पीओके में पाकिस्तानी सेना और उसके नियंत्रित वाली सरकार के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन जोरों से जारी है। इसकी वजह से इलाके में अशांति फैली हुई है। एक ओर पाकिस्तान आंदोलन को कुचलने के लिए पीओके में प्रदर्शनकारियों की हत्या कर रहा है। वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत को कवर करने वाले मीडिया संस्थानों को डिजिटल सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है।
इसी कड़ी में पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने मुजफ्फरबाद चुनाव बहिष्कार और पीओके में राज्य की कार्रवाई को दिखाने पर कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा इंग्लिश पर प्रतिबंध लगा दिया है।
— Sohaib Khan (@iamsardarsohaib) August 3, 2026
पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 को PoK में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से अल जजीरा ने इन प्रदर्शनों को कवर किया है और पुलिस की कार्रवाई में भारी संख्या में आम जनता के मारे जाने को उजागर किया है, जबकि पाकिस्तानी अधिकारी रावलकोट और PoK के अन्य क्षेत्रों में अपनी क्रूर कार्रवाइयों को कम करके आँकते रहे हैं।
हाल ही में अल जजीरा ने मुजफ्फराबाद के उन लोगों को दिखाया और चुनाव बहिष्कार के बाद के हालात की जानकारी दी थी। इससे पाकिस्तानी हुक्मरान नाराज हो गए। उन्होने इसे चुनिंदा और पक्षपातपूर्ण बताते हुए इस पर रोक लगाने की घोषणा की। दरअसल वहाँ की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”

पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद अल जज़ीरा लगातार वहां की घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहा था। चैनल ने स्थानीय लोगों के हवाले से पुलिस कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने के दावे भी प्रकाशित किए, जबकि पाकिस्तानी प्रशासन इन दावों को कम करके दिखाता रहा।
हाल ही में अल जज़ीरा ने यह भी रिपोर्ट किया कि मुजफ्फराबाद के लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। इस पर पाकिस्तान सरकार ने आरोप लगाया कि चैनल ने चुनिंदा मतदान केंद्रों की रिपोर्टिंग कर चुनाव प्रक्रिया को गलत तरीके से पेश किया। दरअसल पीओके की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”
सिर्फ अल जज़ीरा ही नहीं, कई मीडिया संस्थान भी निशाने पर
रिपोर्टों के अनुसार, अल जजीरा अकेला मीडिया संस्थान नहीं है, जिस पर कार्रवाई हुई है। पाकिस्तान ने कई स्थानीय और क्षेत्रीय डिजिटल समाचार वेबसाइटों और प्लेटफॉर्मों की पहुँच भी सीमित कर दी गई है।
इनमें पाकिस्तान की प्रमुख विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI), उसके संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के चैनल भी शामिल बताए जा रहे हैं।
इससे पहले इस्लामाबाद की एक अदालत में राष्ट्रीय साइबर अपराध जांच एजेंसी (NCCIA) की रिपोर्ट के आधार पर कई यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई थी। एजेंसी का आरोप था कि ये चैनल पाकिस्तान की सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों के खिलाफ भड़काऊ और अपमानजनक सामग्री प्रसारित कर रहे हैं। इसके तुरंत बाद, क्षेत्र के कुछ हिस्सों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी निलंबित कर दी गईं।
जम्मू और कश्मीर में अशांति की शुरुआत 45 सीटों वाली पीओके विधानसभा की 12 सीटों को लेकर हुए विवाद से हुई, जो भारतीय जम्मू और कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय ग्रुप का आरोप है कि इस्लामाबाद इन सीटों का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने और अपनी पसंद की सरकारें स्थापित करने के लिए करता है, जिससे स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाता है।
8 जून को पुंछ जिले के रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें कई स्थानीय लोगों के मारे जाने की खबर आई।
9 जून को जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी ने पूरे क्षेत्र में बंद का आह्वान किया। इसके बाद मुजफ्फराबाद समेत कई शहरों में बाजार, परिवहन और सरकारी संस्थान बंद रहे।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि बाद में पाकिस्तान ने इलाके में खाद्य सामग्री, ईंधन और स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित की।
चुनाव के दौरान भी हिंसा
करीब दो महीने तक चले विरोध प्रदर्शनों के बीच हुए चुनाव भी हिंसक रहे। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
मारे गए लोगों में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेता सरदार उमर नजीर के भाई उस्मान नजीर भी शामिल बताए गए।
स्थानीय संगठनों का दावा है कि अब तक सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 80 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन घटनाओं के विरोध में मुजफ्फराबाद के कई लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। उनका कहना था कि जब इतने लोगों की मौत हो चुकी है, तब सामान्य चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बयान
जुलाई 2026 के अंत में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों को भारत जैसा दुश्मन बताया। उन्होंने कहा, “मैं इन प्रदर्शनकारियों को भी भारत की तरह पाकिस्तान का दुश्मन मानता हूँ।”
इससे पहले भी ख्वाजा आसिफ ने रावलाकोट और मीरपुर के लोगों को ‘असल कश्मीरी नहीं’ बताया था, क्योंकि वे अपने अधिकारों की माँग कर रहे थे।
पाकिस्तान लंबे समय से पीओके में मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर कड़ी निगरानी रखता है। समय-समय पर इंटरनेट बंद करना, संचार सेवाएं रोकना और पत्रकारों की आवाजाही सीमित करना इसी नीति का हिस्सा बताया जाता है।
पहले JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया और अब स्थानीय तथा विदेशी मीडिया संस्थानों पर भी कार्रवाई की जा रही है। कई पत्रकारों पर इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (PECA) और अन्य स्थानीय कानूनों के तहत मामले दर्ज होने की भी खबरें हैं।
इसी वजह से कई स्थानीय मीडिया संस्थानों पर सरकारी लाइन का समर्थन करने या स्वयं सेंसरशिप अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में ‘आज़ाद’ जैसा कुछ भी नहीं है। पाकिस्तान न केवल कश्मीरी लोगों और संस्थानों पर, बल्कि कब्जे वाले क्षेत्र के बारे में प्रचलित धारणाओं पर भी कड़ा नियंत्रण रखता है।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई मौकों पर पाकिस्तान समर्थक स्थानीय पत्रकारों के साथ-साथ विदेशी पत्रकारों के लिए पीओके में चुनिंदा स्थलों पर जाने की अनुमति दी, ताकि भारत के आरोपों को झूठा साबित किया जा सके।
जबकि हालात ऐसे हैं कि वहाँ आए दिन हिंसक घटनाएँ हो रही हैं। पाकिस्तान इलाके में सबकुछ सही है यह दिखाने और तथाकथित विकास को दिखाने के लिए तथ्यात्मक झूठ को बढ़ावा देता रहा है। वह उन पर नियंत्रण रखना चाहता है। उसकी पूरी कोशिश होती है कि वह किसी तरह पीओके के कश्मीरी लोग और जम्मू और कश्मीर के भारतीय हिस्से में रहने वालों की तुलना कर ये बताएँ कि ‘आजाद कश्मीर’ में अधिक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण तरीके से लोग जीवन जी रहे हैं।
पाकिस्तान सकारात्मक प्रचार के लिए कश्मीर के पीओके में चुनिंदा मीडिया भेजता है, ताकि उसका प्रोपेगेंडा साबित हो सके। साथ ही उन मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित करता है, जो उसके दमनकारी चेहरे को दुनिया के सामने लाते हैं।
पिछले साल मई में जब भारत ने पाकिस्तान-नियंत्रित क्षेत्रों में इस्लामी आतंकी ढाँचे पर हमला किया, तो इस्लामाबाद ने तुरंत विदेशी पत्रकारों के सामने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया पीओके में बेहाल कानून-व्यवस्था और कश्मीरियों पर की जा रही हिंसक कार्रवाई को कवर करता है, तो उसी मीडिया को परेशान किया जाता है, प्रतिबंधित किया जाता है और उनकी कवरेज पर सवाल उठाए जाते हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


