दिल्ली का एलिट जिमखाना क्लब इन दिनों गहरे विवादों में घिरा है। केंद सरकार ने इसे ‘रक्षा अवसंरचना को मजबूत और सुरक्षित करने’ के नाम पर 27.3 एकड़ की अपनी जमीन खाली करने का नोटिस दिया है, जिसे क्लब ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी और मामला अभी कोर्ट में चल रहा है।
इसी बीच द इंडियन एक्स्प्रेस ने क्लब के आंतरिक दस्तावेजों की पड़ताल की, जिसमें कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। यहाँ मृत सदस्यों के कार्ड पर खाने-पीने के बिल, प्रधानमंत्री आवास के पास ड्रोन उड़ाने की घटना, सदस्यों को ही वकील बनाकर करोड़ों की फीस देना और 9 साल बाद ऑडिटर का इस्तीफा- ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जिसपर क्लब प्रशासन कोई ठोस जवाब नहीं दे पाया है।
मुर्दा सदस्यों के नाम पर चलता रहा खाने-पीने का हिसाब
बेकर टिली बिजनेस एडवाइजरी सर्विसेज द्वारा तैयार किए गए फॉरेंसिक ऑडिट के मसौदे में कैटरिंग बिक्री से जुड़े ऐसे मामलों का पता चला, जिनसे क्लब की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। नवंबर 2022 में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) को सौंपी गई यह रिपोर्ट वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच की वित्तीय गतिविधियों पर आधारित थी।
रिपोर्ट के मुताबिक कैटरिंग सेल्स डेटा की जाँच के दौरान 31 ऐसे संभावित मामले सामने आए, जिनमें मुर्दा सदस्यों के नाम पर खाने-पीने का बिल बनाया गया। ऑडिट रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि इन खातों का इस्तेमाल गैर-सदस्यों द्वारा क्लब की सुविधाएँ लेने के लिए किया गया होगा।
यह मामला वर्ष 2024 में एक बार फिर चर्चा में आया। 13 जुलाई 2026 को चाणक्यपुरी थाने में दर्ज एक जनरल डायरी एंट्री में क्लब के फूड एंड बेवरेज मैनेजर राजेश भटनागर पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक बुजुर्ग और बीमार सदस्य के कार्ड का दुरुपयोग करते हुए चार अनधिकृत मेहमानों को ड्रिंक्स उपलब्ध कराईं और बदले में नकद भुगतान लिया। उल्लेखनीय है कि राजेश भटनागर वर्तमान में क्लब के कार्यवाहक सचिव का दायित्व भी संभाल रहे हैं।
सदस्यों को ही वकील बनाया, 5 साल में ₹8.22 करोड़ मुकदमेबाजी में खर्च
फॉरेंसिक ड्राफ्ट रिपोर्ट में हितों के टकराव के भी कई उदाहरण दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, क्लब ने अपने ही सदस्यों को कानूनी मामलों में वकील नियुक्त किया और उन्हें कुल 1.95 करोड़ रुपए की फीस का भुगतान किया। इनमें अरुण काथपालिया को 77 लाख रुपए, गौरव मोहन लिबरहान को 28.76 लाख रुपए और हरीश साल्वे को 20 लाख रुपए दिए गए।
जाँच में आठ ऐसे मामलों का भी पता चला, जिनमें विक्रेता कंपनियों के निदेशक या उनके रिश्तेदार खुद ही क्लब के सदस्य थे। वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच ऐसे विक्रेताओं को 36 करोड़ रुपए के ठेके दिए गए, लेकिन उन्हें कभी ‘संबंधित पक्ष’ के रूप में घोषित नहीं किया गया।
हालाँकि अप्रैल 2022 में सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासन के कार्यभार संभालने के बाद सदस्यों को वकील नियुक्त करने की परंपरा समाप्त कर दी गई, लेकिन कानूनी खर्च में कमी नहीं आई। वर्ष 2021-22 में कानूनी फीस 1.84 करोड़ रुपए थी, जो अगले ही वित्तीय वर्ष 2022-23 में बढ़कर 2.09 करोड़ रुपए हो गई। वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच क्लब ने मुकदमेबाजी पर कुल 8.22 करोड़ रुपए खर्च किए।
9 साल बाद ऑडिटर का इस्तीफा, रिकॉर्ड तक पहुँच से इनकार
क्लब के लंबे समय से ऑडिट का काम संभाल रहे खन्ना एंड आनंदहनम ने 9 वर्षों की सेवा के बाद 31 मार्च 2024 को इस्तीफा दे दिया। वर्ष 2021-22 और 2022-23 की ऑडिट रिपोर्टों में फर्म ने कई गंभीर आपत्तियाँ दर्ज की थीं। इनमें बजट प्रक्रिया का अभाव, आंतरिक ऑडिट व्यवस्था का न होना, सॉफ्टवेयर और मैनुअल रिकॉर्ड के बीच गड़बड़ियाँ और जरूरी दस्तावेजों तक पहुँच नहीं मिलना शामिल था।
इसके बाद नियुक्त नए ऑडिटर एवीए एंड एसोसिएट्स ने भी वर्ष 2023-24 की रिपोर्ट में यही शिकायत दोहराई कि उन्हें बेकर टिली की फॉरेंसिक रिपोर्ट सहित कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए। उधर, दिसंबर 2023 में आयोजित क्लब की अंतिम वार्षिक आम बैठक में सदस्यों ने खातों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।
PM आवास के पास उड़ा था ड्रोन, जाँच आज तक अधर में
क्लब से जुड़ा एक और गंभीर मामला प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा से जुड़ा है। अगस्त 2022 में क्लब परिसर से प्रधानमंत्री आवास की सीमा से सटी दीवार के पास ड्रोन उड़ाने जाने की घटना सामने आई थी। 01 अक्टूबर 2022 को कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय को भेजे गए नोट में दिल्ली पुलिस ने उल्लेख किया था कि क्लब के कुछ अधिकारियों और ‘असामाजिक तत्वों’ ने प्रतिबंधित क्षेत्र में ड्रोन उड़ाकर प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे में डाला।
जानकारी के अनुसार, 13 अगस्त 2022 को संभावित वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान लोक कल्याण मार्ग स्थित सुरक्षा एजेंसी के तकनीकी उपकरणों ने करीब दो मिनट तक ड्रोन की गतिविधि दर्ज की थी। बाद में बताया गया कि मामले को आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को स्थानांतरित कर दिया गया है, लेकिन EOW के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ही ऐसे किसी मामले की जानकारी होने से इनकार कर दिया। ऐसे में प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मामले की जाँच का अंतिम निष्कर्ष आज तक सामने नहीं आ सका है।
फॉरेंसिक ऑडिट और ऑडिट रिपोर्टों में जो बातें सामने आई हैं, वो क्लब के पैसों के हिसाब-किताब, जिम्मेदारी और ईमानदारी पर बड़े सवाल उठाती हैं। इससे ये भी साफ होता है कि अगर समय रहते सही निगरानी और जवाबदेही नहीं रखी गई, तो ऐसी संस्थाओं में गड़बड़ियों को रोकना मुश्किल हो जाएगा।

