनमें तरुण के पिता और चाचा भी शामिल थे। तरुण को खुद भी गंभीर चोटें आईं और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई।

जानकारी के मुताबिक, परिवारों के बीच पहले से कोई दुश्मनी नहीं थी। ऐसे में इस तरह की हिंसक प्रवृति कई सवाल खड़े करता है। यह कोई पुरानी रंजिश नहीं थी जो बेकाबू हो गई हो। यह एक जान-बूझकर लिया गया ‘बदला’ था, जो अचानक हुई और पहले ही सुलझ चुकी घटना के बाद किया गया था। हमले की क्रूरता और इसमें शामिल लोगों की बड़ी संख्या से यह पता चलता है कि यह काम अचानक नहीं, बल्कि पहले से सोच-समझकर किया गया था।

फिर भी, APCR की याचिका में, इस घटनाक्रम की व्याख्या बहुत ही बारीकी से, लेकिन अलग ढंग से की गई है। इस हत्या को एक ‘स्थानीय घटना’ के तौर पर दिखाया गया है, जिसे बाद में विरोध-प्रदर्शनों और आम चर्चाओं के जरिए ‘सांप्रदायिक रंग’ दे दिया गया। ऐसा करके, याचिका हिंसा से ध्यान हटाकर, उसके बाद हुई प्रतिक्रियाओं को ज्यादा तवज्जो देती है। यह नजरिया बदलना कोई इत्तेफ़ाक नहीं है, बल्कि यह इस पूरी कहानी को गढ़ने की बुनियाद है।

हिंसा से ‘हेट स्पीच’ की ओर: एक सोची-समझी रणनीति

APCR की याचिका का जोर तरुण कुमार की हत्या पर नहीं है। इसके बजाय, यह ‘हेट स्पीच’ (नफरत फैलाने वाले भाषण), भड़काऊ नारों और विरोध-प्रदर्शनों पर है। याचिका में दावा किया गया है कि इन घटनाओं ने मुस्लिमों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है, खासकर ईद के वक्त में। इसमें ऐसे नारों का जिक्र किया गया है, जिनके बारे में आरोप है कि वे हिंसा, बहिष्कार और यहाँ तक कि ईद के जश्न में रुकावट डालने की बात करते हैं।

याचिका का यह रुख एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भीड़ द्वारा की गई हत्या से ध्यान भटकाने का तरीका है। बहुसंख्यक समुदाय की ‘आक्रामकता’ की ओर मामले को ले जाने की साजिश है। ऐसा करने पर घटनाक्रम पूरी तरह से उलट जाता है।

हिंसा का शुरुआती काम एक गौण (पृष्ठभूमि का) विवरण बनकर रह जाता है, जबकि उसके बाद हुई प्रतिक्रिया को मुख्य चिंता के तौर पर उभार दिया जाता है।

इस उलटफेर की वजह है अदालत के समक्ष तरुण की हत्या को लेकर मुस्लिमों की आपराधिक जवाबदेही से ध्यान हटाकर तथाकथित घृणास्पद भाषण और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल उठाना। राजनीतिक दृष्टि से, यह अपराधियों से जुड़े समुदाय को खतरे में पड़े समुदाय के रूप में दिखाता है। नेरेटिव रूप में यह घटना अल्पसंख्यकों को ‘पीड़ित’ के रूप को पेश करने की कवायद है।

मुकदमा भी बना रहा नेरेटिव, जनहित याचिकाओं का हो रहा इस्तेमाल

भारत में जनहित याचिकाएँ ऐतिहासिक रूप से अधिकारों के विस्तार और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। हालाँकि इसका उपयोग तेजी से ‘नेरेटिव मुकदमेबाजी’ के रूप में किया जा रहा है, जहाँ उद्देश्य कानूनी राहत से परे जाकर सार्वजनिक विमर्श और संस्थागत धारणा को आकार देना है।

एपीसीआर की याचिका इस ढाँचे में पूरी तरह फिट बैठती है। ‘भड़काऊ सामग्री का समन्वित प्रसार, आर्थिक बहिष्कार, और तत्काल खतरा’ जैसे शब्दों का उपयोग करके, याचिका तात्कालिकता और व्यापकता की भावना पैदा करती है, ताकि न्यायपालिका का ध्यान इस पर जाए। राहत की माँग, एफआईआर का पंजीकरण, सुरक्षा और कार्रवाई के लिए अदालत की शरण में जाना, इसको साबित करती है।

इसे गौर से देखा जाए तो ये समझ में आता है कि इन माँगों में असमानता है। याचिका में जहाँ मुसलमानों के खिलाफ कथित घृणास्पद भाषण और हिंसा की आशंकाओं का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है, वहीं उस हत्या को उतनी अहमियत नहीं दी गई है जिससे घटनाक्रम की शुरुआत हुई। यह चयनात्मक जोर दर्शाता है कि मुकदमा केवल जमीनी स्थिति को बताने के लिए नहीं है, बल्कि न्यायिक कार्यवाही के भीतर ‘एक विशेष कथा’ को स्थापित करने के बारे में है।

APCR का ट्रैक रिकॉर्ड

यह समझने के लिए कि क्या यह कोई अलग-थलग घटना है या किसी बड़े पैटर्न का हिस्सा, APCR के पिछले हस्तक्षेपों की जाँच करना जरूरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद संगठन की रिपोर्ट इस संबंध में काफी कुछ बताती है।

रिपोर्ट में पूरे भारत में मुस्लिम-विरोधी हिंसा में बढ़ोतरी का दावा किया गया था और इसे मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर फैलाया गया था। हालाँकि, रिपोर्ट में जिन मामलों का जिक्र किया गया था, बाद में पता चला कि उन्हें गलत तरीके से पेश किया गया था या उनके जरूरी संदर्भों को हटा दिया गया था।

उदाहरण के लिए, अलीगढ़ में औरंगज़ेब उर्फ ​​फरीद की मौत को हिंदू मॉब लिंचिंग के तौर पर पेश किया गया। हालाँकि, बाद की रिपोर्टों से पता चला कि उसे चोरी की कोशिश के दौरान पकड़ा गया था और उसकी पिटाई की गई थी।

इसी तरह, गुजरात में एक क्रिकेट मैच के दौरान हुई एक मौत को धार्मिक तनाव से उपजी सांप्रदायिक हिंसा के तौर पर पेश किया गया, जबकि पुलिस जाँच से पुष्टि हुई कि यह झगड़ा बाइक पार्किंग को लेकर हुए विवाद के कारण हुआ था। झारखंड और उत्तर प्रदेश की घटनाओं सहित अन्य मामलों को भी जानबूझकर की गई हत्याओं के तौर पर दिखाया गया, जबकि आधिकारिक जाँच में दुर्घटना या गैर-सांप्रदायिक कारणों से हुई मौतें बताया गया था।

ये उदाहरण एक लगातार पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। घटनाओं को इस तरह से चुनकर पेश किया जाता है कि धार्मिक पहचान सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बने। जबकि उन प्रासंगिक विवरणों को छोड़ दिया जाता है जो इस कहानी को जटिल बना सकते हैं। यह केवल व्याख्या के अंतर का मामला नहीं है, यह एक ऐसी कार्यप्रणाली को दर्शाता है जो तथ्यों की पूर्णता के बजाय कहानी की एकरूपता को प्राथमिकता देती है।

संभल रिपोर्ट: गवाही बनाम फोरेंसिक जाँच

APCR का कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ के साथ मिलकर ‘संभल: एक सुनियोजित संकट की पड़ताल’ (Sambhal: Anatomy of an Engineered Crisis) नामक रिपोर्ट तैयार किया। इस रिपोर्ट पर आधारित डॉक्यूमेंट्री में, संभल हिंसा को मुसलमानों के खिलाफ व्यवस्थागत उत्पीड़न और राज्य द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग के मामले के तौर पर गलत तरीके से पेश किया गया था।

खास बात यह है कि रिपोर्ट में हिंसा स्थल से बरामद विदेशी कारतूसों की बरामदगी को कम करके दिखाया गया था। इनमें पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री से जुड़े गोला-बारूद भी शामिल थे। रिपोर्ट में पुलिस की उन जाँच निष्कर्षों पर भी ध्यान नहीं दिया गया, जिनसे पता चला था कि दंगाइयों ने ही कानून का पालन करवाने वालों पर गोलियाँ चलाई थीं और कुछ लोगों की मौत खुद दंगाइयों द्वारा चलाई गई गोलियों से हुई थी।

चुनिंदा गवाही वाले सबूतों को तरजीह देकर और फोरेंसिक डेटा को नजरअंदाज करके, यह रिपोर्ट एक ऐसा नैरेटिव गढ़ती है जो सुनने में तो दमदार लगता है, लेकिन अधूरा है। यह एक पहले से तय नेरेटिव को ही मजबूत करती है, यानी सिर्फ एकतरफ़ा पीड़ित होने के नैरेटिव को। यह उन बातों को छोड़ देती है, जिनसे यह पता चलता है कि संभल मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर हुए सर्वे के बाद जो हिंसा फैली, उसके लिए इस्लामी भीड़ ज़िम्मेदार थी।

वैचारिक माहौल: एक्टिविज़्म, अकादमिक जगत और प्रचार-प्रसार

APCR अकेला नहीं है, यह एक बड़े माहौल का हिस्सा है, जिसमें एक्टिविस्ट, अकादमिक लोग और मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं। ये सब मिलकर कुछ खास नैरेटिव गढ़ते हैं और उन्हें जोर-शोर से फैलाते हैं। इन्हीं लोगों में एक अहम शख्स हर्ष मंदर है, जो लंबे समय से इस्लामी नफरती अपराधों पर पर्दा डालने और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा भड़काई गई हिंसा के लिए बहुसंख्यक समुदाय को दोषी ठहराने का काम करते रहे हैं।

उनका संगठन ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ कई ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित कर चुका है, जो मुसलमानों को पीड़ित के तौर पर पेश करती हैं और हिंसा की इन घटनाओं में मुस्लिम भीड़ की संलिप्तता से जुड़े कड़वे सच पर पर्दा डालती है।

इस ‘एक्टिविस्ट’ पहलू को दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोगों का ‘अकादमिक’ जुड़ाव और मजबूती देता है। उनकी लेखनी और सार्वजनिक टिप्पणियाँ अक्सर सांप्रदायिक घटनाओं को बहुसंख्यकवादी राजनीति और सरकारी संस्थाओं की व्यापक आलोचना के दायरे में रखकर देखती हैं।

वामपंथी प्रकाशनों में अपनी लगातार टिप्पणियों के लिए मशहूर अपूर्वानंद ने सांप्रदायिकता पर होने वाली बहसों में खुद को बार-बार इस तरह पेश किया है कि वे सरकारी संस्थाओं की आलोचना करते हैं और घटनाओं को बहुसंख्यकवाद के नजरिए से देखते हैं। हालाँकि, उन्हें अक्सर इस बात के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है कि वे चुनिंदा मुद्दों पर ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। बातों को घुमा-फिराकर असल मुद्दे से भटका कर एक चिरपरिचित पैटर्न को अपनाया जाता है।

इसका अच्छा उदाहरण पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के बारे में उनकी टिप्पणियाँ हैं। अपूर्वानंद ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम पर आरोप लगाकर उनकी साख पर सवाल उठाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कसाब के मुकदमे के दौरान की गई टिप्पणियों का मकसद आतंकवादी के खिलाफ ‘दुश्मनी पैदा करना’ था।

जब उन्हें तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा, तो माफी माँगने के बजाय वे अपनी जिद पर अड़ गए। उन्होंने आतंकवादी के अपराधों से ध्यान हटाकर, उसे ‘समाज’ और ‘राजनीतिक नैरेटिव’ की ओर मोड़ दिया। ऐसा करके, उन्होंने एक हत्यारे के खिलाफ जनता के गुस्से को कम करने की कोशिश की।

एक सोची-समझी रणनीति के तहत धोखेबाजी वाला बयान देकर आतंकियों के हमले की गंभीरता को कम करने करने की कोशिश की गई। यह इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे अजमल कसाब जैसे आतंकवादियों और इस्लामी चरमपंथियों को उन लोगों से खुली छूट मिल जाती है जो खुद को ‘कार्यकर्ता’ और ‘शिक्षाविद’ कहते हैं, जबकि उनके गैर-मुस्लिम पीड़ितों को उकसाने वाला और भड़काने वाला करार दिया जाता है।

ये सभी मिलकर एक बहुस्तरीय विमर्श का निर्माण करते हैं जिसमें कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों को अकादमिक टिप्पणियों के माध्यम से वैधता दी जाती है और फिर कानूनी हस्तक्षेपों और अनुकूल मीडिया कवरेज के माध्यम से उन्हें और अधिक प्रचारित किया जाता है।

यह तंत्र एक हद तक समन्वय के साथ काम करता है, भले ही वह अनौपचारिक हो। रिपोर्टें कथाएँ गढ़ती हैं, शिक्षाविद बौद्धिक मान्यता प्रदान करते हैं और मुकदमेबाजी संस्थागत समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करती है।

विषमता का प्रश्न

इस तंत्र की सबसे ज्यादा आलोचना इस वजह से की जाती है कि इसमें सांप्रदायिक घटनाओं के मूल्यांकन में काफी विषमता है। मुस्लिम अपराधियों द्वारा की गई हिंसा को अक्सर प्रतिक्रियात्मक, परिस्थितिजन्य या उकसावे वाली हिंसा के रूप में देखा जाता है, जबकि हिंदू अपराधियों द्वारा की गई हिंसा को व्यवस्थागत, वैचारिक और व्यापक सामाजिक प्रवृत्तियों का सूचक माना जाता है।

उत्तम नगर मामले में, घटना को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, उसमें यह विषमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। तरुण कुमार की क्रूरतापूर्ण मॉब लिंचिग, एक स्थानीय विवाद के रूप में मानी जाती है। इसके विपरीत, इस हत्या के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और कथित नारों को व्यापक सांप्रदायिक शत्रुता और मुस्लिमों के खिलाफ संभावित हिंसा के सबूत के रूप में पेश किया जाता है। जोर देने का यह उलटफेर प्रभावी रूप से चिंता का केंद्र हिंसा की घटना से हटाकर उसके परिणामस्वरूप हुई प्रतिक्रिया पर केंद्रित कर देता है।

इस तरह की विषमता के व्यापक निहितार्थ हैं। यह न केवल सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित करती है, बल्कि पुलिसिंग प्राथमिकताओं और न्यायिक हस्तक्षेपों सहित संस्थागत प्रतिक्रियाओं को भी प्रभावित करती है। जब कथाओं का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि लगातार एक दृष्टिकोण को दूसरे पर प्राथमिकता दी जाती है, तो यह समान न्याय के सिद्धांत को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है।

पीड़ित होने की भावना का उपयोग

संरचनात्मक स्तर पर, एपीसीआर की याचिका में परिलक्षित दृष्टिकोण को पीड़ित होने की राजनीति के एक भाग के रूप में समझा जा सकता है। इस ढांचे में, पीड़ित होने की कथाओं का निर्माण और विस्तार समर्थन जुटाने, चर्चा को आकार देने और संस्थानों को प्रभावित करने का एक साधन बन जाता है।

इस प्रक्रिया में आम तौर पर घटनाओं का चयन, असुविधाजनक विवरणों को छिपाना और कथा को बल देने के लिए कानूनी और मीडिया मंचों का रणनीतिक उपयोग शामिल होता है। समय के साथ, एक ऐसी प्रतिक्रिया श्रृंखला बन जाती है जिसमें रिपोर्टें याचिकाओं को सही ठहराती हैं, याचिकाएं रिपोर्टों को प्रमाणित करती हैं, और दोनों का उपयोग एक विशेष विश्वदृष्टि को मजबूत करने के लिए किया जाता है। यद्यपि कमजोर समुदायों की वकालत एक लोकतांत्रिक समाज का अनिवार्य पहलू है, लेकिन यह तथ्यात्मक सटीकता और निरंतरता के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित होनी चाहिए।

APCR कैसे मीडिया, शिक्षा जगत और कानूनी दांव-पेच का इस्तेमाल करके इस्लामी कट्टरपंथ को सही ठहराता है

दिल्ली हाई कोर्ट में APCR की याचिका भारत में सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में नैरेटिव पर नियंत्रण को लेकर चल रही एक बड़ी लड़ाई का प्रतीक है। यह नागरिक समाज संगठनों की भूमिका, नैरेटिव गढ़ने के एक औजार के तौर पर कानूनी दांव-पेंच के गलत इस्तेमाल और अलग-अलग दावों के बीच संतुलन बनाने में संस्थाओं की जिम्मेदारियों के बारे में अहम सवाल उठाती है।

कानून-व्यवस्था बनाए रखना, हेट स्पीच (नफ़रत फैलाने वाले भाषण) को रोकना, और सभी समुदायों की सुरक्षा करना जायज और जरूरी मकसद हैं। लेकिन, इन लक्ष्यों को एक संतुलित और सबूतों पर आधारित तरीके से हासिल किया जाना चाहिए। न तो हिंसा की असली वजहों को छिपाए जाए और न ही किसी एक नैरेटिव को दूसरे से ज्यादा तरजीह दी जाए।

इसके बजाय, अपने निजी स्वार्थों के लिए बने कुछ समूह, जो खुद को ‘न्याय चाहने वाले संगठन’ बताते हैं, न्यायपालिका का इस्तेमाल अपने निजी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। अक्सर इससे हमलावर और पीड़ित की भूमिकाएँ उलट जाती हैं और हिंदू बहुसंख्यक समुदाय को एक ऐसे बदले की भावना रखने वाले समुदाय के तौर पर दिखाया जाता है, जो ‘शांतिप्रिय’ अल्पसंख्यकों से ‘बदला’ लेना चाहता है।

तरुण कुमार की हत्या के मामले में जवाबदेही तय होना अपने आप में एक जरूरी माँग है। इसे किसी ऐसी बड़ी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा बनाकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो असल घटना से ध्यान भटकाती हो। अगर संस्थाओं को जनता का भरोसा बनाए रखना है, तो उन्हें अपनी प्रतिक्रियाएँ तथ्यों, निष्पक्षता और कानून के राज पर आधारित रखनी होंगी और त्रासदियों को नैरेटिव की लड़ाई का हथियार बनाने की कोशिशों का विरोध करना होगा।

(मूलरूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

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