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यात्रा गोरक्षा के लिए, बातें मुलायम-अखिलेश-मुस्लिम की, मंच पर शिवपाल-डिंपल यादव: क्या सपा की चुनावी चाल में फँस गए हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सपा के सुर में सुर मिलाकर देश में जातियों की बात करना और इस्लामिस्टों के प्रति नरम रुख दिखाना यह दर्शाता है कि वे अनजाने में ही सही, लेकिन सपा के ‘डिवाइड एंड रूल’ (बाँटो और राज करो) के एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

सनातन धर्म में संतों का स्थान हमेशा से राजनीति और सत्ता के गलियारों से ऊपर माना गया है। संत का धर्म होता है सत्य की रक्षा, निष्पक्षता और समाज को सही राह दिखाना। लेकिन बीते कुछ दिनों में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की राजनीतिक बयानबाजी और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रति उनका झुकाव एक नए विवाद को जन्म दे रहा है।

राजनीतिक गलियारों और सनातन प्रेमियों के बीच आज यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सपा की सोची-समझी राजनीतिक चाल को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई और कहानी है? वह रह-रहकर सपा की तारीफ करते हैं, कभी इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो कभी देश में जातियों की राजनीति की बात करने लगते हैं।

अभी इटावा और सैफई में यादव परिवार के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने जो बयान दिए, उसने करोड़ों सनातनी भक्तों को हैरान कर दिया है।

सैफई में मुलायम परिवार की तारीफों के बाँधे पुल, क्या इतिहास भूल गए?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों ‘गौ-प्रतिष्ठा आंदोलन’ के तहत देशव्यापी यात्रा पर हैं। लेकिन इस धार्मिक यात्रा के दौरान जब वे इटावा पहुँचे, तो उनका अंदाज पूरी तरह राजनीतिक नजर आया। उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की, बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

हद तो तब हो गई जब उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला।

इस बयान के बाद देश के सनातनी समाज में भारी आक्रोश और असमंजस है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल राजनीतिक गठजोड़ या सपा के तुष्टिकरण के एजेंडे को हवा देने के लिए इतिहास के काले पन्नों को जानबूझकर पलटा जा रहा है? आखिर गौ-रक्षा और सनातन रक्षा की यात्रा में ‘सच्चे हितैषी’ चुनने का स्वामी जी का पैमाना क्या है?

1990 के काले दौर में सनातनियों के खून से लाल हुआ था सरयू का जल

इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर जिस बेरहमी से पुलिस ने गोलियां चलाई थीं, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।

ऐतिहासिक कड़वा सच: मुलायम सरकार के आदेश पर हुई उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्त बलिदान हुए और सरयू नदी का जल लाल हो गया था। बाद में मुलायम सरकार ने रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर से मुकदमे भी वापस ले लिए थे। इसी घटना के बाद उन्हें एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने की राजनीति के कारण ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक मिल गई थी।

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उसी दौर के मुखिया को ‘संत सेवक’ बताकर किसका हित साध रहे हैं? क्या यह उन बलिदानी कारसेवकों के बलिदान का अपमान नहीं है?

गुरु के अपमान और खुद पर हुए लाठीचार्ज को भूल गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस गुरु परंपरा की दुहाई देते हैं, उसी इतिहास का एक पन्ना उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से भी जुड़ा है। मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में ही स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को आजमगढ़ से गिरफ्तार किया गया था, जिसे पूरे देश ने शंकराचार्य पद और सनातन परंपरा का घोर अपमान माना था।

इतना ही नहीं, खुद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अपना अतीत भी सपा के शासनकाल में जख्मी हुआ था-

साल 2015 का वाराणसी कांड: अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल के दौरान वाराणसी के गोदौलिया क्षेत्र में गणेश विसर्जन को लेकर संतों का एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा था। तत्कालीन सपा सरकार की पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके छोटे-छोटे बटुकों (शिष्यों) पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाई थीं। इस लाठीचार्ज में स्वामी जी खुद गंभीर रूप से घायल हुए थे और उन्हें जेल में डाल दिया गया था।

आज सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिनके शासनकाल में खुद स्वामी जी पर और उनके मासूम शिष्यों पर लाठियाँ चलीं, आज सत्ता से बाहर होते ही वही अखिलेश यादव और उनका परिवार स्वामी जी के लिए ‘बड़े दिल वाला’ कैसे हो गया? क्या सपा स्वामी जी के रसूख का इस्तेमाल अपनी मुस्लिम-यादव (MY) और जातीय राजनीति की छवि को सुधारने के लिए नहीं कर रही है?

गो-तस्करी का इतिहास Vs योगी सरकार के सख्त कदम

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस समय गो-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। लेकिन वे उत्तर प्रदेश में गोवंश के इतिहास को लेकर दोहरा रवैया अपनाते दिख रहे हैं।

सपा शासन में गो-तस्करी का ‘खेल’: मुलायम और अखिलेश यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में 1955 का गोवध निषेध अधिनियम सिर्फ कागजों तक सीमित था। चंदौली जिले का सैयदराजा थाना और नौबतपुर चेकपोस्ट पूरे देश में गो-तस्करों के सबसे बड़े गढ़ के रूप में कुख्यात थे।

हालात ये थे कि इन थानों और चेकपोस्टों पर पोस्टिंग पाने के लिए पुलिस अधिकारियों के बीच बोलियाँ लगा करती थीं। यहाँ से होने वाली अवैध गो-तस्करी का पैसा कथित तौर पर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता था। यूपी से गोवंश को बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल और वहां से बांग्लादेश के कत्लखानों में कटने के लिए भेज दिया जाता था।

योगी सरकार का ‘गोरक्षा मॉडल’: सपा शासनकाल के विपरीत साल 2017 में योगी आदित्यनाथ के आते ही सूबे की तस्वीर बदल गई। योगी सरकार ने जो कदम उठाए, वे आज देश के लिए नजीर हैं:

अवैध बूचड़खाने बंद: सत्ता संभालते ही सभी अवैध कत्लखानों पर ताला लगाया गया।
देश का सबसे सख्त कानून (2020): यूपी गोवध निवारण अधिनियम में संशोधन कर 3 से 10 साल की कठोर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया।
कड़ी कार्रवाई: गो-तस्करों पर एनएसए (रासुका) लगाया गया और कई बड़े तस्करों के एनकाउंटर किए गए।
गो-संरक्षण केंद्र: आज उत्तर प्रदेश में 7,000 से अधिक गो-संरक्षण केंद्र चालू हैं, जिनमें 13 लाख से अधिक गोवंश का सरकारी खर्चे पर पालन-पोषण हो रहा है।

सवाल यह है कि जो सरकार गो-माता की रक्षा के लिए इतने ठोस कदम उठा रही है, स्वामी जी उसकी सराहना करने से कतराते हैं। वहीं दूसरी तरफ गो-तस्करी के मूकदर्शक रहे परिवार को वे ‘गोभक्त’ का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं।

लव जिहाद और धर्मांतरण पर चुप्पी का संरक्षण?

यादव परिवार के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों, अवध क्षेत्र और नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ के मामले सामने आए थे। विदेशी फंडिंग के दम पर मिशनरी और कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय थीं, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने अपने कोर वोट बैंक के खिसकने के डर से इन गतिविधियों पर हमेशा चुप्पी साधे रखी।

यही नहीं, वो गौरक्षा की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रोपेगेंडा को भी बढ़ाते दिख रहे हैं। साफ दिख रहा है कि वो खुद को सनातनी से ज्यादा अब सेकुलर दिखाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

सनातन के शीर्ष पदों पर बैठे संतों का काम इन मुद्दों पर समाज को सचेत करना होता है। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सपा के सुर में सुर मिलाकर देश में जातियों की बात करना और इस्लामिस्टों के प्रति नरम रुख दिखाना यह दर्शाता है कि वे अनजाने में ही सही, लेकिन सपा के ‘डिवाइड एंड रूल’ (बाँटो और राज करो) के एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

करोड़ों सनातनियों के साथ विश्वासघात या राजनीतिक भूल?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्वयं को सनातन परंपरा का ध्वजवाहक बताते हैं। ऐसे में उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे राजनीतिक स्वार्थ और एजेंडे से ऊपर उठकर केवल और केवल सनातन हितों की बात करें।

इतिहास की कड़वी सच्चाइयों से आँखें मूँदकर रामभक्तों पर गोली चलवाने वालों, संतों का दमन करने वालों और गो-तस्करी को बढ़ावा देने वाली ताकतों को ‘संत सेवक’ बताना देश के करोड़ों सनातनियों की भावनाओं पर नमक छिड़कने जैसा है।

सनातन समाज आज स्वामी जी से यह सवाल पूछ रहा है कि क्या एक संत की गरिमा किसी राजनीतिक दल की ‘कठपुतली’ या उसका ‘चुनावी ढाल’ बनने में है? स्वामी जी को जल्द ही यह समझना होगा कि राजनीतिक चश्मे से सनातन की रक्षा नहीं हो सकती और इतिहास को झुठलाने का प्रयास अंततः संत परंपरा के साथ एक बड़ा विश्वासघात ही साबित होगा।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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