भारत अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए एक बड़े फैसले की दहलीज पर खड़ा है। बढ़ते क्षेत्रीय खतरों और फाइटर जेट्स की कमी को देखते हुए भारत सरकार फ्रांस से 114 नए राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की योजना पर काम कर रही है। हालाँकि इस संभावित डील के बीच फ्रांस ने ‘सोर्स कोड’ साझा करने से इनकार किया है।
भारत पहले ही 36 राफेल विमानों को अपनी वायुसेना में शामिल कर चुका है और नौसेना के लिए 26 राफेल-एम की खरीद प्रक्रिया भी आगे बढ़ चुकी है। अब 114 अतिरिक्त विमानों की योजना के बीच यह उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार भारत को ज्यादा तकनीकी छूट मिलेगी, जिसमें महत्वपूर्ण सोर्स कोड तक पहुँच भी शामिल है।
लेकिन फ्रांसीसी कंपनी डसाल्ट एविएशन (Dassault Aviation) ने कथित तौर पर राफेल के सबसे अहम सिस्टम जैसे AESA रडार, मॉड्यूलर डेटा प्रोसेसिंग यूनिट (MDPU) और SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट के सोर्स कोड साझा करने से इनकार कर दिया है। ये सिस्टम किसी भी आधुनिक फाइटर जेट की रीढ़ माने जाते हैं।
फ्रांस का तर्क है कि इन तकनीकों को विकसित करने में वर्षों लगे हैं और ये अत्यंत संवेदनशील हैं। ऐसे में भले ही भारत में उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हो, लेकिन इन कोड्स पर नियंत्रण फ्रांस के पास ही रहेगा। इसका सीधा असर यह होगा कि भारत राफेल में अपने हथियारों को स्वतंत्र रूप से एकीकृत नहीं कर पाएगा और हर बदलाव के लिए उसे फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ेगा।
‘सोर्स कोड’ क्या है और क्यों है इतना अहम?
किसी भी आधुनिक फाइटर जेट का ‘सोर्स कोड’ उसका डिजिटल दिमाग होता है। यह एक तरह का कंप्यूटर प्रोग्राम होता है, जो विमान के हर महत्वपूर्ण सिस्टम रडार, हथियार, सेंसर और नेविगेशन को नियंत्रित करता है।
अगर किसी देश के पास इस सोर्स कोड की पहुँच होती है, तो वह अपने हिसाब से विमान में बदलाव कर सकता है, नए हथियार जोड़ सकता है या सिस्टम को अपग्रेड कर सकता है। लेकिन अगर यह एक्सेस नहीं है, तो हर छोटे-बड़े बदलाव के लिए निर्माता देश या कंपनी पर निर्भर रहना पड़ता है।
यही वजह है कि सोर्स कोड को लेकर देश बेहद सतर्क रहते हैं और इसे साझा करने से बचते हैं। भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि वह अपने स्वदेशी हथियारों जैसे लंबी दूरी की मिसाइलों को इन विमानों में पूरी तरह स्वतंत्र तरीके से एकीकृत करना चाहता है।

