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कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़, 5 डॉक्टरों समेत 6 गिरफ्तार: पढ़ें- कैसे ₹50000 के विवाद से खुला अंग तस्करी का करोड़ों का नेटवर्क

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह कोई छोटा मामला नहीं बल्कि एक बड़ा संगठित नेटवर्क है। इसमें दलाल, अस्पताल और डॉक्टर सभी मिलकर काम करते थे। दलाल गरीब लोगों को फँसाते थे, अस्पताल ऑपरेशन की सुविधा देते थे और डॉक्टर बिना जरूरी कागजों के ट्रांसप्लांट करते थे।

उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने 30 मार्च और 31 मार्च की रात के बीच एक बड़े अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस रैकेट में कम से कम 6 डॉक्टर और 8 अन्य लोग शामिल थे।

यह पूरा मामला तब सामने आया जब 50,000 रुपए के लेन-देन को लेकर विवाद हुआ। एक ‘डोनर’ (किडनी देने वाले) को उसकी एक किडनी के बदले 10 लाख रुपये देने का वादा किया गया था लेकिन उसे सिर्फ 9.5 लाख रुपए मिले। 50,000 रुपए कम मिलने से नाराज होकर उसने पुलिस से संपर्क किया और पूरे रैकेट की जानकारी दे दी।

पुलिस ने इस मामले में 6 डॉक्टरों डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा, डॉ. प्रीति आहूजा, डॉ. रोहित, डॉ. वैभव, डॉ. अनुराग और डॉ. अफजल के अलावा शिवम अग्रवाल, राजेश कुमार, रामप्रकाश कुशवाहा, नरेंद्र सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। अब तक कम से कम 6 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यह FIR सब-इंस्पेक्टर मुकेश कुमार की शिकायत पर दर्ज की गई है। इसमें मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 की धाराएँ 18, 19 और 20 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 143 और 3(5) लगाई गई हैं।

इस रैकेट में कई अस्पताल शामिल थे जिनमें प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर, आहूजा हॉस्पिटल और मेडलाइफ हॉस्पिटल शामिल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉ. अफजल, डॉ. रोहित, डॉ. वैभव और डॉ. अनुराग इस रैकेट के मुखिया थे। वहीं, डॉ. सुरजीत और उनकी पत्नी आहूजा हॉस्पिटल के मालिक थे जहाँ ये ऑपरेशन किए जाते थे।

साभार: UP पुलिस

कैसे 50,000 रुपए के विवाद ने खोला राज?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक किडनी डोनर ने पुलिस से शिकायत की कि उसे तय रकम से 50,000 रुपए कम दिए गए। इस डोनर की पहचान आयुष के रूप में हुई है जो बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है और मेरठ में रह रहा था। उसने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण उसने 10 लाख रुपए में अपनी एक किडनी बेचने के लिए सहमति दी थी।

हालाँकि, उसे सिर्फ 9.5 लाख रुपए मिले। बार-बार पैसे देने में देरी और कम भुगतान से परेशान होकर उसने पुलिस से संपर्क किया जिसके बाद जाँच शुरू हुई और पूरे रैकेट का खुलासा हुआ।

बहला-फुसलाकर ली गई किडनी और मोटे दाम पर बेची

जाँच में पता चला कि कल्याणपुर का एक एंबुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को फँसाता था। वह खुद को मेडिकल मदद दिलाने वाला व्यक्ति बताता था और कहता था कि किसी मरीज के रिश्तेदार को किडनी की जरूरत है।

आयुष के केस में उसकी किडनी मुजफ्फरनगर की एक महिला के परिवार को 60 लाख से 90 लाख रुपये तक में बेची गई जबकि आयुष को इसका बहुत छोटा हिस्सा मिला। एक अन्य मामले में एक महिला छात्रा को करीब 4 लाख रुपए दिए गए जबकि उसकी किडनी 45 से 50 लाख रुपए के बीच बेचे जाने का अनुमान है।

तीन अस्पतालों वाला मॉडल

पुलिस जाँच में सामने आया कि यह रैकेट एक खास रणनीति के तहत काम करता था जिसे ‘तीन अस्पताल मॉडल’ कह सकते हैं। इसमें किडनी निकालने का ऑपरेशन एक अस्पताल में किया जाता था। इसके बाद डोनर और मरीज को थोड़ी देर साथ रखा जाता था और फिर दोनों को अलग-अलग अस्पतालों में भेज दिया जाता था ताकि इलाज का रिकॉर्ड एक ही जगह पर पूरा न मिले।

आयुष को भी ऑपरेशन के बाद एक दूसरे अस्पताल में अलग पहचान के साथ भेजा गया जबकि जिस मरीज को किडनी दी गई थी, उसे कहीं और भेज दिया गया।

FIR में क्या लिखा है?

ऑपइंडिया के पास इस मामले की FIR कॉपी मौजूद है। FIR के अनुसार, पुलिस को मसवानपुर चौराहे के पास चेकिंग के दौरान इस रैकेट की सूचना मिली। सूचना देने वाले ने बताया कि आहूजा अस्पताल में बाहर के डॉक्टर आकर ट्रांसप्लांट करते हैं और लोगों को पैसे का लालच देकर लाया जाता है। उस समय भी एक ऑपरेशन चल रहा था।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी। अतिरिक्त पुलिस बल और असिस्टेंट चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर रमित रस्तोगी के नेतृत्व में एक मेडिकल टीम का गठन किया। टीम अस्पताल पहुँची और सबसे पहले शिवम अग्रवाल से पूछताछ की। उसने पहले कुछ भी जानकारी होने से इनकार किया और डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा के पास भेज दिया।

साभार: UP पुलिस

जब डॉ. आहूजा और उनकी पत्नी डॉ. प्रीति आहूजा ने पुलिस को देखा तो वे घबरा गए। पहले उन्होंने भी इनकार किया लेकिन जाँच में पाया गया कि अस्पताल के CCTV कैमरे बंद थे। बाद में डॉ. आहूजा ने माना कि जिन दिनों अवैध ट्रांसप्लांट होते थे, उन दिनों कैमरे जानबूझकर बंद कर दिए जाते थे।

FIR के मुताबिक, डॉक्टरों और शिवम ने पैसे के लालच में इस गैरकानूनी काम में शामिल होने की बात स्वीकार की। उन्होंने बताया कि पिछली रात अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में अवैध ट्रांसप्लांट किया गया था। शिवम का काम डोनर और मरीज लाना था। अस्पताल ऑपरेशन थिएटर इस्तेमाल करने के बदले 2,75,000 रुपए नकद लेता था।

ऑपरेशन की टीम में डॉ. रोहित, डॉ. वैभव, डॉ. अनुराग और डॉ. अफजल शामिल थे जो बाहर से आते थे रात में ऑपरेशन करते थे और फिर चले जाते थे। ऑपरेशन के लिए दवाइयाँ और बाकी इंतजाम भी यही टीम करती थी।

जाँच के दौरान ऑपरेशन में इस्तेमाल हुई दवाइयों और उपकरणों के चार डिब्बे बरामद किए गए और सील कर दिए गए। FIR में बताया गया कि किडनी लेने वाली मरीज पारुल तोमर और डोनर आयुष कुमार को अलग-अलग अस्पतालों में पाया गया जहाँ डॉक्टरों ने पुष्टि की कि दोनों की किडनी का ऑपरेशन हुआ था।

FIR में कहा गया है कि अस्पताल में बिना किसी कागजी कार्रवाई के भर्ती किया जाता था। शिवम अग्रवाल ने माना कि वह 2024 से ऐसे कई मामलों में शामिल रहा है। सबूत मिलने और पूछताछ के बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

जाँचकर्ताओं का कहना है कि डॉ. अफजल कथित तौर पर डायलिसिस सेंटरों पर मरीजों की पहचान करते थे और उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए राजी करते थे। वहीं, ऑपरेशन करने के लिए लखनऊ और नोएडा जैसे शहरों से सर्जनों की टीम बुलाई जाती थी।

बड़ा नेटवर्क, डॉक्टरों और अस्पतालों की मिलीभगत

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह कोई छोटा मामला नहीं बल्कि एक बड़ा संगठित नेटवर्क है। इसमें दलाल, अस्पताल और डॉक्टर सभी मिलकर काम करते थे। दलाल गरीब लोगों को फँसाते थे, अस्पताल ऑपरेशन की सुविधा देते थे और डॉक्टर बिना जरूरी कागजों के ट्रांसप्लांट करते थे। ऑपरेशन ज्यादातर रात में होते थे और मरीजों को तुरंत अलग-अलग जगह भेज दिया जाता था।

दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैले हो सकते हैं तार

पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार, इस रैकेट के तार सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं हो सकते। यह दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों तक फैला हो सकता है और नेपाल तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से भी इसके संबंध हो सकते हैं। शुरुआती जाँच में पता चला है कि अब तक 40 से 50 अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं जिनमें कुछ विदेशी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Anurag
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