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RSS का रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं और कैसे चलती है उसकी फंडिंग? विवाद के बीच समझिए पूरी व्यवस्था

RSS एक सदी से खुले तौर पर काम कर रहा है। उस पर 3 बार प्रतिबंध लगाए गए, उसकी गतिविधियों की जाँच हुई, उसके खिलाफ कानूनी चुनौतियाँ आईं लेकिन हर बार वह न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होकर सामने आया।

ये वो सुझाव थे जो RSS के शुरुआती दिनों में संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को संघ के काम के लिए पैसा जुटाने के लिए दिए जा रहे थे। उस समय तक हेडगेवार अक्सर अपनी जेब से पैसा खर्च करते या अपने मित्रों से सहयोग जुटा लेते। लेकिन जल्द ही उन्हें संघ की स्थायी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई और एक बैठक बुलाई गई। उसी बैठक में ये सुझाव दिए जा रहे थे।

तब एक विचार आया कि यदि संघ स्वयंसेवकों का संगठन है, तो उसकी जरूरतों की पूर्ति भी स्वयंसेवक खुद ही करें। पर सवाल था कि योगदान किसे दिया जाए और कितना दिया जाए? काफी विचार के बाद निर्णय हुआ कि हर स्वयंसेवक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार योगदान देगा और वह योगदान किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि संघ के आदर्श प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ को समर्पित किया जाएगा।

केआर मलकानी अपनी किताब ‘The RSS Story’ में लिखते हैं कि इसी सोच से संघ में ‘गुरु दक्षिणा’ की परंपरा की शुरुआत हुई। 1928 में पहला गुरु दक्षिणा कार्यक्रम आयोजित हुआ। उस दिन कुल 84 रुपए इकट्ठा हुए। राशि भले ही छोटी थी लेकिन इसी ने उस परंपरा की नींव रखी जो आज भी संघ की आर्थिक व्यवस्था का आधार है।

केआर मलकानी की किताब

आज के संदर्भ में RSS की गुरु दक्षिणा की चर्चा इसलिए क्योंकि बीते कुछ दिनों से संघ के पंजीकरण और इसकी फंडिंग को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इस हालिया विवाद की शुरुआत कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे के एक पत्र के बाद हुई।

प्रियांक खरगे ने RSS के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग पर पूछे सवाल

प्रियांक ने 13 जून 2026 को संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के नाम एक पत्र लिखा। यह पत्र 15 जून 2026 को अपने X हैंडल पर भी शेयर किया। उन्होंने ‘X’ पर लिखा, “सबसे पहले RSS को 100 साल पूरे होने पर बधाई। एक ऐसा संगठन जो 60,000 से ज्यादा शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करता है, उसे पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही का भी पालन करना चाहिए।”

प्रियांक ने लिखा, “RSS को अपनी कानूनी स्थिति, रजिस्ट्रेशन, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए जरूरी मंजूरियों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए। अगर नागरिकों, मजदूरों, NGO, ट्रस्ट, मंदिरों और कंपनियों से रजिस्ट्रेशन कराने, जानकारी देने और कानून का पालन करने की उम्मीद की जाती है, तो RSS को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए?”

पत्र में प्रियांक ने मोहन भागवत से 8 सवाल पूछे हैं। पत्र में RSS की कानूनी स्थिति और संगठनात्मक ढाँचे, उसके पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों के विवरण, दान, चंदे और अन्य आय के स्रोतों, खर्च और संपत्तियों के ब्योरे के अलावा यह जानकारी माँगी गई है कि वह कानून के अनुसार लागू करों का भुगतान करता है या नहीं।

क्यों नहीं पंजीकृत है RSS?

यह पहली बार नहीं है जब संघ के पंजीकरण को लेकर सवाल पूछा गया हो, RSS के बारे में अक्सर एक प्रश्न पूछा जाता है कि देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में शामिल होने के बावजूद इसका पंजीकरण क्यों नहीं है। इस सवाल का जवाब आज में नहीं बल्कि लगभग 100 वर्ष पुराने इतिहास में छिपा है। संघ की शुरुआत किसी कंपनी, ट्रस्ट, सोसायटी या औपचारिक संस्था की तरह नहीं हुई थी। वह मूल रूप से एक सामाजिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य समाज का संगठन और चरित्र निर्माण था।

27 सितंबर 1925 को नागपुर के महल क्षेत्र के ‘सुक्रवारी’ स्थित अपने घर में दशहरे के दिन हेडगेवार ने कुछ युवाओं और वरिष्ठ साथियों की बैठक बुलाई। इसी बैठक में उन्होंने घोषणा की ‘हम आज संघ का उद्घाटन कर रहे हैं’। इसके साथ ही उस संगठन की शुरुआत हुई जिसे आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जाना गया।

नागपुर में हेडगेवार की याद में बना भव्य स्मृति मंदिर

दिलचस्प बात यह है कि उस समय न तो कोई संविधान था, न सदस्यता फॉर्म, न पंजीकरण और न ही संगठन का कोई तय नाम। डॉ. हेडगेवार ने उस दिन उपस्थित लोगों से कहा था कि सभी को शारीरिक, बौद्धिक और हर प्रकार से स्वयं को प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे अपने लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम बन सकें। शुरुआती दिनों में रविवार को ड्रिल, मार्च और अन्य शारीरिक गतिविधियाँ होती थीं जबकि गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय विषयों पर बौद्धिक चर्चा आयोजित की जाती थी।

संघ की शुरुआत इतनी स्वाभाविक और ऑर्गेनिक थी कि कई महीनों तक उसका कोई नाम तक नहीं था। संगठन पहले अस्तित्व में आया, नाम बाद में रखा गया। लगभग सात महीने बाद 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर एक बैठक हुई, जिसमें संगठन के नाम पर चर्चा की गई। उस बैठक में चार नाम प्रस्तावित किए गए थे- जरीपटका मंडल, भारत उद्धारक मंडल, हिंदू स्वयंसेवक संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। अंततः ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को स्वीकार किया गया।

यही तथ्य संघ की प्रकृति को समझने की कुंजी है। RSS की परिकल्पना एक पारंपरिक संस्था के रूप में नहीं की गई थी। वह लोगों के चरित्र निर्माण, अनुशासन, संगठन और समाज सेवा के लिए चलाया जाने वाला एक स्वयंसेवी आंदोलन था। सदस्यता फॉर्म भरकर कोई औपचारिक सदस्य नहीं बनता था, न ही नियमित शुल्क देकर सदस्यता ली जाती थी। स्वयंसेवक शाखा में आते थे, प्रशिक्षण लेते थे और सामाजिक कार्यों में भागीदारी करते थे। इसीलिए संघ की संरचना आरंभ से ही एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की रही, न कि किसी पंजीकृत संस्था की।

सीधे-सीधे कहें तो RSS का जन्म किसी कानूनी इकाई (Legal Entity) के रूप में नहीं हुआ था बल्कि समाज के भीतर एक विचार और संगठनात्मक प्रक्रिया के रूप में हुआ था। बाद के दशकों में संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के लिए अनेक स्वतंत्र संस्थाएँ, ट्रस्ट और संगठन विकसित किए जिनमें से कई अलग-अलग कानूनों के तहत पंजीकृत हैं। लेकिन मूल RSS स्वयं को एक स्वयंसेवी सामाजिक आंदोलन के रूप में देखता रहा।

हेडगेवार, अनुशीलन समिति और कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे थे और अंग्रेजों की नजर उन पर रहती थी। ऐसे में आजादी से पहले से ही हेडगेवार ने संघ को 1860 के सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत कराने से परहेज किया। ये अंग्रेजों की नजरों से बचकर एक सामाजिक संगठन खड़ा करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। इससे संघ को स्थानीय शाखाओं, स्कूलों और स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से स्वाभाविक रूप से फैलने का अवसर मिला।

जिस कर्नाटक से आज यह विवाद फिर उठा है, उसी की राजधानी बेंगलुरु में 8-9 नवंबर 2025 को आयोजित RSS के एक कार्यक्र में मोहन भागवत ने पंजीकरण से जुड़े सवाल का जवाब दिया था।

भागवत ने कहा था, “आप जानते हैं कि RSS की स्थापना 1925 में हुई थी। तो क्या आप उम्मीद करते हैं कि उस समय हम उस ब्रिटिश सरकार के पास जाकर अपना पंजीकरण कराते, जिसके खिलाफ RSS संघर्ष कर रहा था? फिर स्वतंत्रता के बाद भी भारत के कानूनों ने पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाया। हमारे देश के कानून अपंजीकृत व्यक्तियों के समूह (Body of Individuals) को भी कानूनी मान्यता देते हैं। इसी श्रेणी में हमें रखा गया है और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं।”

उन्होंने कहा, “आयकर विभाग ने एक समय हमसे आयकर देने को कहा था जिस पर कानूनी विवाद हुआ। उस मामले में अदालत ने माना कि RSS ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ है। इसके बाद हमारे ‘गुरु दक्षिणा’ जैसे कार्यक्रम को आयकर से छूट मिलने का आधार भी स्पष्ट हुआ।”

भागवत ने कहा, “हम पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया। यदि हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं होता तो सरकार किस पर प्रतिबंध लगाती? हर बार अदालतों और सरकारों ने मामले की समीक्षा की। प्रतिबंध हटाए गए और RSS को एक वैध संगठन के रूप में स्वीकार किया गया।”

जब आयकर विभाग और RSS का विवाद अदालत पहुँचा

RSS से जुड़े इस मामले में विवाद यह था कि संघ को उसके स्वयंसेवकों और अन्य लोगों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा पर आयकर लगाया जा सकता है या नहीं। आयकर विभाग का कहना था कि यह राशि संघ की आय है और इस पर टैक्स लगना चाहिए। दूसरी ओर RSS का तर्क था कि स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली गुरु दक्षिणा संगठन के सदस्यों का स्वैच्छिक योगदान है और इसे सामान्य आय नहीं माना जा सकता।

मामला आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) से होते हुए पटना हाई कोर्ट तक पहुँचा। अदालत के सामने यह भी रखा गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने 19 दिसंबर 1978 के एक पत्र में स्पष्ट किया था कि RSS को उसके सदस्यों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को ‘म्युचुअलिटी’ (पारस्परिकता) के सिद्धांत के आधार पर कर-मुक्त माना जाएगा।

पटना हाई कोर्ट ने फरवरी 1994 में RSS के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि संगठन के सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा वास्तव में म्युचुअलिटी के सिद्धांत के अंतर्गत आती है और उस पर आयकर नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने माना कि जब स्वयंसेवक ही संगठन को योगदान देते हैं और संगठन उन्हीं के लिए कार्य करता है, तो ऐसी राशि को सामान्य व्यापारिक या व्यावसायिक आय नहीं माना जा सकता।

हालाँकि अदालत ने अपने फैसले को केवल सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा तक सीमित रखा और प्रश्न में से ‘भक्तों’ (devotees) शब्द हटाकर स्पष्ट किया कि उसका निर्णय केवल RSS के सदस्यों द्वारा दिए गए योगदान के संबंध में है। इस प्रकार अदालत ने आयकर विभाग की आपत्ति खारिज करते हुए RSS को राहत दी।

क्या होता है ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’?

‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ (BOI) क्या है, इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि भारतीय कानून में हर संगठित समूह का कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना जरूरी नहीं है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(31) में ‘Person’ (व्यक्ति) की परिभाषा के भीतर न केवल व्यक्ति, कंपनी और फर्म को बल्कि ‘Association of Persons (AOP)’ और ‘Body of Individuals (BOI)’ को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि कानून कुछ परिस्थितियों में ऐसे समूहों को भी एक मान्यता प्राप्त इकाई के रूप में स्वीकार करता है, जो किसी साझा उद्देश्य से कार्य कर रहे हों, भले ही वे किसी अलग कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत न हों।’

BOI मूल रूप से ऐसे व्यक्तियों के समूह को कहा जाता है जो किसी साझा उद्देश्य, गतिविधि या कार्य के लिए संगठित रूप से कार्य कर रहे हों। यह जरूरी नहीं कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना ही हो। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या सामुदायिक गतिविधियों के लिए भी लोगों का समूह BOI की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट्स ने विभिन्न मामलों में कहा है कि BOI की पहचान उसके सदस्यों के साझा उद्देश्य और सामूहिक कार्य से होती है, न कि केवल उसके पंजीकरण से।

इस पूरी बहस को समझें तो एक बात साफ हो जाती है कि भारतीय कानून RSS को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। संविधान संगठन बनाने का अधिकार देता है, आयकर कानून BOI जैसी श्रेणियों को मान्यता देता है और लगभग एक सदी से सरकारी तथा न्यायिक संस्थाओं ने RSS के अस्तित्व को स्वीकार किया है। इस तरह का वितंडा खड़ा करने की कोशिश केवल बेजा भ्रम पैदा करने के लिए ही है।

RSS और उसकी फंडिंग

जैसे हमने इस लेख की शुरुआत में ही बताया था कि संघ ने स्वयंसेवकों से ही दक्षिणा लेकर अपने आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति का लक्ष्य रखा था। संघ में वर्ष में एक बार गुरु पूर्णिमा के दिन स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर दक्षिणा देते हैं।

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले ने अपनी किताब ‘The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism’ में गुरु दक्षिणा को लेकर लिखा है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा के अवसर पर स्वयंसेवक अपने ‘गुरु’ यानी भगवा ध्वज को दक्षिणा अर्पित करते हैं। संघ के अधिकांश फंड इसी दौरान एकत्र होते हैं। प्रत्येक स्वयंसेवक ध्वज के सामने जाकर प्रणाम करता है और ध्वज-दंड के आधार पर फूल अर्पित करता है। ध्वज के दोनों ओर हिंदू समाज के प्रेरणास्रोत महापुरुषों के चित्र लगाए जाते हैं।”

पुस्तक में लिखा है, “इसके बाद स्वयंसेवक अपनी दक्षिणा एक बंद और बिना नाम वाले लिफाफे में रखकर, फूलों के साथ एक थाली में अर्पित करता है और उसे भगवा ध्वज के समक्ष समर्पित करता है।”

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले की किताब

RSS के विचारक और राज्यसभा के सांसद रहे राकेश सिन्हा ने अपनी किताब ‘Builders of Modern India: Dr Keshav Baliram Hedgewar’ में संघ की वित्तीय आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बताया है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा संघ में 1928 से चली आ रही है। संघ का मानना है कि किसी भी संगठन के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे बाहरी प्रभावों पर निर्भर न हो, जो उसके कार्यकर्ताओं या नेतृत्व की सोच और निर्णयों को प्रभावित कर सकें। इसी कारण संघ ने अपनी आर्थिक व्यवस्था को स्वयंसेवकों के सहयोग पर आधारित रखा है, ताकि उसकी कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की स्वतंत्रता बनी रहे।”

राकेश सिन्हा की किताब

संघ के विचारक रतन शारदा का मानना है कि गुरु दक्षिणा से संघ को नैतिक शक्ति मिलती है। अपनी किताब ‘RSS 360°- Demystifying Rashtriya Swayamsevak Sangh’ में रतन शारदा लिखते हैं, “यह शायद ऐसा संगठन है जहाँ सदस्य किसी गतिविधि में भाग लेने, प्रशिक्षण शिविरों, शीतकालीन शिविरों या सामाजिक कार्यों में शामिल होने का खर्च स्वयं अपनी जेब से उठाते हैं। किसी भी कार्यक्रम या गतिविधि के लिए स्वयंसेवक अपना खर्च खुद वहन करते हैं।”

वह लिखते हैं, “यदि कोई स्वयंसेवक किसी शिविर की फीस देने में सक्षम नहीं होता, तो दूसरा स्वयंसेवक उसकी सहायता कर देता है। कई बार यह सहायता इतनी सहजता से की जाती है कि समूह के अन्य लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं होती।”

रतन शारदा ने लिखा, “गुरु दक्षिणा के बाद इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती कि किसने कितना धन दिया। संगठन में अमीर और गरीब स्वयंसेवक के बीच इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। न ही संगठन के पद किसी व्यक्ति की आर्थिक क्षमता या उसके द्वारा दी गई गुरु दक्षिणा के आधार पर दिए जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त धनराशि स्थानीय शाखा के पास जमा की जाती है और उसका उपयोग विभिन्न गतिविधियों में किया जाता है। यह राशि अन्य सामाजिक कार्यों में भी लगाई जाती है। इसी धन से उस क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रचारकों के खर्चों की व्यवस्था भी की जाती है।”

उन्होंने लिखा है, “इस प्रकार संघ स्वयं को पूरी तरह स्व-वित्तपोषित (Self-financed) संगठन मानता है। संघ का कहना है कि बाहरी आर्थिक सहायता या किसी प्रकार के उपकार पर निर्भर न रहने के कारण उसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने की नैतिक शक्ति मिलती है और वह किसी दबाव या प्रताड़ना के सामने झुकने के लिए बाध्य नहीं होता।”

रतन शारदा की किताब

संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने फरवरी 2026 में मुंबई में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान RSS की फंडिंग को लेकर भी बात की थी। उन्होंने कहा था, “संघ चलाने के लिए स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा करते हैं। सेवा चलाने के लिए समाज से सहयोग लेते हैं। लोगों को विश्वास नहीं होता कि इतने बड़े-बड़े कार्यक्रम संघ करता है। लेकिन हमको व्यय बहुत कम आता है क्योंकि जितना बचा सकते हैं उतना बचाने का हमारा रवैया रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “तो जैसे हम प्रवास करते हैं तो प्रवास में भोजन खरीदते नहीं है। घरों से मँगाते हैं। रुकेंगे, तो हम होटलों में नहीं रुकेंगे। कार्यालय है तो वहाँ रुकेंगे नहीं तो घरों में रुकेंगे। तो जो नॉर्मल बजट है सोसाइटी का उससे हमारा बजट बहुत कम रहता है।”

संघ के पदाधिकारी लगातार इस बात को कहते रहे हैं कि फंडिंग को लेकर या रजिस्ट्रेशन को लेकर किसी से कुछ छिपा नहीं है। संघ से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि प्रियांक खरगे इस विवाद के जरिए केवल संघ के शताब्दी वर्ष के आयोजनों को डिरेल करने की कोशिश कर रहे हैं। संघ अपनी शुरुआत के बाद से ही खुले में रहकर काम कर रहा है, लाखों सेवा कार्य किया जा चुके हैं और चल रहे हैं।

संघ के समर्थक और आलोचक, दोनों अपनी-अपनी दृष्टि से RSS को देखते हैं। इस पूरे विवाद के बीच कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। RSS एक सदी से खुले तौर पर काम कर रहा है। उस पर 3 बार प्रतिबंध लगाए गए, उसकी गतिविधियों की जाँच हुई, उसके खिलाफ कानूनी चुनौतियाँ आईं लेकिन हर बार वह न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होकर सामने आया। संघ की शाखाएँ, कार्यक्रम, पथ संचलन और सेवा गतिविधियाँ किसी गुप्त तरीके से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से आयोजित होती हैं।

संघ के पंजीकरण और फंडिंग को लेकर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उन सवालों का जवाब तथ्यों, कानून और इतिहास के आधार पर खोजा जाए। भारतीय कानून हर सामाजिक संगठन को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। इसी तरह अदालतें भी RSS के अस्तित्व, उसकी संरचना और उसकी गुरु दक्षिणा व्यवस्था पर पहले ही बात कर चुकी हैं।

ऐसे में बार-बार संघ पर सवाल उठाना और उसे रोकने की कोशिश करना बेकार का तर्क लगता है। अगर कोई कानूनी समस्या है तो उसके लिए कानूनी उपाय हैं वो कॉन्ग्रेस या अन्य विरोधी अपनाएँ लेकिन इस तरह के बेजा विवाद संघ की छवि पर प्रश्न खड़े करने से ज्यादा इन विवादों को जन्म देने वालों पर ही सवाल उठाते हैं।

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शिव
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