वुहान की लैब, अमेरिका का पैसा और डॉक्टर फाउची: ट्रंप की खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड का खुलासा बदलेगा कोरोना वायरस की पूरी कहानी?

अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (DNI) के पद से विदाई के दिन शुक्रवार (19 जून 2026) को तुलसी गबार्ड ने कोविड-19 महामारी से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेज और कम्युनिकेशन सार्वजनिक किए हैं।

गबार्ड ने कहा कि इन दस्तावेजों से अमेरिका के पूर्व शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी डॉ एंथनी फाउची और कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बीच संबंध सामने आते हैं।

गबार्ड के मुताबिक, डॉ फाउची ने चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में चमगादड़ों से जुड़े कोरोना वायरस पर विवादित ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च के लिए अमेरिकी करदाताओं के लाखों डॉलर उपलब्ध कराए और बाद में इस मामले की सच्चाई को छिपाने की कोशिश की।

एक्स पर साझा किए गए एक वीडियो संदेश में गबार्ड ने कहा कि फाउची ने वुहान लैब को फंड देने के बाद शपथ के तहत गलत बयान दिए। उन्होंने यह भी कहा कि फाउची ने कुछ ‘राजनीतिक रूप से प्रभावित तत्वों’ के साथ मिलकर अपने फैसलों और वायरस की उत्पत्ति से जुड़े तथ्यों को दबाने का प्रयास किया।

उस समय डॉ फाउची अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज (NIAID) का नेतृत्व कर रहे थे और बाद में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार भी बने।

गबार्ड ने कहा कि अपने कार्यकाल के अंतिम दिन वह ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक कर रही हैं जो पहले सामने नहीं आए थे और जिनसे यह दावा मजबूत होता है कि फाउची ने जोखिम भरी रिसर्च को फंड किया, खुफिया तंत्र के कुछ लोगों के साथ मिलकर जानकारी को सीमित किया और 2024 में कॉन्ग्रेस के सामने गलत बयान दिए।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने अमेरिका और दुनिया भर के करोड़ों लोगों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। गबार्ड के अनुसार, वर्षों तक चले विवाद, सेंसरशिप और आरोपों के बाद लोगों को पारदर्शिता और जवाबदेही मिलनी चाहिए।

गबार्ड ने आगे आरोप लगाया कि सच को छिपाने के लिए सत्ता और संस्थागत प्रभाव का इस्तेमाल किया गया, खुफिया जानकारी को प्रभावित किया गया और महत्वपूर्ण तथ्यों को सार्वजनिक होने से रोका गया।

गबार्ड का दावा, महामारी को लेकर दुनिया को गुमराह करने के लिए तीन स्तर पर काम हुआ

गबार्ड के अनुसार, फाउची ने महामारी को लेकर तीन चरणों में काम किया। पहला, कथित तौर पर जोखिम वाली रिसर्च को फंड करना। दूसरा कुछ विशेषज्ञों के जरिए कोविड की उत्पत्ति को प्राकृतिक बताने वाली धारणा को बढ़ावा देना ताकि वुहान रिसर्च से जुड़े सवालों को कमजोर किया जा सके।

तीसरा सार्वजनिक मंचों पर खुद को महामारी विशेषज्ञ के रूप में पेश करते हुए कथित तौर पर गलत जानकारी और सेंसरशिप को बढ़ावा देना।

ऑपइंडिया ने पहले भी उठाए थे ऐसे सवाल

तुलसी गबार्ड द्वारा किए गए हालिया खुलासों को लेकर कहा जा रहा है कि वे उन रिपोर्टों का समर्थन करते हैं जो पहले ऑपइंडिया  ने प्रकाशित की थीं। इन रिपोर्टों में दावा किया गया था कि कोविड-19 वायरस की उत्पत्ति और उसमें डॉ एंथनी फाउची की भूमिका को लेकर कई गंभीर सवाल उठे थे।

ऑपइंडिया  की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की प्रमुख सैन्य शोध संस्था DARPA (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च एंड प्रोजेक्ट्स एजेंसी) ने इकोहेल्थ एलायंस के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसमें चीन के वुहान में चमगादड़ों से फैलने वाले कोरोनावायरस पर शोध करने की बात थी।

DARPA ने इसे बहुत खतरनाक बताया था। लेकिन बाद में यह प्रोजेक्ट NIAID (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज) द्वारा मंजूर किया गया, जिसका नेतृत्व उस समय डॉ एंथनी फाउची कर रहे थे।

रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि लैब-लीक थ्योरी और गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च से जुड़े कई दावों को उस समय फर्जी खबर बताकर खारिज कर दिया गया था और इसमें फाउची के प्रभाव का भी जिक्र किया गया।

इसके अलावा डॉ पीटर दासजक पर भी आरोप लगे कि उन्होंने वुहान में कोविड-19 के स्रोत की जाँच करने वाली WHO टीम को प्रभावित करने की कोशिश की। कहा गया कि उन्होंने एक पत्र द लैंसेट में प्रकाशित कर कई वैज्ञानिकों की लैब-लीक संबंधी आशंकाओं को गलत साबित करने की कोशिश की और खुद जांच टीम का हिस्सा बनने का प्रयास किया।

यह भी दावा किया गया कि गूगल ने ऑपइंडिया  के उन कई लेखों को डिमॉनेटाइज कर दिया था, जिनमें लैब-लीक थ्योरी या वुहान में अमेरिकी फंडिंग से जुड़े गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च पर चर्चा की गई थी।

अंत में यह भी उल्लेख किया गया है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल के आखिरी दिनों में डॉ एंथनी फाउची को एक विवादित माफी दी गई थी, जो ऑटो-पेन से साइन की गई थी और इसमें पिछले 10 वर्षों के किसी भी संभावित अपराध से उन्हें छूट दी गई थी।