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बीफ का शौकीन और ध्रुव राठी का ‘फैन’: जानें- कौन है जैनों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने चला प्रसाद वेदपाठक, पहलगाम के ‘इस्लामी जिहाद’ पर कर रहा था लीपापोती

सफेद रास्ते को लेकर हुआ विवाद जैन परंपराओं से वेदपाठक का पहला टकराव नहीं था। अप्रैल 2025 में उन्होंने मशहूर रणकपुर जैन मंदिर जाने के बाद भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई थी। वेदपाठक ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि मंदिर में प्रवेश से पहले लोगों को बेल्ट, वॉलेट जैसी चमड़े (लेदर) की चीजें बाहर रखनी पड़ती हैं।

आज के समय में सोशल मीडिया पर समझदारी से ज्यादा गुस्सा और विवाद तेजी से फैलते हैं। ऐसे माहौल में कई बार सिर्फ ध्यान खींचने के लिए लोग बिना वजह विवाद खड़ा कर देते हैं। इसी महीने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रसाद वेदपाठक ने भी कुछ ऐसा ही किया, जब उन्होंने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में जैन मुनियों की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्ते को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की।

सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ी इस व्यवस्था को प्रसाद वेदपाठक ने सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। उन्होंने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ और विवादित शब्द कहकर पेश किया जिसके बाद जैन समुदाय ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों ने भी इस पर आपत्ति जताई और विरोध किया।

फोटो साभार: X

यह विवाद एक बार फिर एक अहम सवाल खड़ा करता है कि आखिर प्रसाद वेदपाठक कौन हैं और वे ऐसी परंपरा को लेकर जैन समुदाय पर निशाना क्यों साध रहे हैं, जिसकी जड़ें करुणा और मानवता में निहित हैं?

कैसे एक सफेद रास्ते को बना दिया गया ‘जैन जिहाद’

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब प्रसाद वेदपाठक ने मुंबई के घाटकोपर इलाके की एक हाउसिंग सोसाइटी के वीडियो पोस्ट किए। इन वीडियो में उन्होंने जैन मुनियों के आने-जाने की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्तों पर आपत्ति जताई।

गौरतलब है कि जैन मुनि अक्सर नंगे पैर चलते हैं और अहिंसा व सादगी के बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं। गर्मियों के दौरान कई जगह रास्तों पर अस्थायी रूप से सफेद कोटिंग की जाती है ताकि जमीन कम गर्म रहे और मुनियों को चलने में आसानी हो।

वहीं, बारिश के मौसम में सीमेंट के रास्तों पर अक्सर काई जम जाती है। जैन दर्शन के अनुसार, काई सिर्फ एक परत नहीं बल्कि जीवित तत्व मानी जाती है, जिसमें अनगिनत सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं। चूँकि जैन मुनि हर जीव के प्रति अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हैं इसलिए वे काई पर चलने से बचते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुँच सकता है।

इसी वजह से कई बार रास्तों के कुछ हिस्सों पर सफेद पेंट या सफेदी की जाती है। इससे एक तरफ गर्मियों में जमीन ठंडी रहती है, वहीं बारिश में काई जमने की संभावना भी कम हो जाती है। इसका उद्देश्य किसी तरह का अलगाव, कब्जा या क्षेत्र पर दावा करना नहीं होता जैसा कि वेदपाठक और कुछ अन्य लोगों ने दिखाने की कोशिश की। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि जैन मुनि सुरक्षित तरीके से चल सकें और गोचरी (भोजन के लिए घर-घर जाना) जैसी अपनी धार्मिक परंपरा निभाते हुए अनजाने में किसी जीव को नुकसान न पहुँचे।

यानी जिसे प्रसाद वेदपाठक ने धार्मिक दबदबे या ‘जैन जिहाद’ की तरह दिखाने की कोशिश की वह असल में जैन धर्म के सबसे मूल सिद्धांतों में से एक ‘हर छोटे से छोटे जीव के प्रति करुणा’ का हिस्सा है।

इस परंपरा को पहले समझने की कोशिश करने के बजाय वेदपाठक ने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम दे दिया। सोशल मीडिया पर कई लोगों जिनमें जैन समुदाय के सदस्य भी शामिल थे ने इसके पीछे की परंपरा और वजह समझाने की कोशिश की। एक सोशल मीडिया यूजर ने सोसाइटी में सफेद रास्ता बनाए जाने की जैन परंपरा को विस्तार से समझाया जिसका वीडियो नीचे देखा जा सकता है।

हालाँकि, लोगों द्वारा वजह समझाने के बाद भी प्रसाद वेदपाठक अपने दावे पर अड़े रहे। उन्होंने इस पूरे मामले को ‘इलाके पर कब्जा दिखाने’, ‘धार्मिक राजनीति’ और जैन समुदाय द्वारा कथित दबदबा बनाने से जोड़कर पेश करना जारी रखा।

बाद में उन्होंने उस सफेद रास्ते को दोबारा पेंट भी करवा दिया। लेकिन तब तक ऐसा लग रहा था कि उनका मकसद पूरा हो चुका था कि खुद को इस लड़ाई का विजेता दिखाना, खुद को पीड़ित पक्ष बताना और विवाद को लगातार जिंदा रखकर चर्चा और ध्यान बटोरना।

विवाद भड़काने के बाद खुद को पीड़ित बताने की कोशिश

जब उनके बयान को लेकर आलोचना बढ़ने लगी, तब प्रसाद वेदपाठक का रुख अचानक बदलता दिखा। एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा से जैन धर्म की करुणा, विनम्रता और अहिंसा की भावना की प्रशंसा करते रहे हैं। उन्होंने जैन समुदाय से अपील भी की कि वे उन सोसाइटी निवासियों के प्रति सहानुभूति दिखाएँ जिन्हें कथित तौर पर इस सफेद रास्ते से परेशानी हुई।

हालाँकि, उनके इस बयान में सबसे अहम सवाल का जवाब नहीं था कि आखिर उन्होंने शुरुआत में जैन समुदाय को ‘दबदबा बनाने वाला’ क्यों बताया और एक सामान्य धार्मिक परंपरा को ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम क्यों दिया?

दिलचस्प बात यह रही कि जैन धर्म के प्रति सम्मान जताने का दावा करने के बावजूद वे बार-बार यह संकेत देते रहे कि यह सफेद रास्ता किसी तरह की धार्मिक ताकत दिखाने का तरीका है और जैन समुदाय दूसरों पर अपनी बात थोप रहा है।

यही बात लोगों को खटकती रही और उनके रुख में विरोधाभास साफ नजर आया। अगर मामला सिर्फ सोसाइटी की सहमति या स्थानीय व्यवस्था का था, तो फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया गया जो साफ तौर पर सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भड़काने वाली मानी जा सकती है?

जैनों के खिलाफ हिंदुओं को खड़ा करने की कोशिश?

इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू शायद यह था कि प्रसाद वेदपाठक ने मामले को ‘महाराष्ट्र के लोग बनाम जैन’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। वीडियो, कैप्शन और लगातार सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उन्होंने यह माहौल बनाने का प्रयास किया कि जैन समुदाय कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव रखने वाला और दबदबा बनाने वाला समूह है।

उनकी यह बात सोशल मीडिया पर पहले से कट्टर सोच रखने वाले कुछ लोगों के बीच तेजी से फैली और उन्होंने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इसी दौरान ‘विवादित एक्टिविस्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। 2002 के गुजरात दंगों और फर्जी दस्तावेज, गवाहों को प्रभावित करने जैसे आरोपों से जुड़े मामले में 2022 में गुजरात ATS द्वारा गिरफ्तार की जा चुकी तीस्ता सीतलवाड़ ने सफेद रास्ते के विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जैन ‘नए दबदबा बनाने वाले’ बनते जा रहे हैं और मुंबईकरों के खिलाफ काम कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि भारत की कुल आबादी में जैन समुदाय की हिस्सेदारी करीब 0.4 प्रतिशत ही है। इसके बावजूद, वही समूह जो अक्सर इस्लामी कट्टरता या मुस्लिम वर्चस्ववाद को लेकर उठने वाली चिंताओं को ‘बहुसंख्यक मानसिकता’ कहकर खारिज कर देता है, उसने अचानक इस छोटे से समुदाय को सामाजिक सौहार्द के लिए खतरे की तरह पेश करना शुरू कर दिया।

जब जमीन कब्जाने, जबरन धर्मांतरण की कोशिशों या धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाने जैसे मामलों पर सवाल उठते हैं, तब ऐसे कई एक्टिविस्ट मुसलमानों को बहुसंख्यक पूर्वाग्रह का शिकार बताने लगते हैं। लेकिन जैन समुदाय के मामले में तस्वीर उलटी दिखाई गई और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को उसकी सदियों पुरानी, अहिंसा, करुणा और हर जीव के सम्मान पर आधारित परंपरा का पालन करने के लिए निशाना बनाया गया।

कुल मिलाकर, सफेद रास्ते को लेकर प्रसाद वेदपाठक द्वारा शुरू किए गए विवाद से लेकर जैन समुदाय को ‘दमनकारी’ की तरह दिखाने की कोशिश तक, पूरे घटनाक्रम में एक सुनियोजित अभियान जैसी झलक दिखी जिसका मकसद जैन समुदाय और हिंदू समाज के बीच दूरी पैदा करना प्रतीत हुआ।

वेदपाठक ने पहलगाम आतंकी हमले को ‘इस्लामिक जिहाद’ कहने से किया परहेज

प्रसाद वेदपाठक का सेलेक्टिव आक्रोश उस समय और साफ नजर आता है, जब उसकी तुलना अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले पर उनकी प्रतिक्रिया से की जाती है। इस हमले में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों की धार्मिक पहचान पूछकर उन्हें निशाना बनाया था और उनकी हत्या कर दी थी।

हालाँकि, इस घटना के पीछे मौजूद इस्लामी जिहादी सोच पर खुलकर सवाल उठाने के बजाय, वेदपाठक ने लोगों को ‘एकता’ का संदेश देना ज्यादा जरूरी समझा। उन्होंने लोगों को पीड़ितों की हिंदू पहचान पर चर्चा न करने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने वाले लोग अनजाने में आतंकियों के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे हैं।

उन्होंने लोगों से सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की बात कही और इस हमले को मुख्य रूप से प्रशासनिक या सुरक्षा व्यवस्था की विफलता के रूप में पेश किया, न कि धार्मिक नफरत से प्रेरित हिंसा के तौर पर।

जब आतंकियों ने लोगों को हिंदू होने की वजह से चुनकर निशाना बनाया, तब वेदपाठक सांप्रदायिक चर्चा से बचने, एकता बनाए रखने और प्रशासनिक जवाबदेही की बात करते दिखे। लेकिन जब मामला जैन धर्म की एक पुरानी और अहिंसा पर आधारित धार्मिक परंपरा का आया, तब उन्होंने बिना हिचक इसे ‘जैन जिहाद’ कह दिया और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को सामाजिक समस्या की तरह पेश करने लगे।

पहली बार नहीं जब वेदपाठक ने जैन परंपराओं को निशाना बनाया

दिलचस्प बात यह है कि सफेद रास्ते को लेकर हुआ विवाद जैन परंपराओं से वेदपाठक का पहला टकराव नहीं था। अप्रैल 2025 में उन्होंने मशहूर रणकपुर जैन मंदिर जाने के बाद भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई थी। वेदपाठक ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि मंदिर में प्रवेश से पहले लोगों को बेल्ट, वॉलेट जैसी चमड़े (लेदर) की चीजें बाहर रखनी पड़ती हैं।

इसके अलावा, उन्होंने मंदिर में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियम पर भी सवाल उठाए थे। हालाँकि, ये दोनों बातें जैन धार्मिक परंपराओं में कोई नई या असामान्य चीज नहीं मानी जातीं।

जैन धर्म में चमड़े से बनी चीजों पर रोक का सीधा संबंध उसके सबसे मूल सिद्धांत अहिंसा से है। इसी तरह, जैन धर्मग्रंथों जिन्हें जैन आगम कहा जाता है, में यह उल्लेख मिलता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश से बचना चाहिए। यह नियम सिर्फ रणकपुर मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया भर के कई जैन मंदिरों में लंबे समय से धार्मिक परंपरा के रूप में माना जाता रहा है।

वेदपाठक: मूर्ति पूजा का विरोधी, बीफ खाने की बात और ध्रुव राठी का फैन

प्रसाद वेदपाठक खुद को अक्सर हिंदू हितों की आवाज उठाने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं। लेकिन उनका पुराना सोशल मीडिया रिकॉर्ड एक अलग तस्वीर दिखाता है।

एक वायरल पोस्ट में वेदपाठक ने उन्हें गिफ्ट में मिली भगवान गणेश की एक कलाकृति को लेकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने एक यूजर पर निशाना साधते हुए लिखा था, “तुम्हें पता था कि मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता, फिर भी तुमने मुझे गणपति की म्यूरल गिफ्ट की।”

वेदपाठक के सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहाँ उन्होंने खुले तौर पर बीफ खाने की बात की है। हिंदू समाज के बड़े हिस्से में बीफ खाना धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से वर्जित माना जाता है। एक पोस्ट में उन्होंने अपने फॉलोअर्स से ‘Beef and Bacon Burger’ को लेकर सुझाव भी माँगे थे।

वेदपाठक की वैचारिक पसंद भी किसी से छिपी नहीं रही है। अप्रैल 2024 में उन्होंने जर्मनी में रहने वाले यूट्यूब ध्रुव राठी का एक पुराना इंटरव्यू शेयर किया था और उन्हें भारतीय मीडिया का भविष्य बताया था।

यह इसलिए भी चर्चा का विषय बना क्योंकि ध्रुव राठी और उनके समर्थक समूह पर अक्सर हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर विवादित नैरेटिव बनाने के आरोप लगते रहे हैं जबकि वे खुद को निष्पक्ष टिप्पणीकार के रूप में पेश करते हैं।

जैन समुदाय के सफेद रास्ते वाले विवाद में भी वेदपाठक का तरीका कुछ इसी पैटर्न जैसा दिखाई दिया कि पहले किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना, फिर उसे सबसे भड़काऊ तरीके से पेश करना, विवाद और प्रतिक्रियाएँ बटोरना और बाद में आलोचना बढ़ने पर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करना।

गुस्से और विवाद को बना लिया ‘बिजनेस मॉडल’?

अगर सफेद रास्ते वाले विवाद को अलग-थलग देखा जाए तो यह एक छोटा सा मामला लग सकता है। लेकिन जब इसे प्रसाद वेदपाठक के पुराने व्यवहार और बयानों के साथ जोड़कर देखा जाता है तो एक पैटर्न साफ नजर आने लगता है।

एक सामान्य जैन परंपरा को ‘जैन जिहाद’ बता दिया जाता है। मंदिरों की धार्मिक परंपराओं को भेदभाव का उदाहरण कहा जाता है। भगवान गणेश की तस्वीर वाला एक गिफ्ट नाराजगी की वजह बन जाता है।

ऐसा लगता है कि धार्मिक भावनाओं का मुद्दा भी चुनिंदा तरीके से उठाया जाता है क्योंकि यहाँ ज्यादा विवाद, बहस और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है। यहाँ मुख्य बात कोई सिद्धांत या विचारधारा नहीं बल्कि ध्यान खींचना दिखाई देता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में गुस्सा, विवाद और आक्रोश भी एक तरह का ‘कंटेंट’ बन चुका है जिससे लोकप्रियता और कमाई दोनों हासिल की जा सकती हैं। कई इन्फ्लुएंसर्स के लिए ऐसे मुद्दों को विवाद में बदलना फायदे का सौदा बन जाता है। जितना बड़ा विवाद, उतनी ज्यादा चर्चा और उतना ज्यादा एंगेजमेंट। जैन समाज के सफेद रास्ते वाला मामला भी कुछ ऐसा ही नजर आता है।

जैन परंपरा को समझने की कोशिश करने के बजाय, वेदपाठक ने उसे विवाद का मुद्दा बनाया। सदियों पुरानी अहिंसा और करुणा पर आधारित धार्मिक व्यवस्था को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। जब इस पर विरोध शुरू हुआ, तो खुद को पीड़ित पक्ष की तरह पेश करने का प्रयास भी देखने को मिला।

हो सकता है कि सोसाइटी का वह सफेद रास्ता अब हट गया हो लेकिन पूरे जैन समुदाय को शक और नाराजगी के नजरिए से देखने का माहौल बनाने की कोशिश ने प्रसाद वेदपाठक के बारे में कहीं ज्यादा बातें उजागर कर दीं बजाय जैन समुदाय के।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Jinit Jain is a journalist and commentator covering politics, national security, law, and socio-cultural issues, with a focus on in-depth reporting and fact-based analysis. His work examines public policy, governance, and current affairs, bringing complex developments into clear and accessible context for readers.

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