मिडिल ईस्ट युद्ध यानी ईरान युद्ध जैसे संकट के बीच मोदी सरकार की दूरदर्शिता सामने आ रही है। आज जब पूरी दुनिया ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रही है, तो भारत ने इन जैसे संकटों को देखते हुए पहले ही तैयारी शुरू कर दी थी। इसका एक नमूना है मंगलौर में दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी 80,000 मीट्रिक टन क्षमता वाली अंडरग्राउंड एलपीजी कैवर्न, जो सिर्फ 6 माह पहले ही सितंबर 2025 पूरी तरह ऑपरेशनल हुई है।
जी हाँ, मोदी सरकार ने साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से न सिर्फ ऑयल रिजर्व बनाए हैं, बल्कि एलपीजी जैसी महत्वपूर्ण एनर्जी स्रोत के लिए भी स्ट्रेटजिक रिजर्व बनाने पर जोर दिया था। ऐसा ही स्ट्रेटजिक रिजर्व है मंगलौर में स्थित अंडरग्राउंड एलपीजी कैवर्न, जिसमें 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी को आपात समय के लिए स्टोर करके रखा जाता है। इसे सिर्फ 6 माह पहले ही चुपचाप ऑपरेशनल किया गया था, जिसके बारे में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी थी।
इस रिजर्व के बारे में सार्वजनिक तौर पर बहुत कम बात की गई। इसका मतलब साफ है कि मोदी सरकार सभी परिस्थितियों को देखते हुए चुपचाप देश का भविष्य सुरक्षित रखने की दिशा में काम कर रही थी। हालाँकि अब पीएम मोदी ने जब सोमवार (23 मार्च 2026) को लोकसभा में मिडिल ईस्ट युद्ध को लेकर अपना बयान दिया, तब उन्होंने जरूरत इसका जिक्र दिखा।
लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा, “भारत अपनी जरूरत की 60% LPG आयात करता है। इसकी वजह से डोमेस्टिक सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है। पेट्रोल-डीजल की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी रहे, इसके लिए भी काम किया जा रहा है। भारत सरकार ने बीते 11 सालों में एनर्जी इंपोर्ट का डायवर्सिफिकेशन किया है। पहले क्रूड, एलएनजी इत्यादि चीजें 27 देशों से मंगाया जाता था, आज 41 देशों से एनर्जी उत्पाद मंगाए जाते हैं। हमारी सरकार ने संकट के इसी समय के लिए स्ट्रेटजिक स्टोरेज बनाए थे। जिसकी क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है।”
भारत अपनी जरूरत की 60% LPG आयात करता है। इसकी वजह से डोमेस्टिक सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है। पेट्रोल-डीजल की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी रहे, इसके लिए भी काम किया जा रहा है। भारत सरकार ने बीते 11 सालों में एनर्जी इंपोर्ट का डायवर्सिफिकेशन किया है। पहले क्रूड, एलएनजी इत्यादि… pic.twitter.com/FATBTXdrT0
— ऑपइंडिया (@OpIndia_in) March 23, 2026
मंगलौर एलपीजी कैवर्न के बारे में जानिए अहम बातें
मंगलौर एलपीजी कैवर्न भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक शानदार उदाहरण है। कर्नाटक के मंगलौर में स्थित यह सुविधा दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत एलपीजी स्टोरेज कैवर्न है। मोदी सरकार की दूरदर्शी नीति के तहत बनाई गई यह परियोजना पश्चिम एशिया जैसे संकट के समय देश को स्थिर एलपीजी सप्लाई सुनिश्चित करती है। यह न सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं बल्कि उद्योगों को भी निरंतर ईंधन उपलब्ध कराती है।
इस कैवर्न की कुल क्षमता 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी है। यह लगभग 6 लाख बैरल या 6 करोड़ लीटर ईंधन स्टोर करने में सक्षम है। इतनी बड़ी क्षमता इसे देश की सबसे बड़ी एकल एलपीजी कैवर्न बनाती है। कम माँग के समय स्टोरेज भरकर रखने से अंतरराष्ट्रीय कीमत उतार-चढ़ाव का असर कम होता है।
कैवर्न का निर्माण समुद्र तल से 156 मीटर नीचे किया गया है। इसमें दो विशाल अंडरग्राउंड टनल्स हैं, एक 1220 मीटर लंबी और दूसरी 225 मीटर लंबी। एक्सेस टनल एक किलोमीटर से ज्यादा लंबा है और गहराई 128 मीटर तक जाती है। यह गहराई प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती है।
भारत में यह पहली बार अंडरग्राउंड रॉक कैवर्न टेक्नोलॉजी का उपयोग एलपीजी स्टोरेज के लिए हुआ है। पारंपरिक टैंकों से अलग यह तकनीक लीक का खतरा लगभग शून्य करती है। इससे ऊर्जा भंडारण का नया मानक स्थापित हुआ है।
कैवर्न को मौजूदा एलपीजी प्लांट के ठीक नीचे बनाया गया। इससे जमीन का दोहरी उपयोग संभव हुआ और अतिरिक्त जगह की जरूरत नहीं पड़ी। यह नवाचारी डिजाइन भविष्य की परियोजनाओं के लिए बेंचमार्क है।
इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) ने एपीसीएम कंसल्टेंट के रूप में इस प्रोजेक्ट को पूरा किया। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के लिए बनाई गई यह सुविधा EIL की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का प्रमाण है। निर्माण में 500 से ज्यादा कुशल इंजीनियर और मजदूर लगे।
यह कैवर्न सितंबर 2025 से पूरी तरह ऑपरेशनल है। सफल ‘गैस-इन’ के बाद पिछले 6 महीनों से निर्बाध काम कर रही है। न्यू मंगलौर पोर्ट पर आने वाले एलपीजी टैंकरों का स्टोरेज अब आसान हो गया है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह परियोजना महत्वपूर्ण है। भारत 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है। कैवर्न संकट के समय बफर का काम करती है और घरेलू सप्लाई को प्राथमिकता देती है। पेट्रोल-डीजल की निरंतरता भी सुनिश्चित करती है।
- सुरक्षा के लिहाज से इसमें वॉटर कर्टेन टेक्नोलॉजी लगाई गई है। इससे गैस रिसाव का खतरा न के बराबर है। पर्यावरण अनुकूल होने के कारण यह मौसम या हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन को यह कैवर्न साकार करती है। भविष्य में ऐसी और सुविधाएँ बनने से 2030 तक 90 दिनों का रिजर्व लक्ष्य हासिल होगा। यह 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी है और इंजीनियरिंग चमत्कार का प्रतीक है।
भारत के अन्य रणनीतिक ईंधन भंडारण हैं उर्जा के क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा कवच
मोदी सरकार की ऊर्जा सुरक्षा नीति के तहत मंगलौर एलपीजी कैवर्न (80,000 मीट्रिक टन) के अलावा भारत के पास कई अन्य रणनीतिक ईंधन भंडारण सुविधाएँ हैं। ये भूमिगत रॉक कैवर्न देश को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवधान, कीमत उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक संकट (जैसे पश्चिम एशिया तनाव) से बचाती हैं। भारतीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लिमिटेड (ISPRL) इनका प्रबंधन करती है।
क्रूड ऑयल रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) – फेज-1
ये तीन प्रमुख भूमिगत कैवर्न हैं, जिनकी कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है। यह भारत की करीब 9.5-10 दिनों की क्रूड ऑयल जरूरत पूरी कर सकती है-
- विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश): इसकी क्षमता 1.33 MMT है।
- मंगलौर (कर्नाटक): इसकी क्षमता 1.50 MMT है, ये एलपीजी कैवर्न से अलग है और सिर्फ क्रूड ऑयल के लिए है।
- पाडुर (कर्नाटक): इसकी क्षमता 2.50 MMT है।
ये सुविधाएँ समुद्र तल से 100-150 मीटर नीचे चट्टानों में बनी हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं, हमलों और लीक से पूरी तरह सुरक्षित हैं।
अन्य एलपीजी कैवर्न (मंगलौर के अलावा)
विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश): 60,000 मीट्रिक टन क्षमता वाली भूमिगत एलपीजी कैवर्न (HPCL और फ्रांस की Total Energies का 50:50 जॉइंट वेंचर) है। यह देश की दूसरी सबसे बड़ी एलपीजी स्टोरेज है और आयात की अस्थिरता से बचाव करती है। इसके निर्माण की शुरुआत 1999 में हुई थी।
फेज-2 (निर्माणाधीन/स्वीकृत)
- चंडीखोल (ओडिशा): ये प्रोजेक्ट काफी बड़ा है, जिसकी क्षमता 4.0 MMT की होगी। इसका विकास PPP मॉडल पर किया जा रहा है।
- पाडुर अतिरिक्त (कर्नाटक): इसकी क्षमता 2.5 MMT की होगी। अभी इस पर काम चल रहा है।
इनके पूरा होने पर कुल SPR क्षमता 11.83 MMT हो जाएगी, जो 22 दिनों की उर्जा जरूरतों को पूरी करेगी। भविष्य में बीकानेर (राजस्थान) में सॉल्ट कैवर्न और राजकोट, बीना जैसी नई साइट्स पर काम चल रहा है।
फिलहाल देश का पूरा ईंधन स्टॉक (SPR + कमर्शियल) मिलाकर 74 दिन तक का बफर उपलब्ध है। ये सुविधाएँ प्रधानमंत्री मोदी के ‘संकट के समय की तैयारी’ वाले विजन को साकार करती हैं। मंगलौर एलपीजी कैवर्न के साथ ये अन्य भंडारण भारत को दक्षिण एशिया की सबसे मजबूत ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था देते हैं।
मंगलौर के अलावा ये अन्य रणनीतिक भंडारण देश को आत्मनिर्भर बनाते हैं। सरकार लगातार विस्तार कर रही है ताकि 2030 तक 90 दिनों का रिजर्व लक्ष्य हासिल हो सके। यह न सिर्फ इंजीनियरिंग चमत्कार है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी भी है।
हॉर्मूज संकट के बीच दिखी भारत की ताकत, अमेरिकी-रूसी जहाज एक साथ पहुँचे मंगलौर पोर्ट
बहरहाल, हॉर्मूज संकट के बीच ही रविवार (22 मार्च 2026) को न्यू मंगलौर पोर्ट पर दो महत्वपूर्ण टैंकर पहुँचे हैं। इसमें पहला है अमेरिका से 16,714 टन एलपीजी ले कर आया पायक्सिस पॉयनियर और दूसरा है रूस से 96,099 टन क्रूड ऑयल ले कर आया एक्वॉ टाइटन। इन दोनों ही टैंकरों की अनलोडिंग एक ही जगह पर इसलिए हो रही है, क्योंकि मंगलोर में क्रूड रिजर्व के साथ ही अब एलपीजी रिजर्व पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुका है। पूरी दुनिया में जहाँ ये दोनों शक्तियाँ प्रतिस्पर्धा करती हैं, वहीं भारत में चुपचाप भारत की उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए क्रूड और एलपीजी पहुँचा रही हैं।
वैश्विक संकट में पता चला मंगलौर प्रोजेक्ट का असली मूल्य
मंगलौर परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल पूरे देश में दोहराया जा सकता है। MEIL और EIL जैसी कंपनियों की तकनीकी क्षमता ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है। दक्षिण एशिया में ऐसी कोई दूसरी सुविधा नहीं है। यह भारत की बढ़ती ताकत और मोदी सरकार की विजनरी लीडरशिप को दर्शाती है।
साफतौर पर देखें तो मंगलौर एलपीजी कैवर्न सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी है। जब दुनिया संकट से गुजर रही है, तब भारत अपनी तैयारी से मजबूती दिखा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में ऊर्जा क्षेत्र में हो रहे इन क्रांतिकारी बदलावों ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ वैश्विक पटल पर एक विश्वसनीय ऊर्जा पार्टनर भी बनाया है। यह परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।


