‘कोर्ट तय न करे धार्मिक प्रथा सही है या गलत’: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री बैन को लेकर SC से केंद्र

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद में केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है। मंगलवार (7 अप्रैल 2026) को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने मंदिर की पुरानी परंपरा का समर्थन किया। केंद्र सरकार ने कहा कि 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध पूरी तरह धार्मिक आस्था का मामला है। यह मामला अदालत के दायरे से बाहर है और इसे व्यक्तिगत आजादी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

धार्मिक परंपराओं में न हो दखल

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हर धर्म की अपनी अलग परंपराएँ होती हैं और उनका सम्मान होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना अनिवार्य है, तो उसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता। उनके मुताबिक, अदालत को यह नहीं देखना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा आधुनिक है या नहीं।

जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि हमारा संविधान हर किसी को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है। भले ही कुछ परंपराएँ तर्क या विज्ञान की कसौटी पर खरी न उतरें, फिर भी वे आस्था का हिस्सा हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि धार्मिक मामलों में अदालती दखल देना ठीक नहीं होगा। यह न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन हो सकता है।

क्या है सबरीमाला विवाद?

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं का जाना मना है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को गलत बताया था और महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। साल 2019 में इस मामले को फिर से बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया। अब 7 से 22 अप्रैल के बीच इस पर अंतिम सुनवाई चल रही है।

इस सुनवाई में केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों से जुड़ी प्रथाएँ भी शामिल हैं। इसमें मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री और पारसी महिलाओं के अधिकारों पर भी बहस हो रही है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो धार्मिक आजादी की नई परिभाषा तय कर सकता है।